उस एक वाक्य ने मेरे अंदर एक अजीब सा डर बैठा दिया था। पाँच लंबे दिन बीत गए। हर शाम दरवाजे की घंटी की आशंका से मेरा दिल बैठ जाता। मैं बार-बार घड़ी देखती। छह बजे, साढ़े छह, सात… जब घंटी नहीं बजती तो राहत मिलती, लेकिन साथ में एक अजीब सी बेचैनी भी रहती। शरीर में पिछली चुदाई का दर्द अभी पूरी तरह नहीं गया था। गाँड में हल्की जलन रह-रहकर उठती। चूत छूने पर भी संवेदनशील लगती। लेकिन दर्द से ज्यादा भारी था वह ख्याल कि अब एक नहीं, दो मर्द एक साथ मेरे शरीर का इस्तेमाल करने वाले हैं।
मैं दिन भर फ्लैट में इधर-उधर घूमती रहती। कभी बालकनी में खड़ी होकर नीचे सड़क देखती, कभी किचन में जाकर पानी पीती, कभी बिस्तर पर लेटकर छत को घूरती। मन बार-बार उसी ख्याल पर चला जाता — जब दो मोटे लंड एक साथ अंदर होंगे तो कैसा लगेगा? क्या मैं सहन कर पाऊँगी? क्या चीखते-चीखते बेहोश हो जाऊँगी? और सबसे डरावना सवाल — क्या मेरे मुँह से फिर से “ना” नहीं निकलेगा?
रात को नींद नहीं आती थी। उँगलियों से अपनी चूत सहलाती तो राजवीर का मोटा लंड याद आ जाता। कभी विक्रम का चेहरा कल्पना में आ जाता जिसे मैंने अभी तक देखा तक नहीं था। शरीर तड़पता, लेकिन मन डरता।
पाँचवें दिन शाम को ठीक साढ़े छह बजे घंटी बजी। मैं दरवाजे के पास काँपते हुए गई। हाथों में पसीना था। आँखों के सामने अंधेरा सा छा गया। दरवाजा खोला तो राजवीर खड़ा था। काली शर्ट में, चेहरे पर शांत मुस्कान। उसके पीछे एक और आदमी खड़ा था। उम्र करीब अड़तीस-चालीस की, लंबा, मजबूत कंधे, सांवला चेहरा, हल्की दाढ़ी और आँखों में ऐसी खुली हुई भूख जैसे वह बहुत दिनों से भूखा हो। राजवीर ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा,
“यह मेरे बहुत खास दोस्त हैं… विक्रम। आज तू दोनों की सेवा करेगी। अंदर आ जा।”
मैं पीछे हटते-हटते हॉल में चली गई। विक्रम ने मुझे ऊपर से नीचे तक इस तरह घूरा जैसे वह मेरे कपड़ों के अंदर की हर चीज देख रहा हो। राजवीर ने दरवाजा बंद किया और कुंडी लगा दी। उसने पास आकर मेरा हाथ पकड़ा। उसका हाथ ठंडा और मजबूत था।
“डर मत प्रतिक्षा। आज तेरी दोनों होल एक साथ इस्तेमाल होंगी। कपड़े धीरे-धीरे उतार।”
मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने पहले नाइटी के फीते खोले। नाइटी फर्श पर गिर गई। अब मैं सिर्फ़ एक पतली पैंटी में थी। राजवीर ने खुद झुककर मेरी पैंटी नीचे खींच दी। मैं दोनों मर्दों के सामने पूरी नंगी खड़ी थी। ठंडी हवा मेरे शरीर से टकरा रही थी। विक्रम ने सीटी मारी और बोला,
“क्या बॉडी है साले राजवीर। इतनी कम उम्र में इतनी बढ़िया चूत और गाँड। स्तन भी एकदम जवाँ। आज मजा आएगा।”
राजवीर ने मुझे बालों से पकड़कर घुटनों के बल बिठा दिया। “पहले दोनों का लंड चूस। अच्छे से। गले तक ले जा। किसी को अधूरा मत छोड़।”
दोनों ने अपनी पैंट और अंडरवियर एक साथ उतार दिए। राजवीर का मोटा लंड तो मैं पहचानती थी — लंबा, मोटा, नसों वाला और सिर चमकता हुआ। विक्रम का लंड थोड़ा ज्यादा लंबा था और ऊपर की तरफ हल्का मुड़ा हुआ। मैंने पहले राजवीर का लंड हाथ में लिया और मुँह में डाल लिया। गहराई तक ले गई। फिर विक्रम का लंड मुँह में लिया। दोनों बारी-बारी से मेरे मुँह में लंड ठूंसने लगे। कभी एक गले तक जाता, कभी दूसरा। मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। थूक उनकी लंडों पर गिर-गिरकर चमक रहा था। गला भर रहा था। साँस लेने में तकलीफ हो रही थी।
“बढ़िया चूस रही है रंडी,” विक्रम ने कहा। उसकी आवाज भारी और उत्तेजित थी। “आज दोनों होल फाड़ेंगे इसकी,” राजवीर ने जवाब दिया। “देखियो कैसे तड़पती है यह।”
वे लगभग बीस-पच्चीस मिनट तक मेरे मुँह का इस्तेमाल करते रहे। जब मेरा गला बैठने लगा और आँखों के आगे अंधेरा छा गया तो राजवीर ने मुझे उठाया और बिस्तर पर लिटा दिया। वह मेरे ऊपर चढ़ गया। अपने मोटे लंड को मेरी चूत पर रगदते हुए बोला, “तीन हफ्ते बाद तेरी चूत फिर से टाइट लग रही है। आज दोनों तरफ से खोलेंगे इसे। अच्छी तरह याद रख।”
उसने एक झटके में अपना मोटा लंड मेरी चूत में डाल दिया। मैं चीख उठी। वह बिना रुके जोर-जोर से चोदने लगा। विक्रम मेरे सिर के पास आकर खड़ा हो गया और अपना लंड मेरे मुँह में ठूंस दिया। अब एक मोटा लंड मेरी चूत में था और दूसरा मेरे मुँह में। दोनों एक साथ धक्के मार रहे थे। मैं साँस भी ठीक से नहीं ले पा रही थी। गला भरा हुआ था, चूत फटने जैसी लग रही थी। आँखों से आँसू बह रहे थे।
“आह्ह… उम्मम्म…” मैं सिर्फ़ इतना ही कर पा रही थी।
कुछ देर बाद राजवीर ने लंड निकाला और विक्रम से कहा, “अब तू चूत ले। मैं इसकी गाँड खोलता हूँ। आज दोनों तरफ से भरेंगे।”
विक्रम मेरे ऊपर आ गया। उसका मुड़ा हुआ लंड मेरी चूत में घुसते ही एक अलग तरह का दबाव महसूस हुआ। वह कोण बनाते हुए अंदर जा रहा था। वह जोर से चोदने लगा। राजवीर ने लूब्रिकेंट की बोतल निकाली और मेरी गाँड की सेंध पर खूब लगाई। फिर अपना मोटा लंड वहाँ रख दिया और धीरे-धीरे दबाव देना शुरू किया।
“आह्ह्ह… दोनों एक साथ… बहुत दर्द हो रहा है… रुक जाओ प्लीज…” “सह ले रंडी। आज से तू दो मर्दों की हो गई है,” राजवीर ने कहा और अपना लंड मेरी गाँड में धकेलता गया।
जब दोनों लंड पूरी तरह अंदर तक चले गए तो मेरा शरीर अकड़ गया। एक चूत में, एक गाँड में। दोनों मोटे लंड एक साथ अंदर थे। फिर दोनों ने एक साथ धक्के मारने शुरू कर दिए। एक अंदर जाता तो दूसरा बाहर निकलता। शरीर में दो-दो मोटे लंड का आना-जाना पागल कर रहा था। दर्द और मजे का एक अजीब, भारी मिश्रण था। मैं चीख रही थी। आँसू बह रहे थे। दोनों गालियाँ बरसाने लगे।
