plot : chachi ki chudai : Bhatije ke muh mein moot karke chachi ne apni chut chatwayi aur phir hardcore chudai ki. Bahut gandi chachi sex story.
चाचा की तबीयत जब अचानक बिगड़ी तो घर का पूरा ढांचा हिल गया। अस्पताल के चक्कर, महंगी दवाइयाँ, रात-रात भर जागना—सब कुछ चाची के सिर पर आ गिरा। माँ-बाप गाँव चले गए थे एक रिश्तेदार की शादी में। मैं उस वक्त शहर में ही था। कॉलेज का आखिरी साल चल रहा था और घर बैठे समय काफी कट रहा था। चाची ने खुद फोन मिलाया और आवाज में थकान लिए कहा, “अगर पाँच-सात दिन रह सको तो रह लो बेटा। अकेली से सब कुछ संभालना मुश्किल हो रहा है।”
मैंने बिना देर किए अगली सुबह ही अपना बैग पैक किया और उनके घर पहुँच गया। ये antarvasana family sex story आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।
चाची का नाम कविता है। उम्र बयालीस साल के करीब होगी, लेकिन शरीर देखकर कोई तीस का भी कह सकता था। लंबा और सीधा कद। गोरा, निखरा हुआ रंग। चेहरा अंडाकार, बड़ी-बड़ी आँखें जिनमें थकान के बावजूद एक अजीब तेज चमक रहती थी। बाल लंबे, घने और काले, सिर्फ कानों के पास सफेदी के कुछ धागे दिखाई देते थे।
वे उन्हें छुपाती नहीं थीं। शरीर उनका भरा-भरा और कसा हुआ था। स्तन भारी और आगे को निकले हुए, जो ब्लाउज के अंदर भी अपनी गोलाई और वजन साफ जाहिर करते। कमर अपेक्षाकृत पतली। और कूल्हे… कूल्हे इतने गोल, तने और भारी कि साड़ी की हर लकीर उन पर चढ़कर बैठती थी। चलते समय उनकी गांड में जो थिरकन होती थी, वह अनजाने में ही नजर को रोक लेती थी। मैंने पहले भी पारिवारिक मौकों पर उन्हें देखा था, लेकिन इतने करीब से, इतने दिनों तक कभी नहीं रहा था।
पहले तीन दिन सिर्फ काम और थकान भरे रहे। सुबह जल्दी उठकर दवाई और नाश्ता तैयार करना, अस्पताल पहुँचाना, दोपहर को घर आकर खाना बनाना, शाम को उनके पैर और सिर दबाना। रात को वे अपने कमरे में चली जातीं और मैं दूसरे कमरे में लेट जाता। लेकिन उन तीन दिनों में भी छोटी-छोटी बातें जमा होती गईं। कभी उनके ब्लाउज का बटन खुला रह जाता, कभी साड़ी का पल्लू सरक जाता और उनकी पीठ की चिकनी त्वचा दिख जाती। कभी पैर दबाते समय मेरा हाथ उनकी साड़ी के नीचे की जांघ तक पहुँच जाता और वे हटाती नहीं थीं। एक बार तो उन्होंने खुद मेरा हाथ पकड़कर अपनी जांघ पर रखा और बोलीं, “यहाँ भी दबाओ। बहुत दर्द रहता है।”
चौथे दिन बारिश शुरू हुई। सुबह से आसमान घिरा रहा। दोपहर तक रिमझिम शुरू हो गई। शाम होते-होते जोरों की बारिश होने लगी और बिजली चली गई। पूरा घर अंधेरे में डूब गया। मैंने मोमबत्तियाँ जलाईं और रखीं।
चाची अस्पताल से बहुत थक कर लौटीं। डॉक्टर ने उन्हें तनाव कम रखने के लिए हल्की शराब की इजाजत दी थी। उन्होंने एक पेग ली, फिर आधी पेग और। चेहरा थोड़ा लाल हो गया था। आँखें नम। वे अपने कमरे में गईं। लगभग चालीस मिनट बाद उन्होंने मुझे आवाज दी। आवाज में एक अजीब बेचैनी थी।
