सुहागन से रंडी सुहागन तक का मेरा सफर | मीना की कहानी 1

मेरा नाम मीना है। उम्र बत्तीस साल की हो गई है। शादी को आठ साल हो चुके हैं। पति का नाम राजेश है। देखने में साधारण सा आदमी है, अच्छा कमाता है, झगड़ा नहीं करता, लेकिन बेड पर… बेड पर वो वैसा नहीं रहा जैसा शादी के पहले दो-तीन साल में था। पहले वो मुझे चाहता था। अब ज्यादातर थका हुआ रहता है। कभी-कभी हफ्ते में एक बार sensually छू भी लेता है, लेकिन वो जल्दबाजी वाली बात हो जाती है। मैं चुप रहती हूँ। सुहागन होकर शिकायत करना मुझे कभी सही नहीं लगा।

हम नोएडा के एक सोसाइटी में रहते हैं। दो बेडरूम का फ्लैट है। राजेश की नौकरी में अक्सर लेट नाइट शिफ्ट हो जाती है। कई बार वो रात के बारह-एक बजे आता है, कभी-कभी सुबह। घर में अकेलापन रहने लगा था। मैं टीवी देखती, कभी-कभी मोबाइल पर रील स्क्रॉल करती, फिर सोने की कोशिश करती। लेकिन नींद देर से आती। शरीर में एक बेचैनी सी रहने लगी थी जिसका नाम मैं ठीक से नहीं ले पाती थी।

उसी सोसाइटी में तीसरी मंजिल पर एक लड़का रहता था। नाम था आकाश। उम्र पच्चीस के करीब। नया-नया शिफ्ट हुआ था। अकेला रहता था। पढ़ाई या जॉब के सिलसिले में आया था, ठीक से पता नहीं। पहली बार लिफ्ट में मुलाकात हुई थी। उसने नमस्ते कहा था। मैंने भी जवाब दिया था। सामान्य सी बात थी। लेकिन उसकी आँखों में कुछ देर तक ठहरने वाली निगाह थी। मैंने उस समय ज्यादा ध्यान नहीं दिया।

फिर एक शाम पार्क में मुलाकात हो गई। मैं हल्की वॉक के लिए निकली थी। वो बेंच पर बैठा सिगरेट पी रहा था। उसने मुझे देखकर जगह दी। मैं थोड़ी दूर जाकर खड़ी हो गई, लेकिन वो उठकर पास आ गया।

“आप अकेली घूमने निकलती हैं?” उसने पूछा। “हाँ… घर में अकेलापन हो जाता है कभी-कभी।” “मेरे साथ भी वही है। नया शहर है, कोई अपना नहीं।”

बातचीत छोटी थी। लेकिन जब वो बोल रहा था तो उसकी निगाह मेरे चेहरे पर टिकी रहती थी। मैंने साड़ी का पल्लू ठीक किया। वो मुस्कुराया। उस मुस्कान में कुछ ऐसा था जो मुझे अंदर तक छू गया। मैं जल्दी से वहाँ से चली आई। दिल की धड़कन तेज हो रही थी। घर आकर आईने के सामने खड़ी हो गई। खुद को देखने लगी। बत्तीस साल की औरत। शरीर अभी भी संभला हुआ है। छातियाँ भारी हैं, कमर सही है। लेकिन कब से किसी ने मुझे सिर्फ औरत की तरह देखा है? राजेश तो अब सिर्फ बीवी की तरह देखता है।

अगले तीन-चार दिन मैंने आकाश को बचने की कोशिश की। लिफ्ट में आ जाए तो मुँह फेर लेती। पार्क जाना छोड़ दिया। लेकिन एक दिन सुबह दूध लेने नीचे गई तो वो वहीं खड़ा था।

“आप जानबूझकर बच रही हैं क्या?” उसने सीधे पूछ लिया। मैं सकपका गई। “ऐसा कुछ नहीं।” “ऐसा ही लग रहा है। मैंने कुछ गलत कह दिया क्या उस दिन?” “नहीं… कुछ नहीं।”

