प्रतिक्षा Part 5: तीन लंड एक साथ – मुँह, चूत और गाँड में

पार्ट 4 के बाद की सुबह बहुत भारी थी।

शरीर में दर्द था। चूत और गाँड दोनों सूजी हुई थीं। जाँघों के अंदर अभी भी सूखा हुआ पानी चिपका हुआ था। बिस्तर पर पड़ी-पड़ी मैं छत को घूर रही थी। कल रात दो मर्दों ने मुझे एक साथ लिया था। राजवीर और विक्रम। दोनों के लंड एक साथ मेरे अंदर थे। दोनों ने गालियाँ दीं। दोनों ने मुझे रंडी कहा। और मैंने एक बार भी “ना” नहीं कहा।

फोन पर राजवीर का मैसेज आया हुआ था: “शाम को आना। अकेले। आज कुछ नया होगा।”

मैंने मैसेज पढ़ा और फोन एक तरफ रख दिया। शरीर में दर्द के साथ एक अजीब सी खालीपन भी थी। पहले राजवीर अकेला आता था। फिर विक्रम जुड़ गया। अब “कुछ नया” क्या होने वाला था? मन में डर था, लेकिन उसके नीचे एक बेचैनी भी थी जो मैं खुद से छुपा नहीं पा रही थी।

दिन बहुत धीरे बीता। कॉलेज गई, लेकिन ध्यान कहीं नहीं था। लेक्चर सुनाई नहीं दिए। वापस आकर नहाया। आईने के सामने खड़ी रही। शरीर पर कल रात के निशान अभी भी हल्के-हल्के दिख रहे थे। स्तनों पर दाँतों के निशान, कमर पर उँगलियों के निशान, और जाँघों के अंदर हल्की रगड़।

शाम के पाँच बजे फिर से मैसेज आया: “7 बजे तैयार रह। आज मैं तुझे लेने आऊँगा।”

मैंने सिर्फ़ “ठीक है” लिखा।

सात बजे राजवीर की गाड़ी गेट पर खड़ी थी। काले रंग की। मैंने साधारण कुर्ती-पैजामा पहना था। गाड़ी में बैठते ही उसने मेरी तरफ देखा।

“कल रात कैसी लगी?” मैंने जवाब नहीं दिया। “बोल।” “दर्द हो रहा है…” “दर्द तो होना ही है। तू अब दो मर्दों की हो चुकी है। आदत पड़ जाएगी।”

वह गाड़ी स्टार्ट करके निकल पड़ा। रास्ता अलग था। पहले वाले फ्लैट की तरफ नहीं जा रहा था। मैंने पूछा, “कहाँ ले जा रहे हो?” “एक नई जगह। आज सिर्फ़ मैं और तू नहीं होंगे।”

मेरा दिल बैठ गया। “विक्रम फिर से?” “विक्रम तो आएगा ही। आज एक और भी होगा।”

मैंने उसकी तरफ देखा। वह शांत चेहरे से गाड़ी चला रहा था। “तीन…?” “हाँ। आज तीन मर्द। तेरी तीनों होल एक साथ भरी जाएँगी। तैयार रह।”

मैं चुप हो गई। खिड़की के बाहर अँधेरा बढ़ रहा था। मन में एक ही बात घूम रही थी — तीन मर्द। एक मुँह में, एक चूत में, एक गाँड में। क्या मैं सहन कर पाऊँगी? पिछले बार दो से ही शरीर टूट गया था।

लगभग चालीस मिनट बाद गाड़ी एक पुराने से गेस्ट हाउस के आगे रुकी। बाहर से साधारण लग रहा था। राजवीर ने मुझे अंदर ले गया। ऊपर दूसरी मंजिल पर एक कमरा था। दरवाजा खुलते ही अंदर विक्रम पहले से बैठा था। उसके साथ एक और आदमी खड़ा था। उम्र करीब बयालीस-तैंतालीस की। भारी बदन, गंजा होता सर, और आँखों में खुली हुई हवस।

राजवीर ने कहा, “यह महेश हैं। मेरे पुराने पार्टनर। आज तू तीनों की सेवा करेगी।”

महेश ने मुझे ऊपर से नीचे तक घूरा। मुस्कुराते हुए बोला, “क्या माल है राजवीर। इतनी कम उम्र की। आज मजा आएगा।”

मैं दरवाजे के पास खड़ी काँप रही थी। राजवीर ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। “कपड़े उतार। अब देर मत कर।”

मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने कुर्ती के बटन खोले। फिर पैजामा। आखिर में ब्रा और पैंटी। तीन मर्दों के सामने पूरी नंगी खड़ी थी। कमरे में पंखे की आवाज के अलावा सन्नाटा था। तीनों की नज़रें मेरे शरीर पर थीं।

राजवीर ने मुझे घुटनों के बल बिठा दिया। “पहले तीनों का लंड चूस। एक-एक करके। फिर एक साथ।”

तीनों ने अपनी पैंट खोली। राजवीर का मोटा लंड मैं पहचानती थी। विक्रम का लंबा और मुड़ा हुआ। महेश का लंड मोटा और थोड़ा छोटा था, लेकिन बहुत मोटा। मैंने पहले राजवीर का लंड मुँह में लिया। गहराई तक चूसा। फिर विक्रम का। फिर महेश का। तीनों बारी-बारी से मेरे मुँह में लंड ठूंसने लगे। कभी एक गले तक जाता, कभी दूसरा। मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। थूक लंडों पर गिर रहा था। गला भर रहा था।

“बढ़िया चूस रही है रंडी,” महेश ने कहा। “आज तीनों होल एक साथ भरेंगे इसकी,” विक्रम ने जवाब दिया।

थोड़ी देर बाद राजवीर ने मुझे उठाया और बिस्तर पर लिटा दिया। वह मेरे ऊपर चढ़ गया। अपना मोटा लंड मेरी चूत पर रगदते हुए बोला,

“आज तेरी सीमाएँ पूरी तरह टूटेंगी प्रतिक्षा। तैयार रह।”

उसने एक झटके में अपना मोटा लंड मेरी चूत में डाल दिया। मैं चीख उठी।

राजवीर ने एक झटके में अपना मोटा लंड मेरी चूत में डाल दिया। मैं जोर से चीख उठी। दर्द और अचानक भरे जाने के अहसास से मेरा शरीर अकड़ गया। वह बिना किसी रहम के जोर-जोर से चोदने लगा। हर धक्का गहरा और भारी था। बिस्तर हिल रहा था। विक्रम मेरे सिर के पास आकर खड़ा हो गया। उसने मेरे बाल पकड़े और अपना लंबा लंड मेरे मुँह में ठूंस दिया। मैंने गला खोलने की कोशिश की लेकिन वह गहराई तक जा रहा था। आँखों से पानी बहने लगा। महेश ने मेरे दोनों हाथ पकड़कर अपना मोटा लंड मेरे हाथों में थमा दिया।

अब एक लंड मेरी चूत में था, एक मुँह में, और एक हाथ में। तीनों एक साथ मेरे शरीर का इस्तेमाल कर रहे थे। राजवीर नीचे से जोर-जोर से धक्के मार रहा था, विक्रम मेरे मुँह में लंड ठूंस-ठूंसकर गला चोद रहा था, और महेश मेरे हाथों से अपना लंड तुड़वाने लगा।

“आह्ह… उम्मम्म… गला… भर गया…” मैं सिर्फ़ अस्पष्ट आवाजें निकाल पा रही थी।

“चुपचाप चूस रंडी,” विक्रम ने कहा। “आज तीनों को संतुष्ट करना है।”

वे लगभग बीस मिनट तक इसी तरह मुझे इस्तेमाल करते रहे। जब मेरा गला बैठने लगा तो राजवीर ने लंड निकाली और विक्रम से कहा, “अब तू चूत ले। मैं इसकी गाँड खोलता हूँ। महेश मुँह सँभाल।”

विक्रम मेरे ऊपर आ गया। उसका मुड़ा हुआ लंड मेरी चूत में घुसते ही एक अलग कोण का दबाव महसूस हुआ। वह जोर से चोदने लगा। राजवीर ने लूब्रिकेंट की बोतल निकाली और मेरी गाँड की सेंध पर खूब लगाई। फिर अपना मोटा लंड वहाँ रख दिया और धीरे-धीरे दबाव देना शुरू किया।

“आह्ह्ह… दोनों एक साथ… बहुत दर्द हो रहा है… रुक जाओ प्लीज…” “सह ले। आज तीन मर्द हैं। आदत पड़ जाएगी,” राजवीर ने कहा और अपना लंड मेरी गाँड में धीरे-धीरे धकेलता गया।

जब दोनों लंड पूरी तरह अंदर तक चले गए तो मेरा शरीर काँप उठा। एक चूत में, एक गाँड में। दोनों मोटे लंड एक साथ अंदर थे। महेश ने फिर से अपना लंड मेरे मुँह में ठूंस दिया। अब तीनों होल भरे हुए थे। तीनों एक साथ धक्के मारने लगे। एक अंदर जाता तो दूसरा बाहर निकलता। शरीर में तीन मोटे लंड का आना-जाना असहनीय और नशे जैसा था। दर्द और मजे का भारी मिश्रण पूरे शरीर में दौड़ रहा था। मैं चीख रही थी। आँसू बह रहे थे। तीनों गालियाँ बरसाने लगे।

“कितनी टाइट गाँड है इसकी साले…” “चूत भी पानी छोड़ रही है… देखो कैसे सिकुड़ रही है…” “मुँह भी गर्म और गीला है… बढ़िया रंडी है…” “आज तीनों होल फाड़ दो इसकी… पूरी तरह तोड़ दो…”

वे लगभग पचास मिनट तक इसी तरह एक साथ चोदते रहे। मेरी आवाज पूरी तरह बैठ गई थी। शरीर पसीने से तरबतर था। बाल चेहरे पर चिपक गए थे। साँसें फूल रही थीं। फिर उन्होंने पोजीशन बदली।

राजवीर नीचे लेट गया। उसने मुझे अपने मोटे लंड पर बैठाया। मेरी चूत में उसका लंड पूरा अंदर चला गया। विक्रम ने पीछे से आकर मेरी गाँड में अपना लंड डाल दिया। महेश सामने आकर खड़ा हो गया और अपना लंड फिर से मेरे मुँह में ठूंस दिया।

अब मैं तीनों के बीच में पूरी तरह फँसी हुई थी। ऊपर-नीचे हो रही थी। तीनों लंड एक साथ अंदर-बाहर हो रहे थे। शरीर पिसा जा रहा था। हर धक्के पर तीनों होल एक साथ भर रहे थे।

“बोल… तू किसकी रंडी है?” राजवीर ने नीचे से जोर से पूछा। “आप तीनों की… आपकी तीनों की रंडी हूँ… चोदो मुझे… फाड़ दो…” “जोर से बोल। पूरा वाक्य बोल।” “मैं राजवीर, विक्रम और महेश तीनों की रंडी हूँ… मेरी चूत, मेरी गाँड और मेरा मुँह तीनों के हैं… जितना चाहो चोदो… फाड़ दो दोनों होल…”

वे और तेजी से धक्के मारने लगे। बिस्तर जोर-जोर से चरमरा रहा था। कमरे में सिर्फ़ शरीर की आवाजें, गालियाँ, थप्पड़ों की आवाज और मेरी दबी हुई चीखें गूँज रही थीं। मैं कई बार झड़ चुकी थी। शरीर में कोई ताकत नहीं बची थी। पैर काँप रहे थे।

आखिर में पहले महेश ने मेरे मुँह में जोर से झड़ दिया। गर्म गाढ़ा पानी गले में भर गया। मैंने खांसते हुए सब निगल लिया। फिर विक्रम ने मेरी गाँड में बहुत जोरदार धक्कों के साथ झड़ दिया। गर्म पानी की तेज धार महसूस हुई। वह निकालकर एक तरफ गिर गया। आखिर में राजवीर ने मुझे कसकर पकड़ा और मेरी चूत में ही बहुत जोर से झड़ गया। उसका पानी भी अंदर भर गया।

मैं तीनों के बीच गिरी पड़ी थी। शरीर काँप रहा था। तीनों होल से पानी बह रहा था। जाँघें खुली हुईं। आँखों से आँसू बह रहे थे। साँसें उखड़ी हुईं। कमरे में सिर्फ़ पंखे की आवाज और हमारी भारी साँसें सुनाई दे रही थीं।

राजवीर ने मेरे बाल सहलाते हुए धीमे लेकिन साफ स्वर में कहा, “आज से तू सिर्फ़ मेरी और विक्रम की नहीं रही। महेश भी तेरा मालिक है। जब भी हम तीनों में से कोई कहेगा, तू आएगी। समझ गई?”

मैंने आँखें बंद करके सिर्फ़ सिर हिलाया। बोलने की ताकत नहीं बची थी।

तीनों ने नहाकर कपड़े पहने। जाने से पहले महेश ने मेरी खुली हुई गाँड पर एक जोर का थप्पड़ मारा और बोला, “अगली बार और मजे लेंगे। तेरी गाँड बहुत पसंद आई। अगली बार अकेले भी लूँगा।”

विक्रम ने मेरी चूत पर हाथ फेरा और कहा, “तड़पती रहेगी अब तू। तीन लंड के बिना चैन नहीं पड़ेगा।”

राजवीर ने सबसे आखिर में मेरे चेहरे के पास झुककर कहा, “सो जा। कल बात करते हैं।”

दरवाजा बंद हुआ। कमरे में सन्नाटा छा गया।

मैं बिस्तर पर नंगी पड़ी रही। शरीर दर्द से काँप रहा था। तीनों होल जल रहे थे। अंदर उनका पानी अभी भी था। जाँघों के अंदर तक गीलापन था। लेकिन सबसे ज्यादा जलन इस बात की थी कि मैंने फिर से एक बार भी “ना” नहीं कहा था।

राजवीर ने अब मुझे तीन मर्दों की रंडी बना दिया था। और यह सिलसिला अब रुकने वाला नहीं था। आगे और मर्द जुड़ सकते थे। और मैं… मैं चुपचाप लेती चली जाऊँगी।

क्योंकि अब मेरे पास हारने के लिए कुछ बचा ही नहीं था।

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