नेहा भाभी की टाइट चूत में रोहन का धमाका

मैं रोहन। उम्र चौबीस। इंजीनियरिंग का आखिरी साल चल रहा था। कई साल बाद गाँव लौटा था। पिताजी का देहांत हो चुका था, माँ भी अब शहर में भाई के पास रहने लगी थीं। घर में सिर्फ बड़ा भाई अमित और उसकी नई-नई शादी हुई पत्नी नेहा भाभी रहती थीं। अमित भाई की नौकरी ऐसी थी कि वह महीने में पंद्रह-बीस दिन शहर से बाहर ही रहता था। इसलिए घर लगभग खाली ही रहता।

गाँव के स्टेशन पर उतरा तो धूप तेज थी। पुराना सा सामान उठाए घर की तरफ बढ़ा। गेट पर पहुँचा तो एक औरत खड़ी थी। हल्की पीली साड़ी पहने, माथे पर सिंदूर, गले में काला मोती का हार। चेहरा गोरा, आँखें बड़ी-बड़ी, होंठ मोटे। सीने पर दो भारी स्तन साड़ी के ब्लाउज में कसकर भरे हुए थे। कमर पतली और नीचे गाँड गोल-गोल लहरा रही थी।

“आप… रोहन जी?” उसने पूछा। आवाज में मिठास थी।

“हाँ। आप नेहा भाभी?”

वह मुस्कुराई। “आओ अंदर। भाई साहब तो अभी तीन दिन बाद ही आएंगे। तुम्हारे लिए कमरा साफ कर दिया है।”

घर में घुसा। पुरानी यादें ताजा हो गईं। नेहा भाभी रसोई में चली गईं चाय बनाने। मैं सामान रखकर नहाने चला गया। नहाते हुए दिमाग में बार-बार उसी की मुस्कान और भारी चुचियाँ घूम रही थीं। लंड अपने आप सख्त हो गया था। मैंने जल्दी से हिलाकर पानी गिराया और बाहर निकला।

शाम को दोनों आँगन में बैठे थे। नेहा भाभी साड़ी की जगह अब आरामदायक सूट में थीं। कुर्ती पतली थी, अंदर ब्रा की लकीर साफ दिख रही थी। बातें हुईं। पढ़ाई के बारे में, शहर के बारे में, गाँव के बारे में। वह अच्छी श्रोता थी। हँसती थी तो उसकी चुचियाँ हिलती थीं। मैं जानबूझकर उनकी तरफ देखता रहता था।

रात का खाना उसने मेरे सामने बैठकर खिलाया। रोटी बनाते समय उसकी बाँहें नंगी थीं। पसीना आ रहा था गले पर। मैं सोच रहा था कि इन बाँहों को पकड़कर पीछे से कैसे चोदूँ।

अगले तीन दिन कुछ ऐसे ही बीते। सुबह वह चाय बनाती, मैं खेतों की तरफ घूमने जाता। दोपहर को वह घर का काम करती, मैं किताबें निकालकर बैठा रहता। शाम को दोनों साथ चाय पीते। धीरे-धीरे बातें गहरी होने लगीं।

एक दिन उसने बताया कि अमित भाई शादी के बाद से बहुत बदल गए हैं। नौकरी के नाम पर ज्यादातर बाहर ही रहते हैं। जब आते हैं तो थके हुए रहते हैं। बातें कम, छूना भी कम। नेहा भाभी की आँखों में एक अजीब सी प्यास दिखी उस दिन। मैंने पूछा, “भाभी, आप अकेली तो नहीं महसूस करतीं?”

वह चुप रही। फिर धीरे से बोली, “कभी-कभी… बहुत।”

उस रात मैं अपने कमरे में लेटा हुआ था। लंड फिर सख्त था। नेहा भाभी का ख्याल आ रहा था। उनकी गोरी जाँघें, भारी स्तन, और वह अकेली रातें। मैंने दरवाजा बंद किया और जोर-जोर से अपना लंड हिलाने लगा। कल्पना में वह मेरे नीचे थी, मैं उसकी चूत में धक्के मार रहा था। जल्दी ही गाढ़ा माल निकल आया।

चौथे दिन सुबह अमित भाई का फोन आया। काम में और तीन दिन की देरी हो गई थी। नेहा भाभी ने फोन काटते हुए एक लंबी सांस ली। मैंने देखा तो वह मुस्कुराई, “लगता है और कुछ दिन अकेले ही रहना पड़ेगा।”

उस दिन दोपहर को वह छत पर कपड़े सुखाने गई। हवा चल रही थी। उसकी साड़ी का पल्लू उड़ रहा था। नीचे वाली पेटीकोट की डोरी थोड़ी ढीली थी। पीछे से उसकी गोल गाँड की आकृति साफ दिख रही थी। मैं नीचे खड़ा देख रहा था। अचानक उसने मुड़कर देख लिया। हमारी नजरें मिलीं। वह शर्माई नहीं। बस एक पल के लिए देखती रही, फिर मुस्कुराकर कपड़े ठीक करने लगी।

शाम को खाना खाते समय मैंने हिम्मत की। “भाभी, आप बहुत सुंदर लगती हो।”

वह चौंक गई। फिर धीरे से बोली, “ऐसे नहीं कहते रोहन… मैं तुम्हारी भाभी हूँ।”

“पता है। लेकिन सच है।”

रात को ग्यारह बजे मैं पानी के लिए उठा। रसोई में रोशनी जल रही थी। नेहा भाभी खड़ी थीं। पतली नाइटी पहने हुए। नाइटी घुटनों तक ही थी। ऊपर से उनके स्तनों का भारीपन साफ झलक रहा था। निप्पल की गाँठें नाइटी में से उभर रही थीं। वह पानी पी रही थीं। मैं पीछे से गया।

“भाभी…”

वह मुड़ीं। नाइटी में उनका शरीर और भी उभरा हुआ लग रहा था। “अभी तक सोए नहीं?”

मैंने कोई जवाब नहीं दिया। सीधा पास जाकर उनकी कमर पकड़ ली। वह सहम गईं। “रोहन… क्या कर रहे हो?”

“जो आप भी चाहती हो भाभी।”

मैंने उन्हें दीवार से सटा दिया। एक हाथ उनकी नाइटी के अंदर घुसा दिया। नंगी जाँघ से होता हुआ सीधा उनकी चूत पर चला गया। पैंटी नहीं पहनी थी। चूत पहले से थोड़ी गीली थी। मेरी उँगली फिसल गई।

“आह्ह… मत करो… यह गलत है…” उनकी आवाज काँप रही थी।

मैंने उनकी गर्दन पर मुँह रख दिया। चूमने लगा। दूसरा हाथ ऊपर करके उनके एक स्तन को नाइटी के ऊपर से ही मसलने लगा। स्तन इतने मुलायम और भारी थे कि हाथ में नहीं समा रहे थे। निप्पल सख्त हो चुका था।

नेहा भाभी हल्के से धक्का दे रही थीं, लेकिन उनकी चूत मेरी उँगली को और अंदर खींच रही थी। मैंने दो उँगली अंदर घुसा दीं। गीलापन बढ़ गया था। “भाभी… कितनी गीली हो। भाई साहब के बिना कैसे रह लेती हो?”

“चुप करो… आह्ह… रोहन… छोड़ो…”

मैं नहीं माना। उँगलियाँ और तेज चलाने लगा। उनका सिर मेरे कंधे पर रख गया। साँसें तेज हो रही थीं। मैंने नाइटी ऊपर उठाई। उनके विशाल स्तन बाहर आ गए। गोरे-गोरे, गुलाबी निप्पल। मैंने मुँह में एक स्तन ले लिया और जोर से चूसने लगा। दाँत से हल्के से काटा। नेहा भाभी की कमर काँप उठी।

“आह्ह्ह… साले… क्या कर रहे हो…”

