उस रात के बाद मैंने तीन दिन तक करण का मैसेज का इंतज़ार किया। तीनों दिन आकाश के साथ सामान्य जीवन जीने की कोशिश करती रही। खाना बनाया, उनकी बातें सुनीं, रात को उनके गले लगकर सोई। लेकिन हर बार जब आकाश मुझमें प्रवेश करते, तो मुझे करण की आवाज़ याद आ जाती – “आकाश का नाम लेकर रो।” शरीर तो आकाश के प्यार को स्वीकार कर लेता, पर मन कहीं और अटका रहता। चूत अब प्यार से नहीं, गंदगी और खतरे से तरसने लगी थी।
चौथे दिन दोपहर को मैसेज आया।
“आज रात। आकाश सो जाएँगे उसके बाद। घर का पिछला दरवाज़ा खुला रखना। मैं अंदर आऊँगा। तू बोलने की कोशिश मत करना। सिर्फ़ सहना। और हाँ… विकास भी पास में ही होगा। वह सुन रहा होगा।”
मैंने मैसेज पढ़ा और फोन रख दिया। हाथ काँप रहे थे। घर के अंदर। आकाश के सोते हुए। करण मेरे शरीर पर। और विकास बाहर सुन रहा होगा। ये अब सेक्स नहीं रह गया था। ये कोई क्रूर खेल बन चुका था जिसमें मेरी इज्जत, मेरा विवाह और मेरा दिमाग तीनों दांव पर थे।
शाम को आकाश घर आए। थके हुए। खाना खाया। टीवी देखा। फिर जैसे रोज़ करते हैं, मुझे बिस्तर पर खींच लिया। उन्होंने प्यार से चोदा। धीरे-धीरे, सहलाते हुए, बीच-बीच में “मैं तुमसे प्यार करता हूँ” कहते हुए। मैंने आँखें बंद रखीं। जब वे झड़ गए तो उन्होंने मुझे कसकर पकड़ लिया। दस मिनट बाद उनकी साँसें गहरी हो गईं। वे सो गए।
मैं लगभग पैंतालीस मिनट तक उनके बगल में लेटी रही। फिर धीरे से उठी। पिछला दरवाज़ा चेक किया – खुला छोड़ दिया था। बाथरूम गई, आईने में अपना चेहरा देखा। आँखों में डर था, लेकिन उसके नीचे एक काली भूख भी थी जो अब छिप नहीं रही थी।
ठीक बारह बजकर दस मिनट पर मुझे पीछे की तरफ हल्की सी आहट सुनाई दी। करण अंदर आ चुका था। उसने मुझे अंधेरे में ही पहचान लिया। बिना एक शब्द बोले उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे आकाश वाले बेडरूम के ठीक बाहर वाले छोटे से गेस्ट रूम में ले गया। दरवाज़ा बंद नहीं किया। आधा खुला छोड़ दिया। ताकि अगर आकाश अचानक उठें तो आवाज़ आ सके। खतरा पूरा।
करण ने मुझे दीवार से लगा दिया। उसके हाथ में हल्की शराब की गंध थी। उसने मेरे नाइटी के फीते खोले। मैं नंगी हो गई। आकाश दीवार के दूसरी तरफ सो रहे थे। उनकी साँसों की हल्की आवाज़ आ रही थी। करण ने मेरा मुँह पकड़ा और फुसफुसाया, “आज बिल्कुल धीरे। लेकिन गंदी बातें कर। आकाश का नाम लेकर। विकास सुन रहा है।”
उसने अपना फोन निकाला। कॉल ऑन था। विकास दूसरी तरफ खामोश था, लेकिन कनेक्टेड था। करण ने मुझे घुटनों के बल बैठाया और अपना लंबा लंड मेरे मुँह के सामने पकड़ लिया। मैंने उसे मुँह में ले लिया। अंधेरे में सिर्फ़ चूसने की हल्की गीली आवाज़ें निकल रही थीं। करण ने मेरे बाल पकड़कर धीरे-धीरे धक्के दिए। गले तक।
फिर उसने मुझे खड़ा किया, दीवार से लगाया और पीछे से चूत में लंड डाल दी। एक ही झटके में पूरी। मैंने मुँह दबा लिया। करण ने मेरे कान में कहा, “बोल… धीरे… लेकिन बोल।”
