चोद मादरचोद | रंडी बुआ की कमरतोड़ चुदाई

मेरा नाम रोहित है। उम्र पच्चीस साल। दिल्ली में प्राइवेट जॉब करता हूँ। ज्यादातर समय ऑफिस और पीजी के बीच ही बीत जाता है। परिवार से सीधा संपर्क कम ही रहता है। पापा की बड़ी बहन, जिन्हें हम बुआ कहते हैं, गाँव में रहती हैं। नाम है कमला। उम्र पैंतालीस के करीब। फूफा जी का निधन दो साल पहले हो गया था। तब से वो अकेली ही अपने पुराने मकान में रहती हैं। बेटा अमेरिका में है, साल में एक बार आता है।

मुझे गाँव गए काफी समय हो गया था। पापा ने एक दिन कहा, “रोहित, बुआ अकेली हैं। कभी-कभी जाकर मिल लिया कर। बेटा विदेश में है, तू तो पास ही है।” मैंने टालने की कोशिश की लेकिन छुट्टी के दिन निकल पड़ा।

गाँव का घर पहले जैसा ही था। थोड़ा पुराना, लेकिन साफ। बुआ गेट पर नहीं थीं। मैंने आवाज लगाई तो वो अंदर से निकलीं। साधारण सूट पहना था। बाल सादे बँधे हुए। चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “आ गया… सोचा नहीं था कि तू आएगा।” गले लगाने की बजाय उन्होंने बस सिर पर हाथ फेर दिया। अंदर चलो, सामान रखो।

पहले दिन काफी सामान्य बीता। बुआ घर के कामों में व्यस्त रहीं। खाना बनाया, पूछा-ताछा किया, लेकिन बातें सीमित रखीं। शाम को जब चाय पी रहे थे तो उन्होंने एक बार कहा, “दिल्ली में अकेला रहता है तू। खाना सही से खा लेता है?” मैंने हाँ में जवाब दिया। फिर वो चुप हो गईं। मैंने नोटिस किया कि उनकी आँखें थोड़ी सूजी हुई थीं। शायद नींद कम होती हो।

रात को मैं अपने पुराने कमरे में लेटा। बगल वाले कमरे में बुआ थीं। देर रात मुझे नींद नहीं आ रही थी। पानी पीने उठा। गलियारे में आया तो बुआ का दरवाजा हल्का खुला हुआ था। अंदर से कोई आवाज नहीं आ रही थी। मैंने सोचा शायद सो गई हों। लेकिन वापस जाते समय नजर अंदर चली गई। बुआ बिस्तर पर बैठी थीं। मोबाइल के उजाले में उनका चेहरा दिख रहा था। वो किसी को देख रही थीं या पढ़ रही थीं, पता नहीं। साड़ी का पल्लू एक तरफ पड़ा था। ब्लाउज सामान्य था, लेकिन बैठने के अंदाज से शरीर की बनावट साफ झलक रही थी। भारी स्तन, मोटी कमर, और चौड़ी गाँड। उम्र के हिसाब से शरीर अभी भी गदराया हुआ था। मैंने जल्दी से नजर हटाई और अपने कमरे में चला गया।

अगली सुबह नाश्ते के समय बुआ पहले से थोड़ी बातूनी लगीं। “रात को देर तक जागता है क्या?” उन्होंने पूछा। “कभी-कभी।” “अकेले में नींद कम आती है। मुझे भी यही होता है।”

बात यहीं खत्म हो गई। लेकिन उनके कहने के तरीके में एक थकान थी जो छुप नहीं पा रही थी।

दूसरे दिन बुआ को बाजार से कुछ सामान लाना था। उन्होंने मुझसे कहा, “तू चल साथ। थैले भारी हो जाएंगे।” बाजार जाते समय रास्ते में वो ज्यादा नहीं बोलीं। लौटते समय थैला मेरे हाथ में पकड़ाते हुए उनका हाथ मेरे हाथ से छू गया। दोनों ने अनदेखा कर दिया। घर पहुँचकर सामान रखते समय बुआ एक बार मुड़ीं और बोलीं,

“तू बदल गया है रोहित। पहले इतना चुप नहीं रहता था।” “जॉब की भागदौड़ है बुआ।” वो हल्के से मुस्कुराईं। “भागदौड़ सबकी है। कुछ लोग भागते-भागते थक जाते हैं… कुछ लोग अकेले रह जाते हैं।”