“इधर आना एक बार।”
मैं मोमबत्ती लेकर उनके कमरे में गया। कमरे में हल्की काँपती रोशनी थी। चाची बिस्तर के किनारे बैठी थीं। साड़ी का पल्लू एक तरफ पूरी तरह गिरा हुआ था। ब्लाउज के ऊपर के तीन बटन खुले थे। स्तनों की ऊपरी गोलाई, बीच की गहरी रेखा और हल्के पसीने की चमक साफ दिख रही थी। माथे पर पसीने की छोटी-छोटी बूंदें थीं।
“पेट में दर्द हो रहा है,” वे बोलीं। आवाज थोड़ी काँप रही थी। “और नीचे… बहुत जलन हो रही है। डॉक्टर ने कहा था दवा के साइड इफेक्ट में मूत्र की नली में जलन हो सकती है। आज बहुत तेज है।” ये antarvasana chachi ki chudai आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।
मैं पास जाकर बैठ गया। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। उंगलियाँ गरम और थोड़ी काँप रही थीं। मैंने उनके माथे पर हाथ रखा। बुखार नहीं था, लेकिन शरीर गरम था।
“पानी पिला दो।”
मैंने साइड टेबल से गिलास उठाया और उनके होंठों तक ले गया। उन्होंने दो-तीन घूँट लिए और फिर अचानक गिलास धक्का देकर नीचे रख दिया। चेहरे का रंग एकदम बदल गया। आँखें फैली हुई थीं।
“नहीं… अब नहीं रोक पाऊँगी…” उनकी आवाज अचानक व्यग्र हो गई। “बाथरूम तक जाने का समय नहीं बचेगा। बहुत जोर से आ रहा है।”
मैं उठने लगा कि उन्हें सहारा देकर बाथरूम ले जाऊँ, लेकिन उन्होंने मेरा हाथ इतनी जोर से पकड़ा कि मैं बैठ गया। उनकी आँखों में एक अजीब तय था।
“मुंह खोलो,” वे बोलीं। आवाज में अब कोई संकोच नहीं बचा था। “जल्दी करो।”
मैं हैरान रह गया। उन्होंने मेरा सिर दोनों हाथों से पकड़ा और अपने पैरों की तरफ नीचे दबाया। साड़ी पूरी तरह ऊपर उठ चुकी थी। उनके पैर फैले हुए थे। पैंटी नहीं पहनी थी। उनकी चूत मेरे चेहरे के बिल्कुल सामने थी—घने, काले और थोड़े घुँघराले बालों वाली। फाँके मोटी और गहरी रंग की। बीच का हिस्सा पहले से हल्का गीला और चमकदार।
उन्होंने मेरा मुंह अपनी चूत के करीब लाया और फिर नियंत्रण पूरी तरह टूट गया। गर्म मूत्र की धार सीधे मेरे होठों और मुंह पर पड़नी शुरू हो गई। पहले पल में मैं चौंक गया और पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन चाची के हाथ मेरे सिर पर लोहे जैसे जम गए थे। वे मुझे वहीं रोक रही थीं। धार तेज होती गई। गर्म, हल्का नमकीन और तेज गंध वाला तरल मेरे मुंह में भर रहा था। मैं निगलने लगा। एक के बाद एक घूँट। चाची की जांघें मेरे कानों के दोनों तरफ काँप रही थीं। उनकी साँसें तेज और अनियमित चल रही थीं। मूत्र की धार जब थोड़ी मंद पड़ी और रुक-रुक कर आने लगी तो उन्होंने मेरा मुंह अपनी चूत पर और जोर से दबा दिया।
“अब चाटो,” वे लगभग गुर्राते हुए बोलीं। “सब साफ करो। जीभ से चाटो। कुछ बचा मत छोड़ना।”
मेरी जीभ उनकी भीगी हुई, मूत्र से लथपथ चूत पर लग गई। स्वाद तेज था—नमकीन, हल्का पीसा हुआ और उनकी अपनी गंध से मिला हुआ। मैंने चाटना शुरू किया। ऊपर से नीचे तक। फाँकों को अलग करके बीच की पूरी लकीर चाटी। उनके छेद के चारों तरफ जीभ घुमाई। चाची की कमर जोर से उठ गई। उन्होंने मेरे बाल मुट्ठी में भर लिए और अपना निचला हिस्सा मेरे मुंह पर रगड़ने लगीं।