“आकाश… माफ करना… तेरी बीवी की चूत में किसी और का लंड है…” करण ने धक्का और गहरा किया। “और जोर से बोल। विकास को सुनाई दे।” “करण… मुझे चोद रहा है… आकाश के घर में… आकाश के सोते हुए… मेरी चूत फाड़ रहा है…”
मेरी आवाज़ काँप रही थी। आँसू आ गए थे। करण ने एक हाथ से मेरे मुँह को हल्का सा दबाया और पीछे से और तेज़ चोदने लगा। बिस्तर की तरफ से आकाश की साँसें अभी भी नियमित थीं। खतरा हर पल बढ़ रहा था। करण ने लंड निकाली और गाँड में डाल दी। इस बार थूक भी कम था। दर्द तेज़ था। मैंने दीवार पर हाथ टेक दिए।
“आकाश… तेरी बीवी की गाँड में लंड जा रही है… तू सो रहा है… और मैं… मैं मज़ा ले रही हूँ…”
करण ने मेरे बाल खींचकर और जोर से गाँड मारी। फोन पर विकास की भारी साँसें आने लगीं। वह सुन रहा था। शायद हिला भी रहा था। करण ने मुझे पलटाया, दोनों पैर उठाए और खड़े-खड़े चूत में फिर से घुसेड़ दिया। अब धक्के थोड़े तेज़ थे। दीवार हल्की-हल्की आवाज़ कर रही थी।
“आज तू रो। लेकिन आवाज़ मत निकाल। बस आँसू बहने दे।”
मैं रो रही थी। चुपचाप। आँसू गालों पर बह रहे थे। करण मेरे आँसुओं को चाट रहा था और लगातार चोद रहा था। आकाश की साँसें दूसरी तरफ से आ रही थीं। अगर वे अभी उठ जाते… तो सब खत्म। शादी, इज्जत, सब। फिर भी मेरी चूत सिकुड़-सिकुड़ कर पानी छोड़ रही थी। शरीर खतरे में भी मज़ा ले रहा था। यही सबसे डरावना था।
करण ने लगभग बीस मिनट तक मुझे उसी अंदाज़ में चोदा। आखिर में उसने गाँड में गहराई तक जाकर अंदर ही झड़ दिया। गर्म पानी की धार महसूस हुई। उसने लंड अंदर रखी रही और मेरे कान में कहा, “अब जाकर आकाश के बगल में लेट जा। उनके लंड को छू। और सोची कि अभी-अभी किसी और ने तुझे भरा है।”
वह चुपके से निकल गया। फोन कॉल काट दी। मैं काँपते हुए नाइटी पहनकर बेडरूम में लौटी। आकाश अभी भी सो रहे थे। मैं उनके बगल में लेटी। उनका हाथ मेरे पेट पर था। मैंने धीरे से उस हाथ को पकड़ा और अपने नीचे ले गई – उनकी लंड पर। वो नरम थी। नींद में। मैंने उँगली से उसे छुआ और अंदर ही अंदर सोचा –
“आकाश… तुम्हारी बीवी की गाँड में अभी-अभी किसी और का पानी भरा है… और मैं तुम्हारे लंड को छू रही हूँ…”
मेरी आँखों से फिर आँसू बह निकले। लेकिन इस बार आँसुओं के साथ चूत में एक गहरी, गंदी संतुष्टि भी थी।
सुबह आकाश ने मुझे गले लगाया और कहा, “रात को तुम काँप रही थी। सपना देखा क्या?” मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया, “हाँ… एक अजीब सा सपना।”
वे ऑफिस चले गए। फोन पर करण का मैसेज इंतज़ार कर रहा था।
“बहुत अच्छी थी। आँसू, डर, आकाश का नाम… सब परफेक्ट। अब आखिरी कदम बचा है। अगले पार्ट में तू तैयार रह। इस बार आकाश को भी कुछ दिखेगा। या सुनाई देगा। फैसला मैं करूँगा।”
मैंने मैसेज पढ़ा और फोन रख दिया।
अब अंत करीब था। या तो ये खेल खुलकर खत्म होगा… या मैं हमेशा के लिए इसी अंधेरे में डूब जाऊँगी।
और सच पूछो तो… मुझे अब दोनों में से किसी एक का भी इंतज़ार नहीं रह गया था। मुझे सिर्फ़ अगला धक्का चाहिए था। और गहरा। और अंतिम।

[…] […]