मेरा नाम महेश है। उम्र तीस साल। शादी को तीन साल हो चुके हैं। बीवी दीप्ति। उम्र सत्ताईस। हमारी एक छोटी सी बेटी है जो छह महीने पहले पैदा हुई। दीप्ति अच्छी पत्नी है। घर संभालती है, बच्चे का ध्यान रखती है, और पहले बेड पर भी कोई कमी नहीं छोड़ती थी। शादी के बाद के पहले दो साल मैं उससे बहुत खुश था। उसकी चूत टाइट थी, गरम थी, और वो खुद भी मजे लेती थी।
लेकिन बच्चे के जन्म के बाद सब बदल गया। डॉक्टर ने तीन महीने तक सम्बन्ध न रखने को कहा। फिर जब शुरू हुआ तो मैंने महसूस किया—चूत पहले जैसी नहीं रही। ढीली हो गई है। लंड अंदर जाता है लेकिन वो पुरानी कसावट नहीं मिलती। मैंने कभी दीप्ति से शिकायत नहीं की। वो पहले से थकी रहती है। बच्चे की नींद, दूध, घर का काम। मैं चुप रहा। लेकिन अंदर अंदर असंतोष बढ़ता गया। मेरा लंड छह इंच का है। मोटाई ठीक है। पहले दीप्ति की चूत में पूरा मजा आता था। अब बस निभाना पड़ रहा है।
दीप्ति की छोटी बहन का नाम समीरा है। उम्र तेईस साल। अभी-अभी कॉलेज पूरा किया है। नौकरी की तलाश में है। घर वाले चाहते थे कि वो कुछ दिन शहर में रहकर इंटरव्यू दे और थोड़ा आराम भी कर ले। दीप्ति ने खुद कहा,
“समीरा को कुछ दिन हमारे यहाँ रख लेते हैं। अकेली रहेगी तो उदास हो जाएगी। और बच्चे के साथ भी मदद मिल जाएगी।”
मैंने हाँ कह दी। कोई खास सोचा नहीं था।
समीरा अगले दिन दोपहर में आई। छोटी सी सूटकेस के साथ। देखने में साफ-सुथरी लड़की। गोरी चमकदार त्वचा। चेहरा नरम। आँखें बड़ी और शांत। बाल लंबे और सीधे। कद औसत। शरीर अभी पूरी तरह पला है—स्तन सही आकार के, कमर पतली, और चलते समय हल्की सी गोलाई। लेकिन सबसे ज्यादा असर उसकी अदा पर पड़ता था। बहुत नरम बोली। हर बात में “जी” और “प्लीज”। हँसती भी तो हल्के से। बिल्कुल भोली और अच्छी लड़की लगती थी।
दीप्ति ने उसे हमारे छोटे से गेस्ट रूम में ठहराया। शाम को तीनों साथ बैठे। बातें हुईं। कॉलेज की, नौकरी की, शहर की। समीरा ज्यादा नहीं बोलती थी। जब बोलती तो आवाज इतनी धीमी होती कि ध्यान से सुनना पड़ता। मैंने एक-दो बार उसकी तरफ देखा। वो मेरी नजरों से मिलते ही झट से आँखें झुका लेती।
रात को खाना खाते समय दीप्ति बोली, “समीरा तुम्हें शहर अच्छा लगेगा। महेश भी घर में ही काम करते हैं ज्यादातर। बोर नहीं होने देंगे।”
समीरा ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, “जी भाईसाब। मैं किसी को तकलीफ नहीं दूँगी।”
“भाईसाब” शब्द ने अजीब सा अहसास दिया। मैंने सिर हिलाया और खाना खाता रहा।
रात को जब दीप्ति बच्चे को सुलाने में व्यस्त थी तो समीरा हॉल में बैठी किताब देख रही थी। मैं पानी लेने गया। उसने उठकर कहा, “भाईसाब, आपको पानी दूँ?” “नहीं, मैं ले लेता हूँ।”
वो फिर बैठ गई। नाइटी पहनी हुई थी। हल्की सी। बाजू खुले हुए। गला सामान्य। लेकिन जब वो झुकी तो साफ दिख रहा था कि अंदर ब्रा पतली है। मैंने नजरें घुमा लीं। मन में ख्याल आया—कुंवारी है। शायद कभी छुई भी नहीं गई। दीप्ति की चूत अब ढीली पड़ गई है… और ये साली…
मैंने खुद को झिड़का। पानी पीकर कमरे में चला गया।