“और अंदर… जीभ पूरा अंदर तक डालो… हां… ऐसे ही… चूसो भी…” ये antarvasana chachi sex story आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।
मैंने उनकी चूत के छेद में जीभ ठूस दी। अंदर बहुत गर्म और चिकना था। वे हिलने लगीं। आवाजें अब बिल्कुल नहीं दब रही थीं। मोमबत्ती की काँपती रोशनी में उनका चेहरा पसीने से चमक रहा था। मैंने एक हाथ बढ़ाकर उनका ब्लाउज पूरी तरह खोल दिया और नीचे सरका दिया। भारी, गोल स्तन बाहर आ गए। गहरे भूरे रंग के निप्पल पूरी तरह सख्त और तने हुए। मैंने एक निप्पल को जोर से मसलते हुए उनकी चूत चूसनी जारी रखी। कभी ऊपर वाले छोटे दाने को मुंह में लेकर होंठों से दबाकर चूसता, कभी छेद में जीभ डालकर अंदर की दीवारों को चाटता, कभी दोनों फाँकों को चूसता।
चाची अचानक जोर से काँपीं। उनकी जांघों ने मेरा सिर जकड़ लिया जैसे वे मुझे अपने अंदर समा लेना चाहती हों। चूत से एक नया गर्म तरल निकला—इस बार पतला और ज्यादा मात्रा में। उन्होंने मेरा मुंह अपनी चूत पर दबाए रखा जब तक शरीर का कंपन पूरी तरह शांत नहीं हो गया। उनके पेट की मांस काँप रही थी।
जब वे ढीली पड़ीं तो मैं धीरे से उठा। मेरा लंड पैंट के अंदर इतना तन चुका था कि दर्द कर रहा था। चाची ने आँखें खोलीं। उनके चेहरे पर शर्म की कोई छाया नहीं थी। सिर्फ गहरी थकान और एक अजीब तरह की तृप्ति थी। आँखें अभी भी धुंधली थीं।
“कपड़े उतारो,” वे बोलीं। आवाज कर्कश और भारी थी। “सब उतारो।”
मैंने अपने कपड़े उतारे। मेरा लंड बाहर आया—पूरी तरह तना हुआ, नसों से भरा, सिर चमकदार और पहले से गीला। चाची ने उसे दोनों हाथों में लिया। उंगलियाँ उसके चारों तरफ पूरी तरह बंद नहीं हो पा रही थीं। उन्होंने उसे अपने गाल से लगाया, फिर होठों से।
“इतने दिन से देख रही थी,” वे धीरे से बोलीं। “आज निगलूंगी। पूरी तरह।”
उन्होंने मुझे बिस्तर पर लिटाया। खुद मेरे ऊपर चढ़ीं। पहले लंड को मुंह में लिया। गहरे तक। गला भर गया। आँखों में पानी आ गया लेकिन उन्होंने रोका नहीं। लार बहकर मेरे अंडकोष तक पहुँच गई। वे लंड को चूसती रहीं—कभी सिर्फ सिर को, कभी आधा, कभी लगभग पूरा। फिर वे ऊपर आईं और अपनी अभी भी पूरी तरह भीगी और सुन्नी चूत पर लंड का मोटा सिर टिकाया। आँखें मुझमें डालकर धीरे-धीरे बैठती गईं। हर इंच अंदर जाते समय उनकी साँस रुक जाती। जब पूरा लंड जड़ तक पहुँच गया तो दोनों रुके रहे। उनकी चूत मेरे लंड को धड़क-धड़क कर जकड़े हुए थी।
“आह्ह… पूरी तरह भर गया… सालों बाद इतना गहरा…”