उसने मेरी आँखों में देखा और बोला, “आप बहुत खामोश लगती हैं। खामोशी में भी कुछ बोलती हो आप।”

मैं कुछ जवाब नहीं दे पाई। दिल जोर से धड़क रहा था। घर आकर मैंने दरवाजा बंद किया और दीवार के सहारे खड़ी हो गई। अंदर कुछ गुनगुना रहा था। एक ऐसा एहसास जो मैंने सालों से दबा रखा था। मैं सुहागन हूँ। मेरे पति हैं। यह सब गलत है। लेकिन शरीर इस बात को नहीं मान रहा था।

उस रात राजेश लेट आया। थका हुआ था। उसने मुझसे बात भी नहीं की। बस सो गया। मैं उसके बगल में लेटी रही। आँखें खुली थीं। आकाश की आवाज बार-बार याद आ रही थी। “आप बहुत खामोश लगती हैं।” मैंने अपने शरीर पर हाथ फेरा। कब से किसी ने मुझे इच्छा से छुआ था? कब से किसी ने मेरी साँसों को तेज होते हुए महसूस किया था?

अगले दिन मैंने जानबूझकर अच्छी साड़ी पहनी। बाल खोले। हल्का सा मेकअप किया। खुद को आईने में देखा तो लगा… आज मैं सिर्फ राजेश की बीवी नहीं लग रही। कुछ और लग रही हूँ। लिफ्ट में आकाश मिल गया। उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा। निगाह मेरी छातियों पर थोड़ी देर टिकी, फिर चेहरे पर आई।

“आज अलग लग रही हो,” उसने धीमे से कहा। मैंने पल्लू संभाला। “ऐसा कुछ नहीं।” “है। पहले आप सिर्फ सुहागन लगती थीं। आज… थोड़ी कम सुहागन लग रही हो।”

उसकी बात सुनकर मेरे पेट के अंदर कुछ सिमट गया। लिफ्ट के दरवाजे खुल गए। मैं जल्दी से निकल गई। लेकिन उसके शब्द पूरे दिन मेरे दिमाग में घूमते रहे। “थोड़ी कम सुहागन।”

शाम को पार्क में मैं फिर निकली। इस बार जानबूझकर। वो बेंच पर बैठा था। मैं पास जाकर बैठ गई। दिल जोर से धड़क रहा था।

“आप फिर आ गईं,” उसने कहा। “हाँ… अकेलापन अच्छा नहीं लगता।” “मुझे भी नहीं लगता।”

हम दोनों कुछ देर चुप रहे। फिर उसने धीरे से पूछा, “आपके पति आपको कितना समय देते हैं?” मैंने जवाब नहीं दिया। सिर्फ साँस छोड़ी। “मैं समझ सकता हूँ,” उसने कहा। “कुछ औरतें बहुत देर तक चुप रहती हैं। फिर एक दिन अंदर से कुछ टूटता है।”

मैंने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में सहानुभूति थी, लेकिन उसके नीचे कुछ और भी था। इच्छा। मैंने देखा और नजर नहीं हटाई। पहली बार किसी अजनबी की निगाह में इतनी देर तक अपनी निगाह रखी। अंदर एक डर था, और एक भूख भी थी।

उस रात घर आकर मैं नहाई। आईने के सामने नंगी खड़ी हो गई। अपने शरीर को देखा। हाथ से अपनी छाती सहलाई। निप्पल कड़े हो गए। फिर नीचे हाथ ले गई। मैं गीली थी। बहुत दिनों बाद। मैंने आँखें बंद कीं और आकाश का चेहरा याद किया। उँगलियाँ तेज हो गईं। साँसें फूल गईं। मैं दीवार के सहारे झुक गई और चुपचाप झड़ गई। आँखों में आँसू थे। गुनाह का एहसास था। लेकिन शरीर हल्का लग रहा था।

मैं बिस्तर पर लेटी रही। राजेश अभी नहीं आया था। मैंने फैसला किया… अब और नहीं दबाऊँगी। सुहागन रहना है तो रहूँगी। लेकिन इस भूख को भी जानना चाहती हूँ। आकाश के साथ जो खिंचाव बन रहा है, उसे और करीब से महसूस करना चाहती हूँ। भले ही नतीजा कुछ भी निकले।

अगले दिन मैंने उसे मैसेज किया। नंबर नहीं था, लेकिन सोसाइटी के ग्रुप से निकाल लिया था।

“शाम को पार्क में मिल सकते हैं?”