दीप्ति बाद में आई। थकी हुई। बच्चे ने अभी-अभी दूध पीया था। मैंने उसे छुआ तो उसने हल्के से कहा, “आज मत। बहुत थक गई हूँ।”
मैंने कुछ नहीं कहा। करवट बदल ली। लेकिन नींद नहीं आई। दिमाग में समीरा का चेहरा घूम रहा था। उसकी नरम आवाज। “भाईसाब”। और वो ख्याल कि वो अभी भी कुंवारी है। कोरी चूत। कभी किसी ने छुई नहीं।
मैंने आँखें बंद कीं। लेकिन शरीर में बेचैनी बढ़ती गई।
अगली सुबह समीरा जल्दी उठ गई। रसोई में दीप्ति की मदद कर रही थी। जब मैं नाश्ते पर बैठा तो उसने मेरे सामने प्लेट रखी। उँगलियाँ मेरी उँगलियों से हल्की सी छू गईं। उसने जल्दी से “सॉरी” कहा और पीछे हट गई।
मैंने उसकी तरफ देखा। वो व्यस्त दिखने की कोशिश कर रही थी। लेकिन मेरे अंदर कुछ खिसक चुका था।
अगले सात दिन मैंने समीरा को बहुत ध्यान से देखा।
सुबह जब वो रसोई में काम करती तो नाइटी का गला थोड़ा खुला रहता। झुकते समय स्तनों का हल्का गड्ढा दिख जाता। गोरा और मुलायम। मैं चाय पीते हुए नजरें चुरा-चुराकर देखता। एक सुबह तो वो फ्रिज से दूध निकाल रही थी। नाइटी पीछे से थोड़ी चिपक गई। गाँड की गोलाई साफ उभर आई। मैंने लंड को पैंट के अंदर ही दबा लिया।
दूसरी बार शाम को वो बच्चे को झुला रही थी। बाल खुले थे। टी-शर्ट में स्तन हल्के-हल्के हिल रहे थे। जब वो झुककर खिलौना उठाती तो टी-शर्ट ऊपर उठ जाती और कमर की चिकनी त्वचा दिख जाती। मैंने मन ही मन सोचा—कितनी मुलायम होगी ये त्वचा। हाथ लगाया तो कैसा लगेगा।
तीसरी बार रात को पानी पीने गया तो वो हॉल में लेटी किताब पढ़ रही थी। एक पैर ऊपर मोड़ा हुआ था। शॉर्ट्स में जाँघें साफ दिख रही थीं। चिकनी, गोरी। मैंने खड़े-खड़े लंड को हल्का सा दबाया। ख्याल आया—इन जाँघों के बीच कोरी चूत होगी। कभी किसी ने छुई नहीं। टाइट। गरम। सिर्फ मेरे लंड के लिए बनी हो जैसे।
हर रात दीप्ति के बगल में लेटे हुए मैं समीरा के बारे में ही सोचता। छह इंच का लंड तन जाता। दीप्ति सो रही होती। मैं बाथरूम जाकर मुठ मारता और समीरा का चेहरा आँखों के सामने रखता।
आठवें दिन की रात। बच्ची सो चुकी थी। दीप्ति थोड़ी बेहतर मूड में थी। मैंने उसे छुआ। इस बार उसने मना नहीं किया। मैंने उसकी नाइटी ऊपर की। स्तन निकाले और चूसने लगा। फिर पैंटी नीचे की और लंड अंदर डाल दिया। पहले जैसा मजा नहीं आ रहा था। चूत ढीली पड़ चुकी थी। मैंने फिर भी जोर-जोर से पेलना शुरू किया। दीप्ति कराह रही थी लेकिन आवाज में थकान थी।
मैंने और तेज कर दिया। बिस्तर चरमरा रहा था। अचानक मुझे लगा जैसे कोई है। नजर उठाकर देखा तो गेस्ट रूम का दरवाजा थोड़ा खुला था। अंधेरे में समीरा खड़ी थी। आँखें फटी हुईं। वो हमें देख रही थी। मेरा लंड दीप्ति की चूत में जा रहा था। मेरे धक्के। दीप्ति की कराहें। सब।
मैंने नजरें नहीं हटाईं। और जोर से पेलने लगा। दीप्ति ने अचानक कहा,
“महेश… बस… थक गई हूँ। आज नहीं…”
मैं रुक गया। लंड अभी भी सख्त था। अधूरा। गुस्सा और फ्रस्ट्रेशन दोनों चढ़ आए। दीप्ति करवट लेकर सो गई। मैं उठकर बाथरूम गया। मुठ मारनी पड़ी। बाहर निकलते समय गेस्ट रूम का दरवाजा बंद हो चुका था। समीरा देख चुकी थी। लेकिन मुझे नहीं पता था कि उसने कितना देखा।