उस शाम खाना खाते समय मैंने उनकी तरफ देखा। चेहरे पर मेकअप नहीं था। बाल बिखरे हुए थे। लेकिन जब वो झुककर डिश आगे करतीं तो ब्लाउज का गड्ढा साफ दिख जाता। मैंने नजरें तुरंत हटा लीं। मन में अजीब सा गुनाह का अहसास हुआ। बुआ थीं। फूफा जी के जाने के बाद अकेली थीं। और मैं यहाँ बैठा उनके शरीर को नोटिस कर रहा था।

रात को फिर नींद नहीं आई। इस बार बुआ के कमरे से कोई आवाज नहीं आई। लेकिन दिमाग में सुबह वाली उनकी बात घूमती रही—“कुछ लोग अकेले रह जाते हैं।”

मैंने करवट बदली। समझ नहीं आ रहा था कि ये बेचैनी कहाँ से आ रही है। बुआ ने कोई इशारा नहीं किया था। कोई बात नहीं कही थी जो गलत लगे। फिर भी उनके अकेलेपन और शरीर की मौजूदगी ने घर के माहौल को थोड़ा भारी बना दिया था।

तीसरे दिन की सुबह जब मैं चाय लेकर बैठा तो बुआ ने अचानक पूछा, “तू कब तक रुकेगा?” “चार पांच दिन में लौटने का सोच रहा हूँ।” वो कुछ देर चुप रहीं। फिर बोलीं, “जैसी तेरी सुविधा।”

उनकी आवाज सामान्य थी। लेकिन आँखों में एक पल के लिए कुछ और दिखा… जो उन्होंने तुरंत छुपा लिया।

तीसरे दिन की शाम को बुआ ने कहा कि घर के पीछे वाले पुराने कमरे में कुछ सामान उठाना है। ताला जंग लगा हुआ था। मैंने धक्का दिया तो दरवाजा खुल गया। अंदर अंधेरा और धूल थी। बुआ मेरे पीछे-पीछे अंदर आईं। कमरा छोटा था। दोनों के बीच जगह कम रह गई। सामान उठाते समय उनकी बाजू बार-बार मेरे बाजू से छू रही थी। एक बार तो जब मैंने नीचे झुककर पेटियों को पकड़ा तो उनके स्तन मेरे कंधे से हल्के से टकरा गए। दोनों एक पल के लिए रुक गए। बुआ ने जल्दी से कहा, “सावधान… चोट लग जाएगी,” और पीछे हट गईं। लेकिन वो छूना दोनों को महसूस हुआ। कमरे से निकलते समय मैंने उनकी तरफ देखा। वो मेरी नजरें बचा रही थीं।

रात को खाना खाते समय बातचीत पहले से थोड़ी ज्यादा हुई। बुआ ने पूछा कि दिल्ली में दोस्त हैं या नहीं, छुट्टियों में क्या करता हूँ। मैंने सामान्य जवाब दिए। फिर उन्होंने अचानक कहा, “फूफा जी के जाने के बाद घर बहुत बड़ा लगने लगा है। कमरे खाली-खाली से रहते हैं।” मैंने कोई जवाब नहीं दिया। बस सिर हिलाया। लेकिन उनकी आवाज में जो अकेलापन था, वो साफ महसूस हो रहा था। खाना खत्म होने के बाद जब वो बर्तन उठाने गईं तो साड़ी का पल्लू एक तरफ सरक गया। ब्लाउज का साइड वाला हिस्सा और कमर की रेखा साफ दिख गई। मैंने नजरें तुरंत प्लेट में गड़ा दीं।

चौथे दिन सुबह की बात है। मैं नहाकर निकला तो देखा बुआ आँगन में बाल सुखा रही हैं। बाल खुले थे, लंबे और काले। सूट का गला थोड़ा ढीला था। जब वो सिर झटके से पीछे करतीं तो स्तन हल्के-हल्के हिलते। मैं पानी का गिलास लेकर वहीं खड़ा रह गया। बुआ ने मुड़कर देखा। हमारी निगाहें मिलीं। कुछ सेकंड तक कोई नहीं बोला। फिर उन्होंने धीमे से कहा, “तौलिया रख दो अंदर… बाल सूख जाएँ तब तक।” मैं तौलिया देकर चला आया। लेकिन आँखों के सामने से वो खुले बाल और हिलते स्तन नहीं हट रहे थे।