उसने जवाब दिया, “जरूर।”

मैंने फोन रखा। हाथ काँप रहा था। अंदर एक आवाज कह रही थी – मीना, तुम क्या कर रही हो? तुम सुहागन हो। दूसरी आवाज कह रही थी – सुहागन होकर भी औरत हूँ। और औरत की भूख भी होती है।

शाम को मैं पार्क गई। आकाश पहले से बैठा था। उसने मुझे देखकर जगह दी। मैं पास बैठ गई। हमारे कंधे लगभग छू रहे थे। हवा में हल्की खुशबू थी। दोनों चुप थे। फिर उसने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और मेरी उँगलियों को छू लिया। मैंने हाथ नहीं हटाया। कुछ पल दोनों ऐसे ही रहे। फिर उसने मेरी हथेली को अपनी हथेली में ले लिया।

“मीना जी… आप काँप रही हैं।” “हाँ…” “डर लग रहा है?” “हाँ… लेकिन रुकने का मन भी नहीं कर रहा।”

उसने मेरी तरफ देखा। बहुत पास से। मैंने भी देखा। पहली बार किसी मर्द की साँस इतनी करीब महसूस की जो मेरा पति नहीं था। अंदर सब कुछ उलझ रहा था। गुनाह, इच्छा, डर, और एक अजीब सी आजादी।

मैंने अपना हाथ उसके हाथ से धीरे से छुड़ाया। “आज बस इतना ही। मुझे घर जाना चाहिए।” वो बोला, “जैसा आप कहो। लेकिन मीना जी… आप जब तैयार हो, मुझे बता देना।”

मैं उठकर चली गई। दिल जोर से धड़क रहा था। घर पहुँचकर दरवाजा बंद किया और दीवार से लगकर खड़ी हो गई। साँसें तेज थीं। शरीर में एक सनसनाहट दौड़ रही थी। मैंने आईने में खुद को देखा। आँखें चमक रही थीं।

उस रात मैंने राजेश के आने का इंतजार नहीं किया। बिस्तर पर लेटकर बार-बार वही पल याद करती रही – आकाश की उँगलियाँ मेरी उँगलियों पर, उसकी आवाज, उसकी निगाह। अंदर कुछ बदल रहा था। सुहागन अभी भी थी मैं। लेकिन उस सुहागन के अंदर एक और औरत जाग रही थी। जो रुकना नहीं चाहती थी।

अगली शाम पार्क में जाते समय मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने जानबूझकर साधारण कपड़े पहने थे, कोई खास मेकअप नहीं किया था, लेकिन अंदर कुछ और ही चल रहा था। आकाश पहले से बेंच पर बैठा था। उसने मुझे देखकर सिर हिलाया। मैं पास जाकर बैठ गई। दोनों कुछ देर चुप रहे। हवा में बच्चों के खेलने की आवाजें आ रही थीं, लेकिन मुझे सिर्फ अपनी साँसों की आवाज सुनाई दे रही थी।

“कल रात नींद आई?” उसने धीरे से पूछा। मैंने सिर हिलाया। “नहीं। बहुत देर तक आँखें खुली रहीं।” “किस बारे में सोचती रहीं?” मैंने कुछ पल चुप रहकर जवाब दिया, “इस बारे में कि मैं यहाँ क्या कर रही हूँ। मेरा पति है, मेरा घर है, मेरी इज्जत है… फिर भी मैं यहाँ बैठी हूँ।”

आकाश ने मेरी तरफ देखा। उसकी निगाह में न कोई हड़बड़ी थी, न कोई दबाव। बस एक शांत इंतजार। “मैं आपको कोई फैसला लेने के लिए मजबूर नहीं कर रहा, मीना जी। आप जब तक तैयार नहीं हैं, मैं बस बात कर सकता हूँ। या चुप भी रह सकता हूँ।”

उसकी बात ने मुझे और उलझा दिया। अगर वो जल्दीबाजी करता तो शायद मैं भाग जाती। लेकिन उसकी धीरज ने मुझे और करीब खींच लिया। हम दोनों फिर से चुप हो गए। थोड़ी देर बाद उसने अपना हाथ मेरी तरफ बढ़ाया, लेकिन छुआ नहीं। बस पास रखा। मैंने देखा, फिर धीरे से अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया। उसकी हथेली गरम थी। मेरे अंगूठे ने उसकी उँगलियों को सहलाया। एक छोटा सा स्पर्श, लेकिन मेरे पूरे शरीर में करंट सा दौड़ गया।

उस शाम हमने सिर्फ बात की। उसने बताया कि वो अपने गाँव से पढ़ाई के लिए आया है, परिवार में दबाव है, अकेलापन बहुत सताता है। मैंने भी थोड़ा-थोड़ा अपने बारे में बताया—शादी के पहले के सपने, कैसे धीरे-धीरे सब कुछ दिनचर्या में बदल गया, कैसे शरीर की जरूरतें दबती चली गईं। बात करते-करते अँधेरा हो गया। जब उठने का समय आया तो उसने मेरा हाथ थोड़ा और कसकर पकड़ा।

“कल फिर मिलें?” मैंने सिर हिलाया। “हाँ।”

अगले तीन-चार दिन इसी तरह बीते। पार्क, छोटी-छोटी मुलाकातें, हाथों का स्पर्श, निगाहों का मिलना। एक दिन बारिश हो गई। हम दोनों एक पेड़ के नीचे खड़े हो गए। बारिश की बूंदें बालों पर गिर रही थीं। आकाश ने अपना रूमाल निकाला और मेरे माथे पर लगी पानी की बूंद पोंछने लगा। उसका हाथ मेरे गाल पर रुक गया। मैंने आँखें नहीं फेर। कुछ पल दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। फिर उसने धीरे से अपना चेहरा मेरे करीब किया। मैंने भी गर्दन थोड़ी उठाई। पहले होंठों का हल्का सा स्पर्श हुआ। फिर थोड़ा और गहरा। उसकी साँस मेरी साँस में मिल गई। मैंने आँखें बंद कर लीं। अंदर एक आवाज चिल्ला रही थी—मीना, रुक जा। लेकिन शरीर नहीं रुका। चुंबन लंबा होता गया। उसकी जीभ ने मेरे होंठों को छुआ तो मेरे घुटने कमजोर पड़ गए। मैंने उसका कंधा पकड़ लिया।

जब हम अलग हुए तो दोनों की साँसें तेज थीं। “घर चलो,” मैंने फुसफुसाया। “आज… घर चलो।”

आकाश के कमरे में दरवाजा बंद होते ही मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसने मुझे दीवार से लगा लिया और मेरे होठों को चूमने लगा। पहले हल्का, फिर गहरा। उसकी जीभ मेरे मुँह में घुस आई। मैंने भी जवाब दिया। इतने सालों बाद किसी और मर्द का स्वाद। उसके हाथ मेरी कमर पर थे, फिर धीरे-धीरे ऊपर की तरफ बढ़े। जब उसने मेरी छाती को साड़ी के ऊपर से दबाया तो मेरे शरीर में एक तेज सनसनाहट दौड़ गई।

“मीना… तुम्हारा शरीर कितना नरम है,” उसने मेरे कान में फुसफुसाया।

मैंने कुछ नहीं कहा। बस उसकी गर्दन पकड़ ली। उसने मेरी साड़ी का पल्लू हटाया, फिर ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। जब ब्लाउज खुला और मेरी भारी छातियाँ बाहर आईं तो उसने दोनों को हाथों में ले लिया। उसके अंगूठे ने मेरे निप्पल को सहलाया। निप्पल पहले से कड़े हो चुके थे। उसने एक निप्पल मुँह में लिया और धीरे-धीरे चूसने लगा। दाँतों से हल्का काटा। मेरे मुँह से कराह निकल गई।