अगली सुबह दीप्ति बच्ची को डॉक्टर के पास ले गई। कोई छोटी-मोटी जाँच थी। घर में सिर्फ मैं और समीरा रह गए। मैं ऑफिस से जल्दी लौट आया। समीरा हॉल में बैठी थी। मेरे आते ही वो थोड़ी सकपका गई।
“भाईसाब… जल्दी आ गए?” “हाँ। काम कम था।”
मैं उसके सामने बैठ गया। थोड़ी देर सन्नाटा रहा। फिर समीरा ने बहुत धीमे से कहा,
“कल रात… मैं… मैं पानी लेने उठी थी। दरवाजा खुला था। मैंने… देख लिया।”
मेरा दिल तेज धधकने लगा। “क्या देखा?” “आप… और दीदी को। मैं तुरंत चली गई। लेकिन… आपको गुस्सा आ रहा था। दीदी ने रोक दिया था। मुझे… बुरा लगा।”
मैं चुप रहा। समीरा ने आगे कहा, “दीदी थक जाती है। बच्ची की वजह से। लेकिन आपको… तकलीफ हो रही थी। मैं समझ गई।”
वो मेरी तरफ देख रही थी। आँखों में सहानुभूति थी। और उसके नीचे हल्की सी घबराहट भी। मैंने धीमे से पूछा,
“तुम डरी नहीं?” “थोड़ी डरी। लेकिन… बुरा नहीं लगा देखकर।”
आखिरी लाइन ने हवा बदल दी। मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। उसने नहीं छुड़ाया। मैं और करीब खिसक गया। समीरा की साँसें तेज हो गईं। मैंने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया।
“समीरा…” “भाईसाब…”
मैंने होठों पर चुंबन कर दिया। पहले हल्का। फिर गहरा। समीरा काँप रही थी। लेकिन उसने धक्का नहीं दिया। उल्टे उसके होठ धीरे-धीरे खुल गए। मेरी जीभ उसके मुँह में चली गई। उसने हल्की सी आवाज निकाली। हाथ मेरे कंधे पर आ गए। चुंबन लंबा होता गया। मेरा लंड पूरी तरह तन चुका था।
अचानक बाहर गाड़ी के हॉर्न की आवाज आई। दीप्ति आ गई थी।
हम दोनों झट से अलग हो गए। समीरा का चेहरा लाल था। होठ गीले। मैंने जल्दी से टीवी ऑन कर दिया। दीप्ति अंदर आई। बच्ची गोद में।
“तुम जल्दी आ गए? समीरा, पानी ला देना।”
समीरा उठकर रसोई में चली गई। जाते-जाते उसने एक बार मेरी तरफ देखा। आँखों में अब सिर्फ सहानुभूति नहीं थी। कुछ और था।
दो दिन बाद का मौका अपने आप बन गया।
दीप्ति की सहेली का फोन आया। उसकी तबीयत खराब थी। दीप्ति बच्ची को लेकर उसके घर चली गई। शाम तक लौटने का प्लान था। घर में सिर्फ मैं और समीरा रह गए।
दोपहर का समय था। समीरा अपने कमरे में बैठी थी। मैं दरवाजे पर खड़ा हो गया। उसने सिर उठाया। हमारी निगाहें मिलीं। दोनों को पता था कि आज कुछ होने वाला है।
मैं अंदर गया। दरवाजा बंद किया। समीरा उठकर खड़ी हो गई। काँप रही थी। मैंने उसका हाथ पकड़ा और पास खींच लिया। चुंबन इस बार गहरा था। उसके होठ काँप रहे थे। मैंने टी-शर्ट ऊपर की। ब्रा में बंद स्तन निकले। ब्रा खोली। गोरे मुलायम स्तन हाथ में आ गए। निप्पल हल्के गुलाबी। मैंने एक मुँह में लिया और चूसा। समीरा ने कराहते हुए कहा,
“भाईसाब… धीरे… पहली बार…”
“नाम लेकर बुला,” मैंने कहा। “महेश… आह्ह…”
मैंने उसे बिस्तर पर लिटा दिया। शॉर्ट्स और पैंटी एक साथ खींचकर निकाल दी। उसकी चूत सामने थी। हल्के बाल। बिलकुल बंद और गुलाबी। कभी किसी ने छुआ नहीं था। मैंने उँगली से सहलाया। समीरा झटक के बैठ गई।
“दर्द होगा…” “सह लेना,” मैंने कहा।
मैंने अपनी पैंट उतारी। छह इंच का तना हुआ लंड बाहर आया। समीरा की आँखें बड़ी हो गईं। उसने पहले कभी लंड इतने करीब नहीं देखा था। मैंने उसका हाथ पकड़कर लंड पर रखा। “पकड़ इसे।”