“कितनी टाइट गाँड है इसकी साले…” “चूत भी पानी छोड़ रही है… देखो कैसे सिकुड़ रही है…” “आज दोनों होल फाड़ दो इसकी… रंडी को दो लंड की आदी बना दो…”
वे लगभग पचास मिनट तक इसी तरह एक साथ चोदते रहे। मेरी आवाज बैठ गई थी। शरीर पसीने से तरबतर था। बाल चेहरे पर चिपक गए थे। फिर उन्होंने पोजीशन बदली। राजवीर नीचे लेट गया। उसने मुझे अपने मोटे लंड पर बैठाया। मेरी चूत में उसका लंड पूरा अंदर चला गया। फिर विक्रम ने पीछे से आकर मेरी गाँड में अपना लंड डाल दिया।
अब मैं दोनों के बीच में फँसी थी। ऊपर राजवीर का लंड चूत में, पीछे विक्रम का लंड गाँड में। दोनों एक साथ धक्के मार रहे थे। मैं उनके बीच पिसी जा रही थी। शरीर काँप रहा था।
“बोल… तू किसकी रंडी है?” राजवीर ने नीचे से पूछा। “आप दोनों की… आपकी दोनों की रंडी हूँ… चोदो मुझे… फाड़ दो…” “जोर से बोल। पूरा वाक्य बोल।” “मैं राजवीर और विक्रम दोनों की रंडी हूँ… मेरी चूत और गाँड दोनों की है… जितना चाहो चोदो… फाड़ दो दोनों होल…”
वे और तेजी से धक्के मारने लगे। बिस्तर जोर-जोर से चरमरा रहा था। कमरे में सिर्फ़ शरीर की आवाजें, गालियाँ और मेरी दबी हुई चीखें गूँज रही थीं। मैं कई बार झड़ चुकी थी। शरीर में कोई ताकत नहीं बची थी। आखिर में पहले विक्रम ने मेरी गाँड में जोरदार धक्कों के साथ झड़ दिया। गर्म गाढ़ा पानी की तेज धार महसूस हुई। वह निकालकर एक तरफ गिर गया। फिर राजवीर ने मुझे कसकर पकड़ा और मेरी चूत में ही बहुत जोर से झड़ गया। उसका पानी भी अंदर भर गया।
मैं दोनों के बीच गिरी पड़ी थी। शरीर काँप रहा था। चूत और गाँड दोनों से पानी बह रहा था। जाँघें खुली हुईं। आँखों से आँसू बह रहे थे। साँसें उखड़ी हुईं।
राजवीर ने मेरे बाल सहलाते हुए कहा, “आज से तू सिर्फ़ मेरी नहीं रही। विक्रम भी तेरा मालिक है। जब भी हम कहेंगे, तू आएगी। समझ गई?”
मैंने आँखें बंद करके सिर्फ़ सिर हिलाया।
दोनों ने नहाकर कपड़े पहने। जाने से पहले विक्रम ने मेरी खुली हुई गाँड पर एक जोर का थप्पड़ मारा और बोला, “अगली बार और मजे लेंगे। तेरी गाँड बहुत पसंद आई। अगली बार और जोर से फाड़ूँगा।”
दरवाजा बंद हुआ। कमरे में सन्नाटा छा गया।
मैं बिस्तर पर नंगी पड़ी रही। शरीर दर्द से काँप रहा था। दोनों होल जल रहे थे। अंदर उनका पानी अभी भी था। जाँघों के अंदर तक गीलापन था। लेकिन सबसे ज्यादा जलन इस बात की थी कि मैंने फिर से एक बार भी “ना” नहीं कहा था।
राजवीर ने अब मुझे अकेला नहीं छोड़ा था। अब मैं दो मर्दों की रंडी बन चुकी थी।
और यह सिलसिला अब रुकने वाला नहीं था। आगे और मर्द जुड़ सकते थे। और मैं… मैं चुपचाप लेती चली जाऊँगी। क्योंकि अब मेरे पास हारने के लिए कुछ बचा ही नहीं था।

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