मेरा नाम सोहम है। जायपुर का रहने वाला हूँ और उम्र अभी चौबीस ही हुई है। जिम मेरा रोज़ का नशा है, इसलिए बदन सुखा और कसा हुआ रहता है—कंधे चौड़े, बाजू में नसें साफ उभरती हैं, पेट पर हल्की-हल्की सिक्स पैक की लकीरें दिखती हैं। नीचे सात इंच का मोटा लंड है जो जब तनता है तो पैंट में अपनी जगह खुद बना लेता है और तकलीफ देने लगता है। उस साल परिवार के एक दूर के रिश्तेदार की शादी राजस्थान के ही एक छोटे से शहर में तय हुई थी। मम्मी-पापा बाद में आने वाले थे, इसलिए मैं अकेला ही ट्रेन से पहुँचा। स्टेशन से सीधे उस बड़ी हवेलीनुमा घर में गया जहाँ सारे रिश्तेदार ठहरे हुए थे। आँगन में हलचल थी, बच्चे दौड़ रहे थे, औरतें चाय-नाश्ते के इंतजाम में व्यस्त थीं, और पुरुष एक कोने में सिगरेट और गप्पें मार रहे थे।
वहाँ पहली नजर में ही माधुरी चाची नजर आ गईं। उम्र उनकी उनतालीस बताई जाती थी, लेकिन चेहरा और बदन देखो तो कोई तीस साल की दीवा लगे। गोरी चमकदार त्वचा, बड़े-बड़े तेज आँखों में हमेशा एक शरारती सी चमक, और शरीर ऐसा कि साड़ी में भी सब कुछ छुप न पाए—स्तन भारी और गोल, लगभग 36डी के, कमर इतनी पतली कि दोनों हाथों में समा जाए, और गाँड इतनी उभरी व गोल कि चलते समय लोग पीछे मुड़-मुड़कर देख लेते। जाँघें मोटी और मुलायम थीं। वो अपने पति के साथ उसी शहर में रहती थीं और परिवार में उनकी छवि एकदम खुशमिजाज, हँसमुख और थोड़ी बोल्ड औरत की थी जो सबके साथ खुलकर बात करती थी।
शादी अभी सात दिन बाद थी, लेकिन हल्दी, मेहंदी और तिलक जैसे छोटे-छोटे फंक्शन पहले से ही चल रहे थे। सारे लोग एक साथ थे, रात-दिन हँसी-मजाक और तैयारियों का माहौल बना रहता था। माधुरी चाची हर फंक्शन में सबसे आगे रहतीं। एक दिन हल्दी के दौरान जब कोई लड़की काफी देर से आई तो उन्होंने हँसते हुए कहा, “अरे बाबा, इतनी देर से क्यों आई रे? कोई रात भर जगा के रखता है क्या घर में? रंग तो देखो चेहरे का, जैसे रात भर मलाई की मालिश हुई हो!” सब खिलखिला दिए। मेहंदी वाले दिन एक जवान लड़के का हाथ पकड़कर मेहंदी लगाते हुए बोलीं, “अरे हाथ तो देखो कितने मजबूत हैं… जिम जाता होगा तू। इन हाथों से सिर्फ मेहंदी नहीं, और भी बहुत कुछ संभाला जा सकता है बाबू!” लड़का तो शरमा के लाल हो गया, लेकिन चाची खिलखिलाती रहीं और उनकी आँखों में साफ शरारत थी। तिलक वाले दिन जब मैं पास से गुजरा तो उन्होंने जानबूझकर आवाज लगाई, “अरे जायपुर वाले हट्टे-कट्टे राजा, इधर आओ जरा… इतना बदन बना रखा है तो कम से कम काम भी उतना ही करते होगे न? या सिर्फ दिखाने के लिए रखा है ये सब?” उनकी आवाज में हँसी थी, लेकिन निगाहें मेरी छाती, बाजुओं और फिर थोड़ी देर के लिए नीचे की तरफ भी गईं।