दोपहर को बुआ ने कहा कि उन्हें सिर में दर्द है। मैंने पूछा कि दवाई लाऊँ क्या। उन्होंने मना कर दिया। थोड़ी देर बाद वो अपने कमरे में लेट गईं। दरवाजा पूरा बंद नहीं था। मैं पानी रखने गया तो देखा वो करवट लेकर लेटी हैं। साड़ी का पल्लू नीचे सरक गया था। कमर और गाँड का ऊपरी हिस्सा साफ दिख रहा था। सूट पतला था। शरीर की गोलाई कपड़े के नीचे से उभर रही थी। मैंने जितनी जल्दी हो सका पानी रखा और निकल आया। दिल तेज धधक रहा था। खुद पर गुस्सा भी आ रहा था कि नजरें वहाँ क्यों गईं।

शाम को चाय के समय माहौल थोड़ा भारी था। दोनों कम बोल रहे थे। बुआ ने अचानक पूछा, “रात को सो पाता है तू यहाँ?” “जी… ठीक ठाक।” “मुझे नींद कम आती है। आदत हो गई है अकेले जागने की।” मैंने जवाब में सिर्फ इतना कहा, “समय के साथ ठीक हो जाएगा बुआ।” वो मुस्कुराईं। लेकिन मुस्कान अधूरी थी। “समय सब ठीक नहीं करता रोहित। कुछ चीजें समय के साथ और भारी हो जाती हैं।”

रात को मैं अपने कमरे में लेटा रहा। नींद नहीं आ रही थी। दिमाग में दिन भर के वो छोटे-छोटे पल घूम रहे थे—पुराने कमरे में उनका शरीर छूना, आँगन में खुले बाल, दोपहर को सरकता पल्लू, और शाम वाली उनकी बात। लंड तन गया था। मैंने करवट बदली। खुद को समझाने की कोशिश की कि बुआ हैं, परिवार हैं, और ये सब गलत है। लेकिन शरीर नहीं मान रहा था।

आधी रात को मुझे प्यास लगी। गलियारे में निकला तो देखा बुआ का दरवाजा फिर से हल्का खुला है। अंदर अंधेरा था। कोई आवाज नहीं आ रही थी। मैंने पानी पिया और वापस जाने लगा तभी अंदर से हल्की सी कराह जैसी आवाज आई। बहुत धीमी। मैं रुक गया। आवाज फिर से आई। इस बार साफ लगा कि बुआ जाग रही हैं… और अकेली कुछ कर रही हैं। मैं वहाँ और देर तक नहीं रुका। अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया।

दिल जोरों से धधक रहा था। दिमाग में एक के बाद एक ख्याल आ रहे थे। बुआ अकेली थीं। शरीर की जरूरत महसूस कर रही थीं। और मैं घर में मौजूद था।

पाँचवें दिन की रात का सन्नाटा पहले से ज्यादा भारी था। खाना खाते समय दोनों लगभग चुप रहे। बुआ ने सिर्फ एक बार पूछा कि कल दिल्ली लौटूँगा या नहीं। मैंने कहा हाँ। वो सिर हिलाकर रसोई में चली गईं।

रात के लगभग बारह बज रहे थे। मैं करवटें बदल रहा था कि अचानक दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई। दिल बैठ गया। दरवाजा खोला तो बुआ खड़ी थीं। हाथ में पानी का गिलास। नाइटी पहनी हुई थी। पतली। अंदर ब्रा की लाइन साफ झलक रही थी।

“सो नहीं पाया?” उन्होंने धीमे से पूछा। “नहीं।” “मैं भी नहीं।”

वो गिलास मेरे हाथ में देकर भी अंदर आ गईं। दरवाजा पीछे से बंद कर दिया। कमरे में सिर्फ एक दीया जल रहा था। बुआ मेरे बिस्तर के किनारे बैठ गईं। थोड़ी देर सन्नाटा रहा। फिर उन्होंने बहुत धीमे से कहा,

“रोहित… तू समझ रहा है ना क्या हो रहा है?” मैंने जवाब नहीं दिया। “मैं अकेली हूँ। शरीर नहीं मानता। और तू… तू रोज़ आँखों से देख रहा है।”

मैंने गला साफ किया। “बुआ… ये सही नहीं है।” वो मुस्कुराईं। लेकिन मुस्कान में थकान थी। “सही कबसे होने लगा है कुछ भी। फूफा जी चले गए। बेटा विदेश में है। रातें लंबी हो गई हैं। और तू यहाँ आकर और लंबी कर गया।”

उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया और अपनी छाती पर रख दिया। नाइटी के ऊपर से भारी स्तन की गर्माहट और नरमी हाथ में आ गई। मैंने हाथ नहीं हटाया। बुआ ने मेरा हाथ और जोर से दबाया।

