गरिमा भाभी पार्ट 9: दो लंड के बीच और नए नियम

पिछले पार्ट में करण ने मुझे रिसॉर्ट में ले जाकर विकास के सामने लाइव वीडियो कॉल पर चोदा था। विकास ने सब देख लिया था और करण ने साफ कह दिया था कि अब मैं दोनों की हूँ।


घर वापस आने के बाद के दो दिन अजीब गुजरे। विकास ने एक भी मैसेज नहीं किया। न धमकी, न गाली, न लंड की फोटो। सिर्फ़ खामोशी। वो खामोशी विकास की गालियों से भी ज्यादा डरावनी लग रही थी। करण ने सिर्फ़ एक बार मैसेज किया था – “वह चुप है। अच्छा संकेत है। तू सामान्य रह।”

लेकिन सामान्य रहना अब मुश्किल हो चला था। शरीर में रिसॉर्ट वाली रात के निशान अभी भी थे। गर्दन पर हल्के काटने के निशान, कलाई पर पकड़ने के नीले निशान, और गाँड में वो Dull दर्द जो हर बार बैठते ही याद दिला देता था कि मैं कितनी गहराई तक जा चुकी हूँ। आकाश ने एक बार पूछ लिया था, “गर्दन पर ये क्या है?” मैंने हँसकर कहा, “सहेली के यहाँ बिस्तर की धार लग गई।” आकाश मुस्कुरा दिए। विश्वास कर लिया। उसी मुस्कान ने मेरे अंदर शर्म की जगह एक अजीब सी ठंडक पैदा कर दी।

तीसरे दिन सुबह आकाश ऑफिस जाने से पहले बोले, “आज थोड़ा लेट आऊँगा। करण के साथ एक मीटिंग है। शायद डिनर भी हो जाए।” मैंने सामान्य स्वर में कहा, “ठीक है।” लेकिन अंदर दिल बैठ गया। करण और आकाश एक साथ। एक टेबल पर। एक ही बातचीत में। करण मुझे रात भर चोद चुका है, और अब वह मेरे पति के साथ डिनर करेगा। सोचते ही चूत में हलचल हो गई। गंदी हलचल।

दोपहर में करण का मैसेज आया। “आज आकाश के साथ हूँ। तू घबरा मत। सब कंट्रोल में है। रात को दस बजे बालकनी में आना। एक मिनट के लिए।”

मैंने मैसेज पढ़ा और फोन रख दिया। पूरा दिन घर के कामों में खुद को व्यस्त रखने की कोशिश करती रही। लेकिन दिमाग बार-बार उसी रिसॉर्ट वाले कमरे में चला जाता। टीवी स्क्रीन पर विकास की खामोशी, करण के भारी धक्के, और मेरे अपने मुँह से निकली गालियाँ। “तेरा लंड बेहतर है… विकास से बेहतर चोद…” – वो शब्द बार-बार दोहराए जा रहे थे।

रात को आकाश नौ बजकर चालीस मिनट पर घर आए। थोड़े थके हुए, लेकिन मूड अच्छा था। उन्होंने कहा, “करण अच्छा लड़का है। बिजनेस समझता है। आगे चलकर साथ काम कर सकते हैं।” मैंने चाय दी और मुस्कुराई। आकाश ने मेरा हाथ पकड़कर बोला, “तुम आज खामोश लग रही हो।” “थोड़ी थकान है,” मैंने जवाब दिया। वे मुझे गले लगाकर लेट गए। दस मिनट बाद उनकी साँसें भारी हो गईं। सो गए।

मैं चुपके से बालकनी में गई। ठंडी हवा चल रही थी। ठीक दस बजे विपरीत बालकनी में एक छाया दिखी। करण। उसने सिगरेट जलाई और धीरे से बोला, “आकाश सो गया?” “हाँ।” “अच्छा। कल दोपहर दो बजे मेरे ऑफिस के पास वाली पुरानी बिल्डिंग में आना। तीसरी मंज़िल, कमरा 302। आकाश को कह देना तुझे डॉक्टर के पास जाना है।” “क्या होगा वहाँ?” करण ने सिगरेट का कश लिया। “विकास भी आएगा। और तू। दोनों के बीच में तू होगी। आज सिर्फ़ बात। लेकिन बात ऐसी होगी कि तेरी चूत खुद पानी छोड़ देगी।”

मैं कुछ पूछ पाती उससे पहले उसने सिगरेट कुचली और अंदर चला गया। बालकनी खाली हो गई। मैं वहीं खड़ी रही। दोनों मर्द। एक कमरे में। और मैं बीच में। शरीर ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। चूत गीली हो गई। डर के साथ।


अगले दिन मैंने आकाश को डॉक्टर वाला झूठ बोला। वे ऑफिस चले गए। मैंने सादी सालवार कमीज पहनी। अंदर काला सेट। कैमरा वाला छोटा डिवाइस भी साथ रखा – इस बार अपनी सुरक्षा के लिए। दो बजकर दस मिनट पर मैं उस पुरानी बिल्डिंग के सामने खड़ी थी। लिफ्ट खराब थी। सीढ़ियों से तीसरी मंज़िल तक गई। कमरा 302। दरवाज़ा आधा खुला था।

अंदर करण कुर्सी पर बैठा था। विकास खिड़की के पास खड़ा था। दोनों ने मुझे देखा। विकास की आँखों में गुस्सा और हार का मिश्रण था। करण शांत था, जैसे कोई मीटिंग चला रहा हो।

“आ जा गरिमा,” करण ने कहा। “दरवाज़ा बंद कर दे।”

मैंने दरवाज़ा बंद किया। कमरे में एक पुराना सोफा, एक टेबल और दो कुर्सियाँ थीं। करण ने इशारा किया। मैं सोफे पर बैठ गई। विकास अभी भी खड़ा रहा।

करण बोला, “अब से नियम साफ हैं। विकास, तू गरिमा को जब चाहे चोद सकता है। लेकिन हफ्ते में दो बार से ज्यादा नहीं। और हर बार मुझे बताना होगा। गरिमा, तू दोनों की बात मानेगी। इंकार नहीं करेगी। और आकाश को कुछ नहीं पता चलने देगी। अगर किसी ने नियम तोड़ा… तो वीडियो आकाश तक पहुँच जाएगी। समझ गए?”

विकास की जबड़े की नस फड़क रही थी। उसने मेरी तरफ देखा। “तूने ये सब क्यों किया?” मैंने जवाब नहीं दिया। करण ने मेरे लिए जवाब दिया। “क्योंकि इसे एक लंड से पेट नहीं भरता। और तू अकेला उस भूख को काबू में नहीं रख सकता था। इसलिए मैं आ गया।”

करण ने मुझे अपने पास बुलाया। मैं उठी और उसके सामने खड़ी हो गई। उसने मेरी सालवार की डोरी खोली और नीचे गिरा दी। फिर कमीज ऊपर की। मैं ब्रा-पैंटी में खड़ी थी। विकास देख रहा था। करण ने मेरी पैंटी एक तरफ की और दो उँगलियाँ चूत में डाल दीं।

“देख… पहले से गीली है। दोनों को देखकर।” उसने उँगलियाँ निकालीं और विकास की तरफ बढ़ाईं। “चख। अपनी रंडी का स्वाद।”

विकास ने पहले मना किया। फिर धीरे से आगे बढ़ा और करण की उँगलियाँ मुँह में ले लीं। उसकी आँखें बंद हो गईं। करण ने मुझे सोफे पर धकेल दिया और विकास से कहा, “अब तू चोद। आज मेरे सामने। और जोर से। मुझे दिखाना कि तू इसे कैसे चोदता है।”

विकास की साँसें तेज़ हो गईं। उसने पेंट खोली। मोटा लंड बाहर आ गया। वह मुझ पर टूट पड़ा। कोई चुंबन नहीं, कोई सहलाना नहीं। सीधे चूत में लंड धकेल दी। एक झटके में। मैंने जोर से कराह निकाली। विकास ने मेरी टाँगें पकड़कर रख दीं और गुस्से में चोदने लगा। हर धक्का भारी और गुस्से भरा था।

“रंडी… दोनों की रंडी… मेरे सामने किसी और के साथ चुदवाती है…” “हाँ… रंडी हूँ… जोर से चोद… फाड़ दे…”

करण कुर्सी पर बैठकर देख रहा था। उसने अपनी पेंट खोली और लंड बाहर निकालकर धीरे-धीरे हिलाने लगा। “और जोर से विकास। इसकी गाँड भी ले। मुझे दोनों जगह देखनी है।”

विकास ने लंड निकाली और गाँड में डाल दी। दर्द के साथ मज़ा भी था। वह जोर-जोर से गाँड मारने लगा। करण उठकर पास आया। उसने मेरा मुँह पकड़ा और अपना लंबा लंड मुँह में ठूंस दिया। अब मैं दोनों तरफ से भरी हुई थी। विकास पीछे से गाँड मार रहा था, करण आगे से मुँह। गालियाँ और कराहें दोनों के लंड के बीच दब रही थीं।

करण ने मेरे बाल पकड़कर कहा, “आज तू पूरी तरह हमारी है। आकाश की बीवी होकर दो लंड एक साथ ले रही है। कैसा लग रहा है?” मैं कुछ बोल नहीं पाई। सिर्फ़ आँखों से देखा। करण समझ गया। उसने और तेज़ धक्के दिए।

लगभग बीस मिनट बाद विकास पहले झड़ गया – गाँड के अंदर। उसने लंड निकाली तो पानी बाहर बहने लगा। करण ने मुझे खड़ा किया और खुद सोफे पर बैठ गया। मुझे अपनी गोद में बैठाकर चूत में लंड डाल ली। अब वह नीचे से धक्के दे रहा था। विकास सामने खड़ा होकर देख रहा था। करण ने मेरे स्तन पकड़कर जोर-जोर से चोदा। आखिर में उसने भी अंदर ही झड़ दिया।

मैं दोनों के बीच पूरी तरह भीगी हुई बैठी थी। शरीर काँप रहा था। करण ने मेरे कान में धीरे से कहा, “अब घर जा। आकाश के आने से पहले नहा ले। और याद रख… अब तू अकेली फैसले नहीं लेगी। हम लेंगे।”

विकास कुछ बोले बिना पेंट पहनकर निकल गया। करण ने मुझे कपड़े देने में मदद की। जाने से पहले उसने मेरी ठुड्डी पकड़कर कहा, “अगली बार और मजेदार होगा। आकाश को भी शामिल करने का तरीका निकाल रहा हूँ। धैर्य रख।”

मैं घर पहुँची। नहाया। लेकिन पानी से वो गंदगी नहीं उतर रही थी जो अब अंदर तक बैठ चुकी थी। आकाश शाम को आए। उन्होंने मुझे गले लगाया और पूछा, “डॉक्टर ने क्या कहा?” “सब ठीक है,” मैंने जवाब दिया। वे मुस्कुरा दिए। मुझे अपना सर उनके सीने पर रखने दिया। उनके दिल की धड़कन सुनते हुए मैंने सोचा –

अब मैं सिर्फ़ धोखा नहीं दे रही। अब मैं एक चालू खेल की मोहरी बन चुकी हूँ। और करण… वह इस खेल को आकाश तक ले जाने वाला है।

सबसे बड़ा सवाल ये नहीं था कि आकाश कब जानेंगे। सबसे बड़ा सवाल ये था कि जब जानेंगे… तो मैं किस तरफ खड़ी हूँगी?

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