उस रात के बाद के चार दिन घर में एक अजीब सी खामोशी छाई रही। आकाश पहले से ज्यादा थके हुए लग रहे थे। रात को वे जल्दी सो जाते। मैं उनके बगल में लेटी रहती और छत को घूरती रहती। शरीर अब आदी हो चुका था खतरे का। चूत खतरे के बिना गीली नहीं होती थी। मन आकाश के प्यार और करण की क्रूरता के बीच पिसकर रह गया था।
पाँचवें दिन सुबह करण का मैसेज आया।
“आज रात अंतिम खेल है। आकाश घर पर रहेंगे। तू कुछ मत करना। बस तैयार रहना। जब मैं कहूँ, तू बोलना। आज वह भी सुनेंगे।”
मैंने मैसेज को तीन बार पढ़ा। हाथ काँप रहे थे। अंतिम खेल। आकाश सुनेंगे। इसका मतलब साफ था। अब छुपाने की कोई गुंजाइश नहीं बचेगी। या तो सब खत्म हो जाएगा… या मैं हमेशा के लिए किसी और ही औरत में बदल जाऊँगी।
शाम को आकाश घर आए। उन्होंने थैला रखा और मुझे देखा। “तुम आज बहुत उदास लग रही हो।” मैंने मुस्कुराकर कहा, “नहीं… बस थोड़ी थकान है।” वे पास आए और मेरा चेहरा अपने हाथों में लेकर बोले, “गरिमा, अगर कोई बात है तो बता देना। मैं हूँ ना।” उनकी आँखों में सच्चा प्यार था। वही प्यार जो छह साल से मुझे संभाले हुए था। उसी प्यार ने मेरे अंदर बची-खुची आत्मा को एक बार फिर से चोट पहुँचाई। मैंने उनका हाथ पकड़ लिया और कहा, “सब ठीक है आकाश। सच में।”
रात का खाना चुपचाप हुआ। टीवी चला। फिर आकाश बिस्तर पर लेट गए। मैं उनके बगल में लेटी। उन्होंने मुझे अपने से सटा लिया। दस बजे तक वे सो चुके थे। उनकी साँसें गहरी और नियमित थीं।
ठीक साढ़े दस बजे फोन में मैसेज आया।
“पिछला दरवाज़ा खोल। चुपचाप गेस्ट रूम में आ जा।”
मैं उठी। आकाश की तरफ देखा। वे गहरी नींद में थे। मैंने धीरे से अपना हाथ उनके माथे पर फेरा और मन ही मन कहा, “माफ करना।” फिर पिछला दरवाज़ा खोला।
करण अंदर खड़ा था। उसके पीछे अंधेरे में विकास की छाया भी दिखी। दोनों अंदर आ गए। करण ने मुझे इशारे से गेस्ट रूम में ले गया। इस बार उसने दरवाज़ा पूरी तरह नहीं बंद किया। आधा खुला छोड़ दिया। बिल्कुल वैसे ही जैसे पिछले बार। लेकिन आज फर्क था। आज आकाश के बेडरूम का दरवाज़ा भी थोड़ा खुला था। आवाज़ जा सकती थी।
करण ने मुझे दीवार से लगाया। उसकी आँखों में वो पुरानी शांत क्रूरता थी। उसने धीरे से कहा, “आज तू आवाज़ नहीं रोकेगी। आज तू बोलेगी। साफ। और आकाश का नाम लेकर। समझी?”
मैंने सिर हिलाया। आँसू पहले से ही आँखों में थे। करण ने मेरी नाइटी उतार दी। मैं पूरी नंगी खड़ी थी। विकास कोने में खड़ा होकर देख रहा था। करण ने मुझे घुटनों पर बैठाया और अपना लंड निकालकर मेरे मुँह में ठूंस दिया। इस बार वह धीरे नहीं था। गले तक धक्के दे रहा था। आवाज़ें निकल रही थीं – गीली, गंदी आवाज़ें।
फिर उसने मुझे खड़ा किया और पीछे से चूत में लंड डाल दी। एक झटके में पूरी। मैंने जोर से कराह निकाली। करण ने मेरे बाल पकड़कर कहा, “बोल।”
“आकाश…” मेरी आवाज़ टूट रही थी। “आकाश… तेरी बीवी की चूत में लंड है… किसी और की…”
करण ने और जोर से धक्का मारा। “पूरा बोल। साफ बोल।” “करण… मुझे चोद रहा है… तेरे घर में… तेरे सोते हुए… मेरी चूत फाड़ रहा है… और मुझे मज़ा आ रहा है…”
मेरी आवाज़ अब कमरे में गूँज रही थी। विकास ने अपनी पेंट खोली और मोटा लंड निकालकर हिलाने लगा। करण ने मुझे पलटाया और गाँड में लंड डाल दी। दर्द के साथ चीख निकल गई।
“आकाश… माफ करना… तेरी बीवी की गाँड में लंड जा रही है… तू सो रहा है… और मैं… मैं ले रही हूँ…”