“छू… एक बार सही से छू।”

मैंने नाइटी के अंदर हाथ बढ़ाया। ब्रा के ऊपर से स्तन मसले। फिर ब्रा ऊपर कर दी। भारी, लटकते स्तन हाथ में आ गए। निप्पल कड़े हो चुके थे। मैंने एक निप्पल मुँह में लिया और चूसने लगा। बुआ की कराह निकल गई।

“हाँ… ऐसे… जोर से चूस… मादरचोद…”

मैंने दोनों स्तनों को बारी-बारी चूसा। दाँतों से हल्का काटा। बुआ के हाथ मेरे बालों में फँस गए। मैंने उनकी नाइटी ऊपर की। पैंटी के ऊपर से चूत पर हाथ रखा। गरम और गीली। पैंटी साइड में सरकाई और उँगली अंदर डाल दी। बुआ की कमर उछल गई।

“आह्ह… डाल… और अंदर…”

मैंने उँगली तेज की। बुआ हाँफने लगीं। फिर उन्होंने मेरी पैंट खोली। लंड बाहर निकाला। आँखें थोड़ी बड़ी हो गईं। “बड़ा है… मोटा भी… अब चुपचाप मत रह। चोद।”

मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटा दिया। पैंटी पूरी खींचकर फेंक दी। जाँघें फैलाईं और लंड उनकी चूत पर रखा। एक जोर का धक्का मारा। पूरा अंदर चला गया।

“आह्ह्ह… मादरचोद… कितना मोटा… धीरे… नहीं… जोर से ही डाल…”

मैंने पेलना शुरू किया। पहले धीरे, फिर तेज। बुआ की चूत गरम और काफी गीली थी। हर धक्के के साथ उनकी भारी गाँड बिस्तर पर पटक रही थी। स्तन इधर-उधर हिल रहे थे। मैंने दोनों हाथों से स्तन पकड़कर मसलते हुए और तेज गति पकड़ ली।

“चोद… जोर से चोद… रंडी बुआ को चोद… साले… फाड़ दे चूत…” “बुआ… कितनी गरम है… कितनी गीली…” “गाली दे… मुझे गाली दे… रंडी बोल… भोसड़ी की बोल…”

मैंने उनकी टाँगें कंधों पर रख लीं और पूरा लंड अंदर तक पेलने लगा। “ले रंडी… ले बुआ की चूत… मादरचोद तेरी चूत कितनी फेल रही है…” “हाँ… फेल रही है… चोद… और तेज… कमर तोड़ दे मेरी…”

मैंने उनकी कमर पकड़कर जोर-जोर से ठोकरें मारनी शुरू कर दीं। बिस्तर चरमरा रहा था। बुआ की कराहें दबी-दबी लेकिन गंदी निकल रही थीं।

“रोहित… मैं झड़ने वाली हूँ… मत रोक… अंदर ही छोड़… भर दे…”

कुछ और तेज धक्कों के बाद दोनों एक साथ पहुँचे। मेरा वीर्य उनकी चूत में छूटने लगा। बुआ की चूत जोर-जोर से काँप रही थी। मैं उनके ऊपर गिरा रहा। दोनों पसीने से तर थे।

थोड़ी देर बाद मैंने लंड बाहर निकाला। वीर्य उनकी जाँघों पर बहने लगा। बुआ आँखें बंद किए पड़ी थीं। साँसें धीमी हो रही थीं। फिर उन्होंने आँखें खोलीं और धीमे से कहा,

“कल तू दिल्ली चला जा। लेकिन जब भी गाँव आ… रात को मेरे कमरे का दरवाजा खुला रहेगा।”

मैंने कुछ नहीं कहा। बस उनके बगल में लेट गया।

सुबह होते-होते मैंने सामान बाँध लिया। नाश्ता चुपचाप हुआ। बुआ गेट तक आईं। सामान्य स्वर में बोलीं, “संभाल के जाना।” मैंने सिर हिलाया। गाड़ी में बैठते समय पीछे मुड़कर देखा। बुआ दरवाजे पर खड़ी थीं। साड़ी का पल्लू उन्होंने चेहरे तक उठा रखा था। लेकिन आँखें साफ कह रही थीं—ये आखिरी बार नहीं है।

गाँव पीछे छूट रहा था। और बुआ की वो गंदी कराहें अभी भी कानों में गूँज रही थीं।

One comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *