मेरा नाम कविता है। उम्र बत्तीस साल।
लोग मुझे “चाची” कहकर बुलाते हैं। असल में मैं अनन्या की सगी चाची नहीं हूँ। अनन्या मेरी बहुत पुरानी सहेली की बेटी है। सहेली के निधन के बाद मैंने अनन्या को अपनी बेटी जैसा ही पाला-पोसा। रिश्ते में वह मुझे चाची कहती है, और मैंने कभी सुधारा नहीं। अब उसकी शादी तय हो चुकी थी। शादी से एक दिन पहले का दिन था।
अनन्या का परिवार शगुन लेने हमारे शहर आया था। दूल्हा पक्ष भी उसी होटल में ठहरा हुआ था। होटल बड़ा था, शहर के अच्छे इलाके में। बैंक्वेट हॉल में रस्में होनी थीं, और कमरे ऊपर के फ्लोर पर थे।
दूल्हे का नाम था विवान। उम्र सत्ताईस साल। लंबा कद, साफ-सुथरा गेहुँआ चेहरा, हल्की दाढ़ी, और काली आँखें जिनमें एक अजीब सी शांति थी। पहली बार जब मैंने उसे देखा तो लगा कि अनन्या ने अच्छा चुना है। वह बिल्कुल भद्र, संभला हुआ और परिवार वाला लग रहा था। बातें कम करता था, लेकिन जब बोलता तो वाक्य पूरे और साफ होते थे।
शगुन की रस्म शाम चार बजे शुरू हुई। मैंने लाल रंग की साड़ी पहनी थी। ब्लाउज थोड़ा गहरा था, लेकिन intra मर्यादा में। बालों में हल्की खुशबूदार तेल की महक थी। गले में हल्के गहने। मैं अनन्या के परिवार के साथ खड़ी थी। विवान अपने माता-पिता और कुछ रिश्तेदारों के साथ आया। जब हमारी नज़रें पहली बार मिलीं तो वह एक पल के लिए रुक गया। फिर विनम्रता से हाथ जोड़कर नमस्कार किया। लेकिन उस एक पल की नज़र में कुछ ऐसा था जो सामान्य नमस्कार में नहीं होता। मैंने अनदेखा कर दिया।
रस्म चलती रही। नारियल, मिठाई, कपड़े, और आशीर्वाद का सिलसिला। मैं बीच-बीच में अनन्या की साड़ी ठीक करती, उसके बाल सँवारती। विवान अपनी जगह पर शांत खड़ा रहा। कभी-कभी उसकी नज़रें मेरी तरफ उठ जातीं, फिर तुरंत हट जातीं।
रस्म के बाद हल्के नाश्ते का दौर चला। लोग समूह बनाकर बातें कर रहे थे। मैं थोड़ी अलग एक कोने में खड़ी थी। तभी विवान अचानक मेरे पास आ गया। हाथ में पानी का गिलास था।
“आप अनन्या की चाची हैं न?” उसने पूछा। आवाज कम थी। “हाँ,” मैंने मुस्कुराते हुए कहा। “आप इस भीड़ में थोड़ी अलग लग रही हैं।”
मैंने हल्के से हँसी। “अब उम्र हो गई है विवान। आप लोग जवान हो। हम लोग तो बस रस्म निभाने आते हैं।” “उम्र चेहरे पर नहीं दिखती,” उसने सीधा कहा। फिर जैसे खुद को सँभालते हुए बोला, “माफ कीजिए। मेरा गलत मतलब नहीं था।”
मैंने कुछ नहीं कहा। बस गिलास से पानी पी लिया। वह कुछ और कहना चाहता था, लेकिन पीछे से उसके चाचा ने आवाज लगाई। वह चला गया। लेकिन उसकी आवाज और वह एक वाक्य मेरे मन में घूमता रहा।
रात के लगभग साढ़े दस बजे रस्में खत्म हुईं। ज्यादातर लोग थककर अपने कमरों में चले गए। अनन्या और उसके माता-पिता भी ऊपर चले गए। मैं अकेली अपने कमरे में लौटी। कमरा तीसरी मंजिल पर था। बालकनी से शहर की लाइटें दिख रही थीं। नींद बिल्कुल नहीं आ रही थी। मैंने साड़ी नहीं उतारी थी। बस पल्लू ठीक करके बालकनी में खड़ी हो गई। मन अजीब उलझा हुआ था।
तभी कमरे के दरवाजे पर बहुत हल्की सी दस्तक हुई। इतनी हल्की कि पहले लगा शायद भ्रम है। फिर दोबारा हुई। मैंने दरवाजा खोला तो विवान खड़ा था। सफेद शर्ट में, आस्तीन ऊपर चढ़े हुए। बालों में हल्की बेतरतीबी। आँखों में नींद के बजाय एक बेचैनी थी।
“क्या बात है?” मैंने धीरे से पूछा। “सो नहीं पा रहा,” उसने सीधा कहा। “आपसे बात करनी थी। पाँच मिनट।”
मैंने उसे अंदर आने का इशारा किया। दरवाजा बंद किया। कमरे में सिर्फ़ एक टेबल लैंप जल रहा था। रोशनी पीली और मंद थी। विवान ने अंदर आकर मेरी तरफ देखा। मेरी साड़ी का पल्लू एक तरफ खिसका हुआ था। ब्लाउज का गहरा नेकलाइन और हल्की त्वचा साफ दिख रही थी।
“कल मेरी शादी है,” उसने अचानक कहा। आवाज में तनाव था। “हाँ, पता है।” “लेकिन मन कहीं और अटक गया है।”
मैंने उसकी तरफ देखा। वह मुझसे दो कदम दूर खड़ा था। “विवान… यह सही नहीं है। आप कल अनन्या से शादी करने वाले हैं। वह मेरी जिम्मेदारी है।” “पता है,” उसने धीमे स्वर में कहा। “लेकिन जब से मैंने आपको शाम को देखा है… कुछ गलत सोच रहा हूँ। मैंने कोशिश की अनदेखा करने की। लेकिन यहाँ खड़ा हूँ।”
वह एक कदम और पास आ गया। उसकी साँसें अब साफ महसूस हो रही थीं। मैं पीछे हटने की कोशिश करती, लेकिन दीवार आ गई। उसने धीरे से मेरा हाथ पकड़ लिया। उसका हाथ गरम और थोड़ा खुरदुरा था।
“आप मुझे रोक सकती हैं,” उसने कहा। “अभी भी समय है। दरवाजा खोलकर मुझे भगा सकती हैं।”
मैंने कुछ नहीं कहा। मेरा दिल जोर-जोर से धधक रहा था। इतने सालों बाद किसी जवान मर्द ने मुझे इस तरह देखा था। मेरे पति के साथ संबंध अब सालों से नाममात्र के रह गए थे। शरीर में एक पुरानी, दबी हुई भूख अचानक जाग रही थी। शर्म और इच्छा दोनों एक साथ थे।
विवान ने मेरा चेहरा दोनों हाथों से पकड़ा। उसकी उँगलियाँ मेरे गालों पर थीं। फिर उसने धीरे से मुझे चूम लिया। पहला चुंबन बहुत हल्का था — बस होंठों का स्पर्श। फिर धीरे-धीरे गहरा होता गया। उसकी जीभ मेरे होंठों पर फेरी, फिर मुँह में घुस आई। मैं काँप रही थी। मेरे हाथ उसकी छाती पर थे, लेकिन धक्का देने के बजाय मैंने शर्ट के कपड़े को पकड़ लिया। उसके हाथ मेरी कमर पर चले गए। साड़ी के ऊपर से मेरी गरमाहट महसूस हो रही थी।
चुंबन टूटा तो दोनों की साँसें तेज और गरम थीं। हमारे माथे लगभग छू रहे थे। “कविता जी… मुझे रोक दीजिए,” उसने फिर से कहा। आवाज में अब अनुरोध था। “रोक नहीं पा रही,” मेरे मुँह से निकल गया।
उसने मुझे और जोर से चूम लिया। इस बार चुंबन में भूख थी। उसके हाथ मेरी साड़ी के पल्लू के अंदर चले गए। ब्लाउज के ऊपर से उसने मेरे स्तनों को धीरे से दबाया। निप्पल पहले से सख्त हो चुके थे। उसने ब्लाउज के हुक खोलने शुरू कर दिए। एक… दो… तीन…
ब्लाउज ढीला पड़ गया। मेरे स्तन बाहर आने को थे। विवान ने मेरी आँखों में देखते हुए बहुत धीमे स्वर में कहा,
“कल मैं घोड़ी पर चढ़ूँगा… लेकिन उससे पहले मैं आप पर चढ़ना चाहता हूँ।”
मैंने कुछ नहीं कहा। बस उसकी आँखों में देखती रही। मेरी साँसें तेज चल रही थीं।
उसने मेरा ब्लाउज पूरी तरह खोल दिया।
मेरे स्तन बाहर आ गए। बत्तीस साल की उम्र में भी वे भारी और सघन थे। निप्पल सख्त और काले हो चुके थे। विवान ने कुछ पल तक उन्हें देखा। फिर दोनों हाथों से पकड़कर जोर से मसला। उसकी उँगलियाँ निप्पल को दबा रही थीं, मरोड़ रही थीं। मैं दीवार से लगी कराह उठी।
“आह्ह… धीरे…” “धीरे नहीं चलेगा कविता जी,” उसने भारी आवाज में कहा। “मैं सुबह से आपको देख रहा हूँ। अब रोक नहीं सकता।”
वह झुका और एक निप्पल मुँह में ले लिया। जोर से चूसने लगा। दाँतों से हल्के-हल्के काटा। जीभ से गोल-गोल घुमाया। मैं उसके बाल पकड़कर खड़ी रही। मेरी साड़ी का पल्लू पूरी तरह खिसक चुका था। उसने दूसरा निप्पल भी उसी तरह सताया। दोनों स्तनों को बारी-बारी से चूसता रहा। मेरी साँसें तेज हो गईं। चूत में पानी आने लगा।
थोड़ी देर बाद उसने मेरी साड़ी का नाड़ा खोला। साड़ी और पेटीकोट एक साथ नीचे खिसक गए। अब मैं सिर्फ़ पैंटी में थी। विवान ने मुझे घूरते हुए पैंटी भी नीचे खींच दी। मैं पूरी नंगी उसके सामने खड़ी थी। होटल के कमरे में पंखे की आवाज के अलावा सिर्फ़ हमारी साँसें सुनाई दे रही थीं।
उसने मुझे बिस्तर की तरफ धकेला। मैं बिस्तर पर गिर गई। वह जल्दी-जल्दी अपनी शर्ट और पैंट उतारने लगा। उसका शरीर युवा और मजबूत था। जब उसने अंडरवियर उतारा तो उसका मोटा लंड बाहर निकल आया — लंबा, तना हुआ, नसों वाला। मैंने देखा और गला सूख गया।
“डरो मत,” उसने कहा। “मैं ध्यान रखूँगा।”
वह मेरे ऊपर चढ़ आया। पहले उसने हाथ से मेरी चूत सहलाई। दो उँगलियाँ अंदर डालकर तेजी से हिलाने लगा। मैं पहले से बहुत गीली थी। उँगलियों पर मेरा पानी चमक रहा था। फिर उसने अपना मोटा लंड मेरी चूत के मुँह पर रखा और धीरे-धीरे दबाव दिया।
“आह्ह… विवान… धीरे…” “सह लो… थोड़ा और…”
वह धीरे-धीरे अंदर घुसता गया। मेरी चूत उसके मोटे लंड से फैल रही थी। जब पूरा अंदर तक चला गया तो वह कुछ पल रुका रहा। दोनों की धड़कनें एक-दूसरे से टकरा रही थीं। फिर उसने बहुत धीमे-धीमे हिलेगा शुरू किया। लंबे-लंबे धक्के।
“कितनी टाइट हो तुम… सालों बाद किसी ने छुआ है क्या?” मैंने आँखें बंद करके सिर हिलाया। “हाँ…”
उसकी रफ्तार धीरे-धीरे बढ़ने लगी। धक्के गहरे होने लगे। बिस्तर हल्की आवाज करने लगा। मेरे स्तन उसके हर धक्के के साथ हिल रहे थे। उसने मेरा मुँह चूम लिया। गालियाँ तक निकलने लगीं।
“कल घोड़ी पर चढ़ूँगा… लेकिन आज रात तुम पर चढ़ रहा हूँ… तेरी चूत कितनी गरम है…” “आह्ह… जोर से… थोड़ा और जोर से…”
विवान ने मेरी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रख लीं। इस पोजीशन में उसका मोटा लंड और गहराई तक जा रहा था। हर धक्का मेरी चूत को पूरी तरह भर रहा था। मैं चीख रही थी। कमरे में आवाज न जाए इसलिए तकिया दबा लिया।
“बोलो… कैसा लग रहा है?” “बहुत… बहुत गहरा… मेरी चूत फट रही है…” “फाड़ दूँगा। आज रात पूरी तरह याद रखोगी।”
वह और तेज हो गया। पसीना दोनों के शरीर पर चमक रहा था। थोड़ी देर बाद उसने लंड निकाली और मुझे पलटा दिया। घुटनों के बल कर दिया। पीछे से फिर से मोटा लंड मेरी चूत में एक झटके में डाल दिया। एक हाथ से मेरे बाल पकड़े और दूसरे से मेरी गाँड पर थप्पड़ मारने लगा।
“कविता जी… आपकी गाँड भी कितनी गोल है… कल सबके सामने घोड़ी चढ़ूँगा… लेकिन रात को आपकी इस गाँड को भी याद रखूँगा…”
मैं कराह रही थी। वह जोर-जोर से पीछे से चोद रहा था। फिर उसने लंड निकालकर मेरी गाँड की सेंध पर रख दी।
“यहाँ भी डालूँ?” मैंने दाँत भींचकर कहा, “डाल… धीरे से…”
उसने थूक लगाकर धीरे-धीरे अपना मोटा लंड मेरी गाँड में धकेलना शुरू किया। दर्द तेज था। मैं तकिया में मुँह दबाए लेटी रही। जब आधा अंदर गया तो उसने रुककर पूछा, “अब?” “पूरा डाल… चोद…”
वह पूरा अंदर तक ले गया। फिर धीमे लेकिन भारी धक्के लगाने लगा। मेरी गाँड उसके मोटे लंड से फैल रही थी। दर्द और मजे का मिश्रण पागल कर रहा था।
“आह्ह… विवान… गाँड फट रही है… लेकिन मत रुकना…” “नहीं रुकूँगा। आज रात तुम्हारी दोनों होल लेनी हैं।”
वह बारी-बारी से मेरी चूत और गाँड में लंड मारने लगा। कभी चूत में दस-बारह जोरदार धक्के, फिर निकालकर गाँड में। गालियाँ, थप्पड़, बाल खींचना… सब कुछ। मैं कई बार झड़ चुकी थी। शरीर काँप रहा था। आखिर में उसने मेरी चूत में ही बहुत जोरदार धक्कों के साथ झड़ दिया। गर्म गाढ़ा पानी की तेज धार मुझे महसूस हुई। वह मेरे ऊपर गिर पड़ा। दोनों पसीने से तरबतर थे। साँसें उखड़ी हुईं।
बहुत देर तक कोई नहीं बोला। फिर विवान ने मेरे बाल सहलाते हुए धीमे स्वर में कहा,
“कल मैं घोड़ी पर चढ़ूँगा… लेकिन आज रात मैं आप पर चढ़ चुका हूँ कविता जी। यह बात सिर्फ़ हम दोनों जानेंगे।”
मैंने आँखें बंद कर लीं। शरीर में दर्द था। चूत और गाँड दोनों जल रहे थे। अंदर उसका पानी अभी भी था। लेकिन अंदर एक अजीब सी शांति भी थी।