उसने हल्के से पकड़ा। काँप रहे हाथ। मैंने कहा, “मुँह में ले। चूस।”
समीरा झुकी। पहले जीभ से टोपा छुआ। फिर हिचकिचाते हुए मुँह में लिया। दाँत लग गए। “दाँत मत लगा… होठों से ढक… जीभ घुमा…”
वो सीख रही थी। गलती-गलती के साथ लंड चूसने लगी। गला नहीं ले पा रही थी। बस टोपा और थोड़ा आगे तक। मैंने उसके बाल पकड़कर हल्के धक्के दिए।
“हाँ… ऐसे… कुंवारी साली लंड चूस रही है…”
थोड़ी देर बाद मैंने उसे उलटा किया। जाँघें फैलाईं। लंड उसकी कोरी चूत पर रखा। “दर्द होगा। लेकिन चुप रहना।”
मैंने धीरे से धक्का दिया। सिर्फ टोपा अंदर गया। समीरा ने बिस्तर पकड़ लिया। “आह्ह… दर्द… रुक जाओ…”
मैं रुका नहीं। और धक्का मारा। आधा अंदर गया। कुछ फटने जैसा अहसास हुआ। समीरा की आँखों से आँसू निकल आए। “महेश… बहुत दर्द हो रहा है… निकालो…”
मैंने उसका मुँह दबाया और पूरा लंड अंदर पेल दिया। एक झटके में। कोरी चूत फट गई। खून निकला। गरम खून मेरी लंड और उसकी जाँघों पर लग गया। समीरा चीखने वाली थी लेकिन मेरे हाथ से दबी आवाज निकली।
“आह्ह्ह… फट गई… दर्द… बहुत दर्द…”
मैं अंदर रुका रहा। उसकी चूत इतनी टाइट थी कि लंड को जकड़े हुए थी। छह इंच पूरा धँसा हुआ था। धीरे-धीरे मैंने हिलाना शुरू किया। खून की चिकनाहट से थोड़ा आसान हुआ। समीरा रो रही थी। लेकिन रोक नहीं रही थी।
“दर्द कम हो रहा है क्या?” “थोड़ा… लेकिन… अभी भी काट रहा है…”
मैंने गति बढ़ाई। चूत की दीवारें लंड को कसकर पकड़े हुए थीं। हर धक्के के साथ खून और पानी मिलकर आवाज पैदा कर रहा था। मैंने उसके स्तन चूसते हुए जोर-जोर से पेलना शुरू किया।
“कुंवारी चूत… कितनी टाइट… दीप्ति की तो ढीली हो गई थी… तेरी तो लंड को काट रही है…” “महेश… धीरे… आह्ह… अब… अब थोड़ा मजा भी आ रहा है…”
मैंने उसकी टाँगें कंधों पर रख लीं। पूरा लंड अंदर-बाहर हो रहा था। खून अभी भी लग रहा था। समीरा की कराहें बदलने लगीं। दर्द से मजे की तरफ। मैंने और तेज कर दिया। बिस्तर चरमरा रहा था।
“चोद… और तेज… फाड़ दे पूरी…” “फाड़ रहा हूँ साली… कोरी चूत फाड़ रहा हूँ…”
मैंने काफी देर तक जोर-जोर से चोदा। समीरा के नाखून मेरी पीठ पर गड़ गए। आँखों में आँसू और मजा दोनों था। अचानक उसकी चूत और जोर से जकड़ गई। वो काँपते हुए झड़ गई। पहली बार।
“आह्ह्ह… महेश… कुछ हो रहा है… अंदर…”
मैं भी रोक नहीं पाया। गरम वीर्य की धार उसकी फटी हुई चूत में छोड़ दी। एक के बाद एक। पूरी भर दी।
दोनों हाँफ रहे थे। मैंने लंड बाहर निकाला। खून और वीर्य मिला हुआ उसकी चूत से बाहर बह रहा था। चादर लाल हो गई थी। समीरा आँखें बंद किए पड़ी थी। जाँघें काँप रही थीं।
मैंने उसके बाल पीछे किए। “अब तुम मेरी हो। दीप्ति को कुछ पता नहीं चलेगा। लेकिन जब भी मौका मिलेगा… ये कोरी चूत मुझे मिलेगी।”
समीरा ने आँखें खोलीं। धीमे से सिर हिलाया। “दर्द अभी भी है… लेकिन… बुरा नहीं लगा।”
मैं उसके बगल में लेट गया। खून और पसीने की गंध कमरे में फैली थी।
कुंवारी साली की कोरी चूत अब कोरी नहीं रह गई थी। मेरे छह इंच के लंड ने उसे खोल दिया था।

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