“आह्ह… आकाश… धीरे…”

वो नहीं माना। दूसरी छाती को भी उसी तरह चूसने लगा। मेरी उँगलियाँ उसके बालों में फँस गईं। शरीर खुद-ब-खुद उसकी तरफ धकेल रहा था। उसने मेरी साड़ी और पेटीकोट नीचे गिरा दिए। अब मैं सिर्फ पैंटी में थी। उसने पैंटी के ऊपर से मेरी चूत को सहलाया। उँगली से क्लिट पर दबाव डाला। मैं गीली हो चुकी थी। बहुत गीली।

“इतनी गीली हो गई हो… सिर्फ चुंबन और चूसने से,” उसने कहा। उसकी आवाज में हैरानी और मजा दोनों था।

मैं शर्मा गई, लेकिन शरीर झूठ नहीं बोल रहा था। उसने मेरी पैंटी नीचे खींच दी। अब मैं पूरी तरह नंगी थी। आकाश ने मुझे बिस्तर पर लिटा दिया। खुद भी कपड़े उतारने लगा। जब उसका लंड बाहर आया तो मैंने निगाहें नहीं हटाईं। मोटा, तना हुआ, नसों से भरा हुआ। मैंने हाथ बढ़ाकर उसे छुआ। गरम। मैंने उसे धीरे-धीरे ऊपर-नीचे किया। उसने आह भरी।

“मुँह में लो,” उसने धीमे से कहा।

मैं हिचकिचाई। राजेश के अलावा किसी और का लंड मैंने कभी मुँह में नहीं लिया था। लेकिन अंदर की भूख ज्यादा तेज थी। मैंने झुककर टोपा को होठों से छुआ, फिर जीभ निकाली और चाटा। उसका स्वाद अलग था। मैंने धीरे-धीरे मुँह में ले लिया। आकाश ने मेरा सिर सहलाया। मैंने और अंदर लिया। गला भर गया। आँसू आ गए, लेकिन मैंने रोका नहीं। कुछ देर तक मैं उसके लंड को चूसती रही। थूक बह रहा था। मेरी चूत और ज्यादा तरस रही थी।

आखिर में उसने मुझे ऊपर खींच लिया। “अब काफी हो गया। मैं अंदर आना चाहता हूँ।”

मैं लेट गई। जाँघें अपने आप खुल गईं। आकाश मेरे ऊपर आ गया। उसने अपना लंड मेरी चूत के मुँह पर रखा और धीरे से धकेला। सिर्फ टोपा अंदर गया। मैंने दाँत भींच लिए। फिर और अंदर। आधा। फिर एक गहरा धक्का – पूरा लंड मेरी चूत में धँस गया। मेरे मुँह से लंबी कराह निकल गई।

“आह्ह्ह… पूरा… अंदर है…”

इतने सालों बाद किसी और मर्द का लंड। भरपूर, गरम, और सख्त। आकाश कुछ पल रुका। मेरी आँखों में देखा। “दर्द हो रहा है?” “थोड़ा… लेकिन मत निकालो। अंदर ही रखो।”

वो धीरे-धीरे हिलने लगा। हर धक्के के साथ मेरी चूत खुलती जा रही थी। दर्द कम होने लगा, मजा बढ़ने लगा। मैंने अपने पैर उसकी कमर के पीछे लपेट लिए। उसकी छाती मेरी छाती से रगड़ खा रही थी। निप्पल आपस में छू रहे थे। मैंने उसके होठों को चूम लिया। जीभ से जीभ मिल गई।

“तेज करो,” मैंने हाँफते हुए कहा। “और तेज…”

आकाश ने गति बढ़ा दी। अब वो जोर-जोर से ठोक रहा था। बिस्तर चरमरा रहा था। मेरी छातियाँ हर धक्के के साथ उछल रही थीं। उसने एक हाथ से मेरी छाती मरोड़ी और दूसरी तरफ से मेरी कमर पकड़ रखी थी। मेरी चूत से तेज आवाजें आ रही थीं – चप-चप-चप। शर्म की बात थी, लेकिन मजा इतना आ रहा था कि शर्म पीछे रह गई।

“मीना… तुम्हारी चूत कितनी गरम और टाइट है…” “चुपचाप चोदो… बात मत करो… बस चोदो…”

मैं खुद भी कमर से जवाब दे रही थी। उसकी हर धक्के का जवाब मेरी चूत दे रही थी। अंदर एक गरमाहट बढ़ रही थी। मैं जानती थी कि मैं झड़ने वाली हूँ। मैंने उसकी पीठ में नाखून गड़ा दिए।

“आकाश… मैं… मैं जाने वाली हूँ…” “जाओ… मेरे अंदर ही जाना…”

मैं जोर से काँपी। पूरा शरीर अकड़ गया। चूत बार-बार सिकुड़कर उसके लंड को निचोड़ रही थी। आँखों के आगे अँधेरा छा गया। इतने जोर से मैंने शायद सालों में नहीं झड़ी थी। आकाश ने भी गति बढ़ा दी। कुछ तेज धक्कों के बाद उसने गहरी साँस ली और अपना गर्म वीर्य मेरी चूत के अंदर छोड़ दिया। एक के बाद एक धार। मैं महसूस कर सकती थी कि वो मेरे अंदर भर रहा है।

दोनों पसीने से लथपथ एक-दूसरे से चिपके रहे। उसका लंड अभी भी अंदर था। धीरे-धीरे ढीला पड़ रहा था। मैंने उसकी पीठ सहलाई। आँखों में आँसू थे – मजे के भी, और इस बात के भी कि अब मैं वही मीना नहीं रही जो सुबह घर से निकली थी।

थोड़ी देर बाद उसने अपना लंड बाहर निकाला। मेरी चूत से वीर्य की सफेद धार बह निकली। जाँघों तक फैल गई। आकाश ने उँगली से उसे छुआ और मेरी तरफ देखा। मैंने कुछ नहीं कहा। बस उसकी उँगली पकड़कर अपने होठों तक ले गई और चाट लिया। उसका अपना स्वाद।

“मीना…” “बोलो मत,” मैंने कहा। “आज जितना हो सके, उतना करो। कल की सुहागन कल सोचेगी। आज की रात… आज की रात मैं सिर्फ औरत हूँ।”

आकाश मुस्कुराया। उसका लंड फिर से उठने लगा था। मैंने उसे अपने ऊपर खींच लिया। इस बार मैं ऊपर बैठी। लंड पकड़कर अपनी चूत में डाल लिया और खुद हिलने लगी। भारी छातियाँ उसके चेहरे के सामने झूल रही थीं। उसने दोनों को मुँह में ले लिया और जोर से चूसने लगा। मैं कमर पटक-पटककर खुद को चोद रही थी। कमरे में सिर्फ हमारी साँसों और शरीर की आवाजें थीं।

उस रात मैं देर तक उसके पास लेटी रही। घर लौटते समय घड़ी में डेढ़ बज रहे थे। राजेश अभी तक ऑफिस से नहीं आया था। मैंने नहाया, साफ कपड़े पहने और बिस्तर पर लेट गई। अंदर एक अजीब शांति थी। सुहागन वाली मीना अभी भी वहाँ थी—जो घर संभालती है, खाना बनाती है, पति का इंतजार करती है। लेकिन उसके बगल में एक और औरत जाग चुकी थी। जो चाहती है, जो लेती है, जो डर के बावजूद आगे बढ़ती है।

मैंने छत की तरफ देखते हुए सोचा—यह सफर अभी शुरू ही हुआ है। सुहागन से रंडी सुहागन तक का रास्ता लंबा है। और मैं अब पीछे नहीं हटने वाली।

सुहागन से रंडी सुहागन तक का मेरा सफर 2

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