मैंने उन्हें उठाया और अपने कमरे में ले गया। बिस्तर पर लिटा दिया। नाइटी पूरी उतार दी। अब वह पूरी नंगी थीं। गोरा शरीर, भारी चुचियाँ दोनों तरफ लुढ़क रही थीं, पेट चिकना, और नीचे मुंडी हुई चिकनी चूत। चूत की लकीर चमक रही थी।

मैंने जल्दी से अपनी जाँघिया उतारी। मेरा लंड पूरी तरह खड़ा हो चुका था। मोटा, लंबा, सिर चमक रहा था। नेहा भाभी की आँखें उस पर टिक गईं। “इतना… बड़ा…”

मैं उनके ऊपर चढ़ गया। लंड उनकी चूत पर रगड़ने लगा। गीली चूत पर लंड फिसल रहा था। फिर एक जोर का धक्का मारा। आधा लंड अंदर चला गया।

“आह्ह्ह्ह्ह!” नेहा भाभी चीख पड़ीं। उनके नाखून मेरी पीठ में धँस गए।

मैंने और धक्का मारा। पूरा लंड उनकी चूत में समा गया। इतनी टाइट थी कि ऐसा लग रहा था जैसे पहली बार ही चोद रहे हों। मैं रुक गया। “दर्द हो रहा है भाभी?”

वह आँखें बंद किए हुए थीं। “थोड़ा… लेकिन मत निकालो… अंदर ही रखो…”

मैं धीरे-धीरे धक्के मारने लगा। हर धक्के पर उनकी चुचियाँ ऊपर-नीचे हो रही थीं। मैंने एक स्तन मुँह में लेकर चूसते हुए और तेज चोदना शुरू किया। चूत की आवाज आने लगी – चप-चप-चप। नेहा भाभी के मुँह से भी आवाजें निकलने लगीं।

“आह… रोहन… और जोर से… हाँ… ऐसे ही चोदो…”

मैंने उनकी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रख दीं। और गहराई तक धक्के मारने लगा। लंड हर बार उनकी कोख तक जा रहा था। नेहा भाभी पागल हो रही थीं। उनके बाल बिखर गए थे, मुँह खुला था, आँखें पलकें झपक रही थीं।

“भाभी… तुम्हारी चूत कितनी मस्त है… भाई साहब को छोड़कर यहाँ पड़ी रहती हो?”

“चुप कर… और चोद… मेरी चूत फाड़ दे अपने लंड से…”

मैंने उन्हें उलटा कर दिया। घोड़ी बना दिया। उनकी गोल गाँड मेरे सामने थी। दोनों हाथों से गाँड के गोले फैलाए और लंड फिर से चूत में डाल दिया। इस बार और भी जोरदार धक्के लगे। हर धक्के पर उनकी गाँड थरथरा रही थी। मैं एक हाथ से उनकी गाँड पर थप्पड़ मारने लगा। लाल निशान पड़ गए।

“मार… और मार… आह्ह… रोहन…”

मैंने थूककर एक उँगली उनकी गाँड के छेद पर लगाई। धीरे से अंदर घुसा दी। नेहा भाभी सहम गईं लेकिन विरोध नहीं किया। अब एक उँगली गाँड में और मोटा लंड चूत में। दोनों छेद एक साथ। उनकी आवाजें और तेज हो गईं।

थोड़ी देर बाद मैंने लंड निकाला और गाँड के छेद पर लगा दिया। धीरे-धीरे दबाव दिया। नेहा भाभी की मुट्ठियाँ भिंच गईं। “आह्ह्ह… धीरे… फट जाएगी…”

मैंने धीरे-धीरे आधा लंड उनकी गाँड में घुसा दिया। फिर रुककर पूछा, “दर्द?”

“हाँ… लेकिन मत निकाल… पूरा डाल…”

मैंने धीरे-धीरे पूरा लंड गाँड में धकेल दिया। फिर धक्के मारने लगा। पहले धीमे, फिर तेज। नेहा भाभी का सिर बिस्तर में धँसा हुआ था। उनके मुँह से दबी हुई चीखें निकल रही थीं। मैं उनकी कमर पकड़े हुए जोर-जोर से गाँड चोद रहा था।

“ले भाभी… ले मेरा लंड अपनी गाँड में… कैसी लग रही है रंडी वाली चुदाई?”

“बहुत… बहुत मस्त… और जोर से चोद… मेरी गाँड फाड़ दे…”

मैं लगभग बीस मिनट तक उनकी गाँड चोदता रहा। फिर निकाला और वापस चूत में डाल दिया। अब दोनों छेद ढीले और गीले हो चुके थे। पानी की आवाज पूरे कमरे में गूँज रही थी। नेहा भाभी बार-बार झड़ रही थीं। उनकी चूत बार-बार ऐंठ रही थी।

आखिर में मैंने उन्हें फिर सीधा लिटाया। पूरा शरीर उनके ऊपर डाल दिया। चेहरा पास लाकर चूमने लगा। जीभ से जीभ मिलाई। नीचे लंड पागलों की तरह धक्के मार रहा था। नेहा भाभी ने अपने पैर मेरी कमर पर लपेट लिए।

“रोहन… अंदर झाड़ना… मेरी चूत में अपना सारा माल भर देना…”

मैं और तेज हो गया। बिस्तर चरमरा रहा था। दोनों के शरीर पसीने से चिपके हुए थे। अचानक मेरी कमर अकड़ गई। लंड धड़कने लगा। गाढ़ा गरम वीर्य की धार उनकी चूत के अंदर छूटने लगी। एक के बाद एक। इतना झाड़ा कि बाहर भी निकलने लगा। सफेद माल उनकी जाँघों पर बह रहा था।

मैं उनके ऊपर गिरा रहा। लंड अभी भी उनकी चूत में था। नेहा भाभी मेरे बाल सहला रही थीं। “साले… कितना चोदा… सालों बाद शरीर को ऐसा सुकून मिला है।”

मैंने सिर उठाया। “भाभी… यह तो शुरुआत है। भाई साहब जब तक नहीं आते, रोज़ चोदूँगा तुम्हें।”

वह मुस्कुराई। “चोदना… लेकिन कोई जानने न पाए।”

मैंने अपना लंड उनकी चूत से निकाला। सफेद गाढ़ा माल की लकीरें उनकी खुली चूत से बाहर आ रही थीं। मैंने उँगली से थोड़ा माल उठाया और उनके मुँह में डाल दिया। नेहा भाभी ने चूस लिया। फिर खुद मेरे लंड को मुँह में ले लिया और बचा-खुचा माल चाटने लगीं।

उस रात हम दो बार और चोदे। एक बार नहाते हुए। बाथरूम में मैंने उन्हें दीवार से सटाया और खड़े-खड़े चोदा। पानी की बौछार में उनकी चीखें दब गईं। दूसरी बार सुबह होते-होते। उस बार मैंने उनकी दोनों चुचियों के बीच लंड रखकर रगड़ा और उनके मुँह पर ही झाड़ दिया। नेहा भाभी ने मुँह और चुचियों पर लगा माल पूरे मजे से चाटा।

अगले दिन से हमारा खेल रोज का हो गया। सुबह जब वह रसोई में होतीं, मैं पीछे से जाकर उनकी साड़ी उठा देता। कभी चूत में उँगली कर देता, कभी स्तन मसल देता। दोपहर को जब धूप तेज होती, हम दोनों कमरे में बंद हो जाते। कभी वह मुझे अपने ऊपर बिठातीं और खुद कमर हिला-हिलाकर मेरा लंड अपनी चूत में लेतीं। कभी मैं उन्हें गोद में बिठाकर उठा-उठाकर चोदता।

एक दिन खेत के पीछे पुराने कमरे में ले गया। वहाँ फर्श पर ही उनकी साड़ी बिछाई और घंटों चोदा। उनकी गाँड में, चूत में, मुँह में। जब लौटे तो दोनों के शरीर पर मिट्टी और पसीने के निशान थे। नेहा भाभी की चाल बदल गई थी। चूत दुख रही थी, लेकिन आँखों में भूख और बढ़ गई थी।

रात को उसने खुद मेरे कमरे का दरवाजा खोला। नंगी आकर बिस्तर पर चढ़ गई। “आज मैं तुझे चोदूँगी,” उसने कहा। फिर मेरे लंड को मुँह में लिया और इतनी देर तक चूसा कि मैं लगभग झड़ने वाला था। फिर ऊपर चढ़ गई और खुद धक्के मारने लगी। उसकी भारी चुचियाँ मेरे चेहरे पर लटकी हुई थीं। मैं दोनों को बारी-बारी मुँह में ले रहा था। नेहा भाभी पागलों की तरह कमर हिला रही थीं।

“आह्ह… रोहन… तेरा लंड मेरी चूत में कितना गहरा जा रहा है… और… और…”

वह झड़ गईं। उनकी चूत मेरे लंड को जकड़ रही थी। मैंने भी उन्हीं के अंदर झाड़ दिया। दोनों चिपके रहे लंबे समय तक।

तीसरे दिन अमित भाई का फोन आया कि वह कल शाम तक पहुँच जाएगा। नेहा भाभी की शक्ल गिर गई। शाम को हम दोनों ने खूब लंबी चुदाई की। मैंने उन्हें चारपाई पर घोड़ी बनाकर रखा और पीछे से इतनी देर तक चोदा कि उनकी आवाज बैठ गई। आखिर में उनकी गाँड में झाड़ दिया। जब लंड निकाला तो सफेद माल उनकी गाँड से बाहर आ रहा था।

रात को नेहा भाभी मेरे पास आईं। आँखों में आँसू थे। “कल से फिर अकेलापन…”

मैंने उन्हें गले लगाया। “मैं फिर आऊँगा भाभी। छुट्टियों में। तब तक तुम मेरी रंडी बनी रहना।”

वह मुस्कुराईं। फिर धीरे से मेरे लंड को हाथ में लिया। “एक बार और…”

उस रात आखिरी बार हमने एक-दूसरे को चोदा। सुबह होते-होते नेहा भाभी अपने कमरे में चली गईं। मैंने बिस्तर पर उनके पसीने और मेरे माल के निशान देखे। मन में एक अजीब सा सुकून और जलन दोनों थे।

अमित भाई अगले दिन आ गए। घर में फिर सामान्य वातावरण हो गया। लेकिन नेहा भाभी और मेरी नजरें जब मिलतीं तो दोनों जानते थे कि क्या हो चुका है। रात को जब अमित भाई सो जाते, नेहा भाभी कभी-कभी मेरे कमरे के बाहर से गुजरतीं। एक रात उसने दरवाजे पर हल्के से खटखटाया। मैंने खोला तो वह अंदर आ गईं। बिना कुछ कहे नाइटी उतारी और बिस्तर पर लेट गईं।

“जल्दी कर… वह सो गए हैं।”

मैंने चुपचाप दरवाजा बंद किया और उनके ऊपर चढ़ गया। उस रात हमने बहुत धीमे, लेकिन बहुत गहरे चुदाई की। नेहा भाभी के मुँह पर मेरा हाथ था ताकि आवाज न निकले। जब मैंने उनकी चूत में माल भरा तो वह मेरे सीने से चिपक गईं।

अब घर में एक नया रहस्य था। परिवार के रिश्ते पहले जैसे नहीं रहे। सतह पर सब सामान्य दिखता था, लेकिन अंदर कुछ और ही चल रहा था। नेहा भाभी की प्यास अब सिर्फ मेरे लंड से बुझती थी। और मैं, रोहन, अपनी ही भाभी को रात-रात भर चोदने का मजा लेने लगा था।

गाँव की ये छुट्टियाँ अब सिर्फ छुट्टियाँ नहीं रहीं थीं। ये नेहा भाभी की चूत और गाँड की भूख बुझाने वाली रातें बन गई थीं। और यह खेल आगे और गहरा होने वाला था।

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