विकास का शक वाले मैसेज के बाद मैंने पूरी रात करण का इंतज़ार किया। वह सिर्फ़ एक लाइन लिखकर सो गया था – “मैं संभालूँगा।” लेकिन सुबह तक कोई नया मैसेज नहीं आया। सिर्फ़ विकास के दो मैसेज थे।
पहले में लिखा था – “तू चुप क्यों है? किसी और का लंड ले रही है क्या?”
दूसरे में – “आज चार बजे आना। जवाब दे, वरना आकाश को सब भेज दूँगा।”
मैंने दोनों मैसेज करण को भेज दिए। इस बार जवाब देर से आया।
“जा। लेकिन आज कैमरा मत लगाना। आज सिर्फ़ सुनूँगा। और हाँ… रात को तैयार रह। आकाश को कह देना कि तेरी सहेली का इमरजेंसी है, तुझे रात भर बाहर रहना पड़ सकता है। मैं व्यवस्था कर रहा हूँ।”
मेरा दिल बैठ गया। रात भर बाहर। आकाश को झूठ बोलना। और विकास के शक के बीच। फिर भी… शरीर ने पहले ही हाँ कह दी थी।
दोपहर में आकाश को फोन करके मैंने वो झूठ बोल दिया। आवाज़ में जानबूझकर थोड़ी घबराहट रखी। आकाश ने तुरंत कहा, “जरूर जा, कोई बात नहीं। ध्यान रखना।” फोन काटते ही मुझे खुद पर गुस्सा आया। इतना आसान झूठ। इतना आसान धोखा।
चार बजे विकास के दरवाज़े पर खड़ी थी। उसने खोला तो उसकी आँखों में गुस्सा साफ था। अंदर खींचते हुए बोला, “आज बता… किसका लंड ले रही है तू?”
मैंने सीधा जवाब दिया, “किसी का नहीं।” “झूठ मत बोल। कल तू बहुत जोर से चिल्ला रही थी। पहले कभी इतनी बेशर्म नहीं थी।”
उसने मुझे बेडरूम में धकेल दिया और साड़ी झटके से खोल दी। इस बार कोई प्रस्तावना नहीं। सीधे मुझे बिस्तर पर गिराया और अपनी पेंट खोली। मोटा लंड पहले से तना हुआ था।
“आज मैं तुझे इतना चोदूँगा कि तू भूल जाएगी किसी और का नाम।”
उसने मेरे बाल पकड़कर लंड मुँह में ठूंस दी। जोर-जोर से धक्के दिए। गले तक। आँखों से पानी आने लगा। मैंने जानबूझकर आवाज़ें रोकीं। करण सुन रहा था। आज कम आवाज़ में, लेकिन गंदी बातें।
विकास ने लंड निकाली और मुझे कुत्ते की पोजीशन में कर दिया। बिना चाटे सीधे चूत में घुसेड़ दी। एक झटके में पूरी। मैंने मुँह दबा लिया। वह जोर-जोर से चोदने लगा। हर धक्के के साथ मेरी गाँड पर थप्पड़ पड़ता।
“बोल… किसका लंड ले रही है?” “तेरा… सिर्फ़ तेरा…” “झूठ बोल रही है। बता सही।” “तेरा ही… जोर से चोद… फाड़ दे…”
वह और गुस्से में आ गया। लंड निकालकर गाँड में डाल दी। इस बार थूक भी कम लगाया। दर्द तेज़ था। मैंने चादर मुट्ठी में पकड़ ली। विकास ने मेरे बाल खींचकर और तेज़ गाँड मारी। गालियाँ बरसाने लगा।
“रंडी… दो लंड वाली रंडी… सोचती है मैं नहीं समझता…” “नहीं… सिर्फ़ तेरा… मार… जोर से मार…”