तभी… बेडरूम की तरफ से आवाज़ आई। बिस्तर की चरमराहट।
मेरा खून ठनका। करण रुका नहीं। उसने और तेज़ गाँड मारी। विकास करीब आ गया। करण ने मेरे मुँह में दो उँगलियाँ ठूंस दीं और पीछे से लगातार चोदता रहा।
“बोल… और जोर से बोल…” “आकाश… मैं रंडी बन गई हूँ… दो मर्दों की… तेरे घर में… तेरे रहते हुए…”
अचानक बेडरूम का दरवाज़ा और खुला। रोशनी का हल्का सा टुकड़ा गेस्ट रूम तक आया। आकाश खड़े थे।
समय जैसे रुक गया।
आकाश ने देखा – उनकी पत्नी नंगी, दीवार से लगी हुई, एक मर्द पीछे से उसकी गाँड में लंड डाले हुए, दूसरा मर्द सामने खड़ा अपना लंड हिला रहा है। और उनकी पत्नी की आँखों में आँसू हैं… लेकिन मुँह से गंदी गालियाँ और उनका नाम निकल रहा है।
करण ने लंड नहीं निकाली। उसने सिर्फ़ मेरे बाल और कसकर पकड़े और धीरे से कहा, “अब देख। अंतिम दृश्य।”
आकाश एक शब्द नहीं बोले। उनका चेहरा सफेद पड़ गया था। वे बस देखते रहे। करण ने मेरे कान में कहा, “अब झेड़। उनके देखते हुए।”
उसने जोर के धक्के दिए। मैं रोते हुए झड़ गई। शरीर काँप रहा था। करण ने भी गाँड के अंदर ही झड़ दिया। गर्म पानी की धार के साथ उसने लंड बाहर निकाली। पानी मेरी जाँघों पर बहने लगा। विकास भी उसी वक्त सामने झड़ गया। उसका पानी फर्श पर गिरा।
करण ने मुझे छोड़ दिया। मैं दीवार से लगकर फर्श पर बैठ गई। नंगी। दोनों मर्दों का पानी शरीर पर लगा हुआ। आँसू और मेकअप मिला हुआ चेहरा।
आकाश अभी भी खड़े थे। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं था। सिर्फ़ एक गहरा, टूटा हुआ अविश्वास था। उन्होंने धीरे से सिर्फ़ इतना कहा,
“गरिमा…”
बस एक शब्द।
करण ने अपनी पेंट पहनते हुए आकाश की तरफ देखा। “अब आप सब जान गए हैं। गरिमा अब सिर्फ़ आपकी नहीं रही। वह लंबे समय से हमारी है। अगर आप चाहते हैं तो सब खत्म कर सकते हैं। या… अगर आप समझदार हैं तो ये खेल जारी रह सकता है। फैसला आपका।”
विकास चुपचाप निकल गया। करण ने मेरे सिर पर हाथ रखा और कहा, “तूने अच्छा खेला। अब आराम कर।” फिर वह भी निकल गया।
घर में सिर्फ़ मैं और आकाश बचे थे।
मैं अभी भी फर्श पर नंगी बैठी थी। आकाश ने कुछ देर बाद धीरे से मेरी नाइटी उठाई और मेरे ऊपर डाल दी। फिर वे मुड़कर बेडरूम में चले गए। दरवाज़ा बंद कर लिया।
मैं उसी जगह बैठी रही।
रात भर कोई आवाज़ नहीं आई।
सुबह जब मैं उठी तो आकाश किचन में चाय बना रहे थे। उन्होंने मेरे लिए भी कप रखा। सामान्य। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा,
“आज से तुम जो चाहो कर सकती हो। लेकिन घर में नहीं। और मुझे मत बताना। मैं नहीं सुनना चाहता।”
फिर वे ऑफिस चले गए।
मैं खाली घर में बैठी रही।
फोन पर करण का मैसेज आया।
“अब तू आज़ाद है। और पूरी तरह बंधी भी। जब चाहे बुलाना। दोनों में से कोई भी।”
मैंने मैसेज पढ़ा। फिर आकाश का छोड़ा हुआ चाय का कप देखा।
छह साल का प्यार, शादी, इज्जत… सब एक रात में बदल चुका था।
अब मैं आकाश की पत्नी थी… लेकिन उनकी औरत नहीं रही।
अब मैं सिर्फ़ गरिमा थी। लंड की भूखी। दो मर्दों की। और अपनी ही गंदगी में खुश।
मैंने फोन उठाया और करण को जवाब लिखा –
“अगली बार दोनों एक साथ आना।”
भेज दिया।
फिर मैंने आँखें बंद कर लीं।
कहानी यहीं खत्म नहीं हुई थी। अब असल जिंदगी शुरू हुई थी। और इस जिंदगी में… शर्म का कोई जगह नहीं बचा था।