मैं जब भी उनको देखता, दिमाग अपना काम खुद शुरू कर देता। कभी वो हँसतीं तो भारी स्तन हल्के-हल्के हिलते, कभी झुककर कोई थाली या गिलास उठातीं तो ब्लाउज का गड्ढा इतना गहरा हो जाता कि नजरें हटाना मुश्किल हो जाता। एक शाम की बात है, सब लोग छत पर बैठे गप्पें मार रहे थे। ठंडी हवा चल रही थी। माधुरी चाची अचानक मेरे बिल्कुल बगल में आ बैठीं। साड़ी का पल्लू बार-बार सरक रहा था और वो संभालती रहतीं, लेकिन संभालने के तरीके में एक जानबूझकर वाला अंदाज था। अचानक उन्होंने धीमे से, ताकि और कोई न सुने, पूछा, “सोहम, तुम जिम इतना जाते हो… थकान नहीं होती शरीर में? रात को सोते कैसे हो अकेले?” मैंने हल्का सा जवाब दिया, “आदत हो गई है चाची।” वो मुस्कुराईं और बोलीं, “आदत अच्छी है। लेकिन अकेले में आदतें कभी-कभी खतरनाक भी हो जाती हैं… सोचने की आदतें खासकर।” इतना कहकर वो उठकर चली गईं, लेकिन उनकी वो आखिरी लाइन मेरे दिमाग में काँटे की तरह चुभ गई।
रात को अपने कमरे में लेटा तो नींद गायब। बार-बार उनकी हँसी, उनकी नौटंकी भरी बातें, वो जानबूझकर सरकता पल्लू और छत वाली बात याद आ रही थी। लंड तन गया और पैंट में धक्का मारने लगा। मैंने बाथरूम जाकर मुट्ठी मार ली, आँखें बंद करके माधुरी चाची का गदराया बदन ही दिमाग में रखा, लेकिन मन शांत नहीं हुआ। उल्टे और बेचैनी बढ़ गई। अगले दिन के फंक्शन में फिर से वही नजारा—माधुरी चाची सबके साथ हँस रही थीं, मजाक कर रही थीं, लेकिन जब मेरी तरफ देखतीं तो निगाह में एक अलग सी बात होती जो सिर्फ मैं महसूस कर पाता। एक बार तो पानी का गिलास देते समय उनकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों पर थोड़ी देर के लिए टिक गईं। दोनों ने अनदेखा किया, लेकिन वो छूना रात भर महसूस होता रहा।
शादी अभी दूर थी। फंक्शन बाकी थे। और माधुरी चाची की वो छोटी-छोटी शरारतें, वो जानबूझकर की गई बातें और वो निगाहें मेरे अंदर कुछ ऐसा हिला रही थीं जो अब आसानी से काबू में आने वाला नहीं था। मैं समझ रहा था कि ये सिर्फ हँसी-मजाक नहीं है… लेकिन अभी भी पूरी तरह पक्का नहीं कर पा रहा था कि आगे क्या होने वाला है। सिर्फ इतना तय था कि माधुरी चाची की मौजूदगी ने मेरे शरीर और दिमाग दोनों में एक ऐसी बेचैनी पैदा कर दी थी जो अब शांत होने वाली नहीं लग रही थी।
अगले दिन शाम को हवेली के बड़े आँगन में एक छोटा सा संगीत का कार्यक्रम रखा गया था। महिलाएँ और जवान लड़कियाँ ढोलक की थाप पर नाचने लगीं। मैं एक कोने में खड़ा पानी पी रहा था कि अचानक मेरी नजर माधुरी चाची पर पड़ी। वो भी नाचने वालों में शामिल हो गई थीं। लाल रंग की साड़ी पहनी हुई थी, ब्लाउज टाइट था और पल्लू बार-बार सरक रहा था। जब वो कमर और गाँड हिला-हिलाकर नाचतीं तो पूरा शरीर लहराने लगता। भारी स्तन हर थिरकन के साथ ऊपर-नीचे झूलते, और गाँड की गोलाई साड़ी के नीचे से इतनी साफ उभरती कि नजरें हटाना नामुमकिन हो जाता। मैंने कई बार नजरें घुमाने की कोशिश की लेकिन बार-बार उसी तरफ चली जातीं। हर बार जब वो पीछे मुड़कर गाँड हिलातीं तो मेरा लंड पैंट में थोड़ा-थोड़ा तनने लगता। गले में सूखापन छा गया। मैंने पानी का गिलास जोर से दबाया और वहाँ से हटने की कोशिश की, लेकिन शरीर मानो जड़ हो गया हो। माधुरी चाची ने एक बार नाचते-नाचते मेरी तरफ देखा और हल्की सी मुस्कान दे दी, जैसे उन्हें पता हो कि मैं क्या देख रहा हूँ। उस मुस्कान ने मेरे अंदर की बेचैनी को और बढ़ा दिया। रात को कमरे में आकर मुझे फिर से बाथरूम की शरण लेनी पड़ी। आँखें बंद करके मैंने वही हिलती गाँड और झूलते स्तन याद किए और मुट्ठी मारकर ही शांत हो पाया।
अगली सुबह मेहंदी का फंक्शन था। आँगन में चटाई बिछाई गई थी और महिलाएँ मेहंदी लगा रही थीं। माधुरी चाची भी वहीं बैठी थीं। जब मेरी बारी आई तो उन्होंने खुद ही कहा, “सोहम, इधर आओ। तुम्हारे हाथ पर मैं खुद मेहंदी लगाती हूँ। जवान लड़के का हाथ खाली कैसे रह सकता है।” मैं उनके सामने बैठ गया। उन्होंने मेरा दाहिना हाथ अपने हाथ में लिया। उनकी उँगलियाँ गरम और मुलायम थीं। मेहंदी लगाते-लगाते वो थोड़ा आगे झुक गईं। साड़ी का पल्लू एक तरफ सरक गया और ब्लाउज का गहरा गड्ढा मेरे बिल्कुल सामने आ गया। भारी स्तनों की गोलाई और उनके बीच की गहराई साफ दिख रही थी। मैंने नजरें नीचे गड़ा लीं लेकिन लंड उसी पल पैंट में तनकर सख्त हो गया। मैंने दूसरे हाथ से घुटनों पर रखी तौलिया को खींचकर छुपाने की नाकाम कोशिश की। माधुरी चाची ने मेहंदी लगाते-लगाते अचानक धीमे से कहा, “क्या हुआ सोहम? इतना सख्त क्यों हो गए अचानक? कोई बात हो तो बताओ… या फिर कोई चीज देख ली जो नहीं देखनी चाहिए थी?” उनकी आवाज में हल्की हँसी थी लेकिन आँखों में खुली शरारत। मैंने गला साफ करके कहा, “कुछ नहीं चाची… बस ऐसे ही।” वो मुस्कुराईं और मेहंदी लगाती रहीं, लेकिन उनकी उँगलियाँ मेरे हाथ पर जरूरत से ज्यादा देर तक फिरती रहीं। जब मेहंदी पूरी हो गई तो उन्होंने मेरा हाथ छोड़ते हुए धीमे से कहा, “छुपाने की कोशिश मत किया करो। जो दिखना होता है वो दिख ही जाता है।” इतना कहकर वो हँसती हुई उठ गईं। मैं वहीं बैठा रह गया। पैंट में तना हुआ लंड अभी भी तकलीफ दे रहा था और उनके शब्द कानों में गूँज रहे थे।
अगले दिन हल्दी का फंक्शन था। घर में काफी सामान इधर-उधर करना था—थालियाँ, हल्दी के बर्तन, फूलों की मालाएँ। मैं एक भारी थाली उठाकर अंदर ले जा रहा था कि माधुरी चाची भी कुछ बर्तन लेकर पीछे-पीछे आ रही थीं। अचानक उन्होंने अपनी कमर पर हाथ रखा और चेहरा थोड़ा टेढ़ा कर लिया। “आह… कमर में अचानक मोच आ गई लगती है।” मैंने थाली एक तरफ रखी और उनके पास गया। “जोर से मोच आई है क्या चाची?” उन्होंने सिर हिलाया। “थोड़ा सहारा देकर कमरे तक पहुँचा दो। खड़ी नहीं रहा जा रहा।” मैंने उनका हाथ पकड़ा और धीरे-धीरे उनके कमरे तक ले गया। कमरा अपेक्षाकृत शांत था। उन्होंने बिस्तर के किनारे बैठते हुए कहा, “सोहम, अगर बुरा न मानो तो थोड़ी देर कमर दबा दो। बहुत दर्द हो रहा है।” मैं थोड़ा हिचकिचाया लेकिन फिर उनके पीछे खड़ा हो गया। दोनों हाथों से उनकी कमर पर हल्का दबाव देना शुरू किया। साड़ी के ऊपर से ही उनकी गर्माहट और मुलायम त्वचा महसूस हो रही थी। धीरे-धीरे मैंने दबाव बढ़ाया। माधुरी चाची ने आँखें बंद कर लीं और धीमी आवाज में कहा, “हाँ… ऐसे ही… थोड़ा नीचे… और अंदर की तरफ दबाओ।” मेरे हाथ उनकी कमर से थोड़े नीचे सरक गए। उँगलियाँ लगभग गाँड की शुरुआत तक पहुँच गई थीं। अचानक उन्होंने आँखें खोलीं और आईने में मेरी तरफ देखा। “सोहम… तुम्हारे हाथ काफी मजबूत हैं। जिम की मेहनत रंग ला रही है।” मैं चुप रहा। मेरे लंड ने फिर से पैंट में जोर लगाना शुरू कर दिया था। माधुरी चाची ने अचानक धीमे से कहा, “बताओ तो सही… कल मेहंदी लगाते समय जो तन गया था… वो सिर्फ मेहंदी की वजह से था या कुछ और देख लिया था?” मैंने हाथ रोक दिए। वो मुस्कुराईं। “डर मत। मैं बुरा नहीं मानती। जवान हो तुम। और मैं भी कोई बुढ़िया नहीं हूँ।” इतना कहकर उन्होंने मेरा एक हाथ पकड़कर अपनी कमर पर और मजबूती से दबाया। “दबाते रहो। दर्द कम हो रहा है।” कमरे में सन्नाटा था। बाहर शोर आ रहा था लेकिन दरवाजा बंद था। मेरे हाथ अब जानबूझकर उनकी कमर और गाँड के ऊपरी हिस्से पर घूम रहे थे। माधुरी चाची की साँसें थोड़ी तेज हो गई थीं। उन्होंने आईने में मेरी आँखों में देखते हुए कहा, “सोहम… तुम बहुत देर तक दबा सकते हो क्या? या थक जाते हो जल्दी?” उनकी आवाज में वो वाली शरारत वापस आ गई थी। मैंने जवाब दिया, “थकता नहीं हूँ चाची… आदत है।” वो हल्के से हँसीं और बोलीं, “आदत अच्छी है। लेकिन कभी-कभी आदतें काबू में नहीं रहतीं… है न?” मैंने कुछ नहीं कहा। सिर्फ दबाता रहा। उनके शरीर से आती गर्माहट, उनकी तेज साँसें और वो गंदी-सी बातें मेरे लंड को पूरी तरह सख्त किए हुए थीं। माधुरी चाची ने अचानक मेरा हाथ पकड़कर रोका और धीमे से कहा, “अब काफी है… नहीं तो लोग खोजने लगेंगे।” मैंने हाथ पीछे खींच लिए। वो धीरे से उठीं और साड़ी ठीक करने लगीं। जाते-जाते दरवाजे पर खड़ी होकर बोलीं, “मासज के लिए थैंक यू सोहम… और हाँ, अगली बार दर्द हो तो फिर से बुला लूँगी। तुम्हारे हाथ अच्छे हैं।” इतना कहकर वो बाहर चली गईं।
मैं कमरे में अकेला रह गया। पैंट में तना हुआ लंड दर्द कर रहा था। हाथों में अभी भी उनकी कमर की गर्माहट बाकी थी। दिमाग में उनके नाचते समय हिलती गाँड, मेहंदी लगाते समय दिखता गड्ढा और अभी-अभी हुई मासज की गंदी बातें एक साथ घूम रही थीं। मैंने समझ लिया था कि माधुरी चाची अब सिर्फ मजाक नहीं कर रहीं। वो जानबूझकर सीमाएँ छू रही थीं… और मैं हर बार उन सीमाओं को पार करने के और करीब जा रहा था।
शादी से दो दिन पहले का तनाव अब काबू के बाहर हो चुका था। हल्दी और मेहंदी के बाद से माधुरी चाची की निगाहें हर बार मुझे ढूँढ लेतीं और जब मिलतीं तो उनमें एक खुली हुई भूख साफ दिख जाती। मैं भी अब नजरें नहीं चुराता था। दोनों जानते थे कि कुछ होने वाला है, बस मौका चाहिए था।
शादी होटल में रखी गई थी। सुबह से ही सारे लोग तैयार होकर निकल पड़े। मैं और माधुरी चाची संयोग से एक ही गाड़ी में बैठ गए। पीछे वाली सीट पर। बीच में थोड़ी जगह थी लेकिन उनके साड़ी के पल्लू ने बार-बार मेरे घुटने को छू लिया। गाड़ी चलते ही उन्होंने धीमे से, ताकि ड्राइवर न सुने, कहा, “सोहम… आज बहुत गरम लग रहा है मुझे। तुम्हें नहीं लग रहा?” मैंने सिर्फ इतना कहा, “लग रहा है चाची।” उन्होंने हल्की मुस्कान दी और अपना हाथ मेरे हाथ के पास रख दिया। उँगलियाँ छू गईं। दोनों ने नहीं हटाईं।
होटल पहुँचकर सब लोग शादी हॉल की तरफ बढ़ गए। रस्में शुरू होने वाली थीं। जयमाला, फेरों की तैयारी, हलदी-रोली का शोर। माधुरी चाची अचानक भीड़ में से मेरी तरफ देखकर आँखों से इशारा किया और धीमे से मुँह के पास लाकर बोलीं, “ऊपर कमरा 214 है। दस मिनट में आ जाना। कोई पूछे तो कह देना चाची को कुछ सामान देना था।” इतना कहकर वो सीढ़ियों की तरफ निकल गईं। मेरा दिल जोरों से धधकने लगा। सात इंच का लंड पहले से ही पैंट में तन चुका था।
मैं दस मिनट बाद कमरा 214 के सामने खड़ा था। दरवाजा हल्का धक्का देते ही खुल गया। माधुरी चाची अंदर थीं। साड़ी का पल्लू उन्होंने एक तरफ फेंक रखा था। ब्लाउज के हुक आधे खुले थे। भारी स्तन लगभग बाहर आने को थे। दरवाजा बंद करते ही उन्होंने मुझे खींच लिया और होठों पर जोर से चुंबन कर दिया। जीभ अंदर घुस आई। मैंने उनकी कमर पकड़ ली और गाँड पर हाथ फेरने लगा।
“इतने दिन से तड़पाया है साले… आज हिसाब चुकता करना पड़ेगा,” उन्होंने हाँफते हुए कहा। “चाची… नीचे शादी चल रही है…” “चलने दो। उधर माला पहना रहे होंगे… इधर मैं तुम्हारा लंड पहने लूंगी।”
उन्होंने मेरी पैंट का बटन खोला। जिपर नीचे किया। सात इंच का तना हुआ लंड बाहर निकल आया। माधुरी चाची की आँखें चमक उठीं। “बाप रे… इतना लंबा और मोटा… जिम जा-जाकर सिर्फ बदन नहीं, ये भी बना रखा है तूने।” उन्होंने झुककर लंड मुँह में ले लिया। पहले टोपा चूसा, फिर गहराई तक ले गईं। गला भर गया फिर भी रुकीं नहीं। मैंने उनके बाल पकड़ लिए।
“चूसो चाची… जोर से चूसो… शादी हॉल में लोग फेरों की तैयारी कर रहे होंगे और तुम यहाँ भतीजे का लंड चूस रही हो…” “उम्मम्म… चूस रही हूँ… मादरचोद जितना बड़ा लंड है उतना ही चूसूंगी…”
थोड़ी देर बाद उन्होंने लंड मुँह से निकाला और साड़ी ऊपर करके बिस्तर पर बैठ गईं। पैंटी एक झटके में साइड में सरका दी। चूत पहले से गीली चमक रही थी। “आओ अब। बैठो मुझ पर। आज मैं ऊपर रहूँगी।” मैं बिस्तर पर लेट गया। माधुरी चाची मेरे लंड के ऊपर आ गईं और धीरे-धीरे उसे अपनी चूत में उतराने लगीं।
“आह्ह्ह… कितना मोटा… धीरे… पूरा अंदर जा रहा है…” पूरा लंड अंदर जाते ही वो रुक गईं। फिर कमर हिलानी शुरू की। ऊपर-नीचे। धीरे-धीरे गति बढ़ाई। उनके भारी स्तन ब्लाउज से बाहर निकल आए और मेरे चेहरे के सामने झूलने लगे। मैंने दोनों मुँह में ले लिए और जोर से चूसने लगा।
“हाँ… चूसो… काटो… उधर लोग माला पहना रहे होंगे… इधर तुम्हारी चाची तुम्हारे लंड पर कूद रही है…” वो अब जोर-जोर से उछलने लगीं। गाँड मेरे जाँघों पर पट-पट की आवाज कर रही थी। चूत की गीली आवाज पूरे कमरे में गूँज रही थी।
“चाची… इतनी गरम चूत… इतनी गीली… मैं बहुत देर तक नहीं रोक पाऊँगा…” “रोकने की जरूरत नहीं… अंदर छोड़ देना… पूरा… आज कंडोम नहीं…”
मैंने उनकी कमर पकड़कर नीचे से भी धक्के मारने शुरू कर दिए। माधुरी चाची पागलों की तरह उछल रही थीं। बाल बिखर गए थे। ब्लाउज पूरी तरह खुला हुआ था।
“चोदो… जोर से चोदो… भतीजे का लंड चाची की चूत में… उधर फेरों की घंटियाँ बज रही होंगी… इधर मेरी चूत की आवाज…” “चाची… मैं झड़ने वाला हूँ…” “झड़… अंदर झड़… भर दे पूरी चूत…”
कुछ तेज धक्कों के बाद मेरा शरीर अकड़ गया। गरम वीर्य की तेज धार उनकी चूत में छूटने लगी। माधुरी चाची भी उसी समय काँप उठीं। चूत ने लंड को जोर से जकड़ लिया। दोनों पसीने से तर थे। साँसें तेज चल रही थीं।
थोड़ी देर बाद वो मेरे ऊपर से उतरीं। लंड बाहर निकला तो वीर्य उनकी जाँघों से बहने लगा। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “अब नीचे चलो। शादी अभी बाकी है। लोग खोज रहे होंगे।”
मैंने कपड़े ठीक किए। माधुरी चाची ने साड़ी संभाली, पल्लू ठीक किया और आईने में खुद को देखा। होठ सूजे हुए थे। गले पर मेरे चुंबन के निशान थे। उन्होंने लिपस्टिक दोबारा लगाई और बोलीं,
“सोहम… ये सिर्फ आज की बात नहीं है। जब भी मौका मिलेगा… ये फुद्दी तुम्हारे लंड की ही रहेगी। समझे?”
मैंने सिर हिलाया। दोनों कमरे से निकलकर अलग-अलग रास्तों से शादी हॉल की तरफ बढ़े। हॉल में उसी समय फेरे चल रहे थे। लोग तालियाँ बजा रहे थे। माधुरी चाची सामान्य मुस्कान के साथ भीड़ में शामिल हो गईं। मैं एक कोने में खड़ा था। पैंट में अभी भी हल्की नमी थी और दिमाग में उनकी कराहें गूँज रही थीं।
उधर शादी की रस्में पूरी हो रही थीं… इधर माधुरी चाची की फुद्दी मेरे सात इंच के लंड से चोदी जा चुकी थी।