वह लगभग आधे घंटे तक गुस्से में चोदता रहा। आखिर में चूत में ही झड़ गया। इतना जोर से कि मुझे लगा कमर टूट जाएगी। वह मेरे ऊपर गिरा और साँस लेते हुए बोला, “रात को घर पर रहना। कहीं मत जाना। मैं चेक करूँगा।”
मैंने सिर हिलाया। शरीर काँप रहा था। विकास के जाने के बाद मैंने जल्दी से कपड़े पहने और घर लौट आई। फोन पर करण का मैसेज इंतज़ार कर रहा था।
“सब सुना। वह शक कर रहा है। अच्छा। अब तैयार हो जा। साढ़े सात बजे पीछे वाली गली में आना। बैग हल्का रखना।”
मैंने नहाया। काले रंग के सरल कपड़े पहने। एक छोटा बैग लिया जिसमें सिर्फ़ चार्जर और कुछ पैसे थे। आकाश को मैसेज किया – “सहेली का हाल ठीक नहीं, मैं रात भर रुक रही हूँ। तुम ख्याल रखना।” आकाश ने जल्दी से जवाब दिया – “ठीक है। फोन रखना।”
साढ़े सात बजे मैं गली में निकली। करण की गाड़ी पहले से खड़ी थी। अंदर बैठते ही उसने गाड़ी तेज़ कर दी। लगभग एक घंटे बाद हम शहर से बाहर एक शांत रिसॉर्ट में पहुँचे। कमरा ऊपर मंज़िल पर था। बड़ा बिस्तर, शीशे वाली दीवार, और बाहर सिर्फ़ पेड़।
दरवाज़ा बंद होते ही करण ने मुझे दीवार से लगा दिया। इस बार चुंबन में गुस्सा नहीं, मालिकाना हक था। उसने मेरे कपड़े धीरे-धीरे उतारे। जब मैं पूरी नंगी हो गई तो उसने मुझे बिस्तर पर लिटाया और खुद खड़ा होकर देखा।
“आज विकास ने तुझे गुस्से में चोदा। मैंने सुना। अब मैं तुझे आराम से तोड़ूँगा। और वह देखेगा।”
मेरी आँखें फैल गईं। “वह… यहाँ?” करण ने मुस्कुराकर फोन निकाला। स्क्रीन पर एक लाइव वीडियो कॉल चल रही थी। अँधेरा सा कमरा। लेकिन आवाज़ साफ आ रही थी – विकास की साँसें। करण ने फोन को टीवी से कनेक्ट कर दिया। स्क्रीन पर विकास का चेहरा नहीं, सिर्फ़ उसका कमरा दिख रहा था। लेकिन वह सुन और देख दोनों सकता था।
“अब वह तुझे देखेगा। कैसे कोई और तुझे चोदता है।”
करण ने मुझे बिस्तर के किनारे बैठाया और अपना लंबा लंड निकाला। “चूस। और आँखें कैमरे में रखना।”
मैंने उसका लंड पकड़ा और मुँह में ले लिया। करण ने मेरे बाल पकड़कर धीरे-धीरे धक्के दिए। टीवी स्क्रीन पर विकास की तरफ से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। सिर्फ़ खामोशी। वही खामोशी और डरावनी थी।
करण ने मुझे लिटाया। पहले मेरी चूत चाटी – लंबी, क्रूर, सटीक। मैं दो बार झड़ चुकी थी जब उसने अपना लंड चूत पर टिकाया। एक झटके में पूरी अंदर डाल दी। फिर उसने मेरी दोनों कलाई पकड़कर लंबी-लंबी स्ट्रोक्स में चोदना शुरू किया। हर धक्का गहरा और भारी था।
“देख विकास… तेरी रंडी अब मेरे नीचे है। और उसे मज़ा आ रहा है।” करण साफ-साफ बोल रहा था। मैं कराह रही थी। “बोल गरिमा… किसका लंड बेहतर है?” “तेरा… तेरा बेहतर है…” “जोर से बोल। उसे सुनाई दे।” “तेरा लंड बेहतर है करण… जोर से चोद मुझे…”
करण ने रफ्तार बढ़ा दी। बिस्तर जोरों से हिलने लगा। उसने मेरी टाँगें कंधों पर रख लीं और और गहराई तक जाने लगा। गालियाँ निकल रही थीं। मैं खुद बोल रही थी – “फाड़ दे… मेरी चूत फाड़ दे… विकास से बेहतर चोद…”
अचानक स्क्रीन से विकास की आवाज़ आई। कड़वी और काँपती हुई। “कमीनी… तू दोनों से चुदवा रही थी…”
करण हँसा। उसने लंड निकालकर मुझे पलटाया और गाँड में डाल दिया। धीरे-धीरे पूरी। फिर जोर के धक्के लगाने लगा। एक हाथ से मेरे बाल पकड़े हुए था।
“हाँ… दोनों से। और अब तू देख। कैसे मैं इसे चोदता हूँ।”
अगले एक घंटे तक करण ने मुझे अलग-अलग अंदाज़ में चोदा। कभी चूत, कभी गाँड, कभी मुँह। बीच-बीच में वह विकास को संबोधित करके बोलता। मैं बार-बार झड़ रही थी। शरीर में ताकत नहीं बची थी। आखिर में करण ने मुझे लिटाया और चूत में गहराई तक जाकर अंदर झड़ गया। इतना कि पानी बाहर तक बह आया।
वह मेरे बगल में लेटा। स्क्रीन पर अभी भी कनेक्शन था। विकास की तरफ से अब सिर्फ़ भारी साँसें आ रही थीं। करण ने फोन उठाकर कहा, “अब तू देख चुका है। गरिमा अब सिर्फ़ तेरी नहीं रही। और न सिर्फ़ मेरी। वह दोनों की है। अगर तूने आकाश को कुछ कहा, तो ये वीडियो भी उसके पास पहुँच जाएगी। समझदार बन।”
कॉल कट हो गई।
कमरे में खामोशी छा गई। करण ने मेरे बाल सहलाते हुए पूछा, “डर लगी?” मैंने सच कहा, “हाँ। लेकिन मज़ा भी आया।”
करण ने मुझे अपनी तरफ घुमाया। “अच्छा। क्योंकि अब ये खेल और बड़ा होने वाला है। आकाश जल्दी ही कुछ महसूस करने वाले हैं। और जब वह महसूस करेंगे… तब असली मज़ा शुरू होगा।”
मैंने उसकी आँखों में देखा। पहली बार मुझे लगा कि करण सिर्फ़ सेक्स नहीं खेल रहा। वह कुछ और खेल रहा है। कुछ बड़ा और खतरनाक।
रात भर करण ने मुझे दो बार और चोदा। कभी धीरे, कभी बहुत जोर से। सुबह जब हम निकले तो शरीर में दर्द के साथ एक अजीब सा सुकून भी था। गाड़ी में बैठते समय करण ने कहा, “आज घर जा। आकाश के साथ सामान्य रह। और विकास को एक मैसेज भेज – ‘अब तू देख चुका है। आगे की बात बाद में।’ बस इतना।”
मैंने वैसा ही मैसेज भेज दिया।
घर पहुँचते ही आकाश ने दरवाज़ा खोला। उन्होंने मुझे गले लगाया। “सहेली कैसी है?” मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया, “अब ठीक है।”
उनके गले में सर रखते हुए मैंने सोचा – अब विकास टूट चुका है। करण और ऊपर उठ चुका है। और आकाश… अभी भी अंधेरे में हैं।
लेकिन अंधेरा कब तक रहेगा? और जब उजाला होगा… तो सबसे पहले किसका चेहरा जल जाएगा?

[…] पिछले पार्ट में करण ने मुझे रिसॉर्ट मे… […]