गरिमा भाभी पार्ट 10: आकाश का नाम लेकर रोते हुए चुदाई

पिछले पार्ट में करण ने नए नियम रखे थे। विकास ने उसके सामने मुझे चोदा था और फिर दोनों ने मिलकर मुझे दोनों तरफ से भरा था। करण ने साफ कह दिया था कि अब वह आकाश को भी इस खेल में शामिल करने का तरीका निकाल रहा है।


उस दिन के बाद से घर का माहौल भारी लगने लगा था। आकाश पहले जैसे नहीं रहे थे। वो अभी भी प्यार से पेश आते, अभी भी मुझे गले लगाते, लेकिन उनकी नज़रों में एक हल्की सी पूछताछ बैठ गई थी। एक रात उन्होंने मेरी कलाई पर बचे हुए हल्के नीले निशान देख लिए। मैंने तुरंत कहा, “रसोई में बर्तन उठाते समय लग गया।” आकाश ने सिर्फ़ “हम्म” किया और बात आगे नहीं बढ़ाई। लेकिन वो “हम्म” बहुत देर तक मेरे कानों में गूँजता रहा।

विकास अब नियम का पालन कर रहा था। हफ्ते में दो बार। हर बार करण को मैसेज करके। कभी मेरे यहाँ नहीं आता था, हमेशा अपने फ्लैट पर बुलाता। चुदाई में अब पहले वाली धमकी वाली गर्मी कम हो गई थी। उसकी जगह एक अजीब सी हार और गुस्सा रह गया था। वह चुपचाप चोदता, जोर से चोदता, लेकिन कम बोलता। कभी-कभी चोदते हुए सिर्फ़ इतना कहता, “तू दोनों की हो गई… दोनों की।” मैं जवाब नहीं देती। क्योंकि सच वही था।

करण ने इन दिनों मुझे कम बुलाया। बस कभी-कभी मैसेज कर देता – “धैर्य रख। अगला कदम बड़ा होगा।” उसके “बड़े कदम” का इंतज़ार मुझे रात-रात भर जगाए रखता। शरीर तो आदी हो चुका था दो लंडों का। लेकिन मन अब आकाश के शक और करण की चालों के बीच पिस रहा था।

फिर वो दिन आया।

सुबह आकाश ने नाश्ते पर कहा, “आज करण घर आ रहा है। कुछ कागज़ात हैं। शाम को रहेगा। तू थोड़ा अच्छा खाना बना देना।” मैंने कप नीचे रख दिया। “घर पर?” “हाँ। कोई बात?” आकाश मुस्कुराए। “तू तो उसे जानती ही है।” मैंने मुस्कुराकर हाँ कहा। लेकिन अंदर सब कुछ उल्टा हो गया। करण… मेरे घर में… आकाश के सामने। वो आदमी जिसने मुझे विकास के सामने चोदा था, जिसने मेरे मुँह में लंड ठूंसकर गालियाँ दिलवाई थीं, अब मेरे पति के साथ सोफे पर बैठेगा।

पूरा दिन मैंने घर साफ किया, खाना बनाया, लेकिन हाथ काँपते रहे। शाम को छह बजे घंटी बजी। आकाश ने दरवाज़ा खोला। करण अंदर आया। सफेद शर्ट, स्लीव्स मोड़े हुए, चेहरे पर वही शांत मुस्कान। उसने मुझसे हाथ मिलाया। सामान्य। लेकिन उसकी उँगली ने मेरी हथेली के अंदर हल्का सा दबाव दिया। बस इतना सा। और मेरी चूत उसी पल गीली हो गई।

तीनों बैठे। बातें हुईं। बिजनेस, प्रोजेक्ट, शहर। मैं चाय लाई, पानी लाई, फिर किचन में खड़ी होकर उनकी बातें सुनती रही। करण की आवाज़ बिल्कुल सामान्य थी। आकाश हँस रहे थे। कोई नहीं बता सकता था कि इन दोनों में से एक आदमी मेरी गाँड में अपना पानी छोड़ चुका है और दूसरा मेरा पति है।

रात के खाने के बाद आकाश का फोन बजा। ऑफिस से जरूरी कॉल। वे बालकनी में चले गए। करण तुरंत किचन में आ गया। मैं बर्तन धो रही थी। उसने पीछे से आकर मेरी कमर पकड़ ली।

“आज रात तू मेरे साथ सोएगी,” उसने बहुत धीरे से कहा। मैंने सर घुमाया। “पागल हो गया है क्या? आकाश घर पर हैं।” “वह सो जाएगा। तू बहाना बनाकर बाहर निकलना। मैं गाड़ी में इंतज़ार करूँगा। सिर्फ़ दो घंटे। और आज कुछ नया होगा।” “क्या नया?” करण ने मेरे कान के पास होंठ रखकर कहा, “आज तू आकाश का नाम लेकर चोदेगी। और रोएगी। मुझे तेरा रोना सुनना है।”

मैंने उसका हाथ हटाने की कोशिश की, लेकिन वह और कस गया। “नियम याद है ना? इंकार नहीं।” फिर वह सामान्य चेहरे के साथ वापस हॉल में चला गया।

आकाश की कॉल लंबी चली। जब वे अंदर आए तो थोड़े थके हुए लग रहे थे। करण ने जल्दी से कागज़ात समेटे और विदा ली। जाते समय उसने मुझसे कहा, “खाना बहुत अच्छा था गरिमा जी।” आकाश के सामने बिल्कुल सामान्य।

रात को आकाश जल्दी सो गए। मैंने उनके गहरे सोने का इंतज़ार किया। फिर हल्के कपड़े पहने और चुपके से घर से निकल गई। करण की गाड़ी थोड़ी दूर खड़ी थी। अंदर बैठते ही उसने गाड़ी स्टार्ट की और शहर के बाहर एक अंधेरी सड़क पर ले जाकर रोकी। पीछे वाली सीट पर।

“कपड़े उतार,” उसने कहा।

मैंने उतार दिए। करण ने भी पेंट खोली। उसका लंबा लंड पहले से तैयार था। उसने मुझे अपनी गोद में बैठाया और चूत में एक झटके में लंड डाल दी। मैंने आवाज़ रोकी। करण ने मेरे बाल पकड़कर धक्के देने शुरू किए।

“आज नाम लेकर बोल। आकाश का।” “नहीं… मत करवा…” “बोल।” उसने जोर से धक्का मारा। “बोल कि तू आकाश की बीवी होकर किसकी लंड ले रही है।”

मेरी आँखों में पानी आ गया। शरीर तो मज़ा ले रहा था, लेकिन मन टूट रहा था। करण ने और तेज़ चोदा। “बोल गरिमा… नहीं तो और जोर से चोदूँगा।” “आकाश… माफ करना… मैं… मैं किसी और की लंड ले रही हूँ…”

करण ने मुझे सीट पर लिटाया और कुत्ते की पोजीशन में कर दिया। पीछे से और भारी धक्के लगाने लगा। एक हाथ से मेरे बाल पकड़े, दूसरे से गाँड पर थप्पड़ मारे।

“और बोल। पूरा बोल।” “मैं… आकाश की पत्नी हूँ… और आज… आज करण की लंड मेरी चूत में है… वह मुझे चोद रहा है… जोर से चोद रहा है…”

मेरी आवाज़ में रोना आ चुका था। करण को वही चाहिए था। वह और बेकाबू होकर चोदने लगा। गालियाँ दिलवाता, आकाश का नाम दिलवाता, और मैं रो-रो कर बोलती जा रही थी। आखिर में उसने गाँड में लंड डाल दी और जोर-जोर से मारते हुए कहा, “अब रोते हुए झेड़। आकाश का नाम लेकर।”

मैं रोते हुए झड़ गई। शरीर काँप रहा था। करण ने भी गाँड के अंदर ही झड़ दिया। गर्म पानी की धार के साथ उसने मेरे कान में कहा, “अगली बार आकाश घर पर ही होंगे। और तू चुपचाप सहेगी।”

वापस घर छोड़ते समय उसने मेरा चेहरा पकड़ा। “तेरे आँसू आज बहुत अच्छे लगे। कल विकास को बुलाना। उसे बताना कि तू रोते हुए चोदी गई। उसे मज़ा आएगा।”

मैं घर में दाखिल हुई। आकाश अभी भी सो रहे थे। मैं बाथरूम में जाकर आईने के सामने खड़ी रही। चेहरा सूजा हुआ, आँखें लाल, गाँड से पानी रिसता हुआ।

मैंने फुसफुसाकर कहा, “आकाश… मैं कहाँ तक गिर चुकी हूँ…”

लेकिन शरीर ने जवाब दिया। चूत ने फिर से सनसनाहट दी।

अब गिरना बंद होने वाला नहीं था। अब सिर्फ़ और गहराई बाकी थी।

और करण… वह उस गहराई में मुझे धकेलने के लिए पूरी तरह तैयार था।

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