वे हिलने लगीं। ऊपर-नीचे। पहले धीमे, फिर तेज। उनके भारी स्तन मेरे चेहरे के सामने झूल रहे थे। मैंने दोनों हाथों से उनकी गांड पकड़ ली—गोलाई भरी, नरम, गरम और थोड़ी पसीने से चिकनी। नीचे से धक्के देने लगा। उनकी चूत इतनी गीली थी कि हर हरकत पर जोर की चपचप आवाज आ रही थी। वे तेज होती गईं। अब पूरे जोर से बैठ रही थीं। हर बार जब वे नीचे की तरफ जातीं तो उनके अंदर से पानी की आवाज निकलती और उनके स्तन मेरे चेहरे पर गिरते।
मैंने उन्हें जोर से पलटा। चारों हाथ-पैरों के बल कर दिया। गांड ऊँची की। पीछे से एक ही धक्के में फिर से घुस गया। एक हाथ से उनके लंबे बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और दूसरा हाथ उनकी चूत के ऊपर वाले हिस्से पर रखकर तेजी से सहलाने लगा। जोर-जोर से पेलने लगा। चाची की आवाजें अब पूरे कमरे में गूँज रही थीं। मोमबत्ती की रोशनी में उनकी पीठ की लंबी लकीर, काँपती हुई गांड और मेरे लंड का उनके अंदर गायब होना साफ दिख रहा था।
“और जोर से… अपनी चाची को चोदो… पूरी तरह चोदो… मारो…”
मैंने गति और तेज कर दी। पसीने से दोनों के शरीर चमक रहे थे और चिपक रहे थे। उनकी चूत से पानी बहकर जांघों और बिस्तर पर लग रहा था। थोड़ी देर बाद मैंने लंड बाहर निकाला और उन्हें फिर से लिटाया। उनकी दोनों टाँगें उठाकर मेरे कंधों पर रख दीं। इस कोण से और भी गहराई तक जा रहा था। हर धक्के के साथ उनकी आँखें पीछे की तरफ मुड़ने लगतीं और मुंह से अस्पष्ट आवाजें निकलतीं। ये antarvasana desi chachi sex story आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।
अचानक उनके शरीर में फिर से जोरदार कंपन दौड़ा। चूत ने मेरे लंड को इतनी जोर से जकड़ लिया कि मैं लगभग रुक गया। वे काँपने लगीं। पूरे शरीर में लहरें दौड़ रही थीं। मैंने रुकने के बजाय और तेज ठोकरें मारीं। उनकी ऑर्गेज्म के दौरान मैं उन्हें पेलता रहा। जब वे पूरी तरह ढीली पड़ गईं और साँसें काँपने लगीं तो मैंने भी गहराई तक जाकर छोड़ दिया। गर्म वीर्य की लंबी धार उनके अंदर छूटती गई। एक… दो… तीन… चार…
बहुत देर तक दोनों उसी हालत में पड़े रहे। बाहर बारिश की आवाज अभी भी आ रही थी। मोमबत्ती लगभग खत्म हो चुकी थी और कमरा अंधेरे में डूबने लगा था।
चाची ने धीरे से मेरा चेहरा अपने दोनों हाथों में लिया। आँखों में देखकर बहुत साफ और धीमी आवाज में बोलीं,
“आज तुमने मेरी चूत चटाई। कल से रोज़ चटाना। और जब भी मूत्र की जलन हो या मन करे… तुम्हारा मुंह ही मेरा टॉयलेट होगा। समझे? कोई मना नहीं।”
मैंने जवाब में उनकी चूत पर हाथ रखा। अभी भी गीली, गरम, थोड़ी सूजी हुई और मेरे वीर्य से लथपथ।
उस रात हमने दो बार और किया। एक बार उनकी गांड में—जब उन्होंने खुद कहा, “अब पीछे वाली भी ले लो। आज रात सब कुछ तुम्हारा है। जितना मारना है मारो।” और आखिरी बार फिर से उनकी चूत में, जब वे खुद मेरे मुंह पर बैठ गईं, अपनी फाँके फैलाईं और बोलीं, “अब फिर से चाटो। इस बार बिलकुल साफ करो। कुछ बचा मत छोड़ना।”
सुबह जब बिजली आई और घर रोशन हुआ तो दोनों जानते थे कि यह सिलसिला अब रुकने वाला नहीं है। चाचा अस्पताल के बेड पर थे और हम दोनों के बीच एक ऐसी भूख जाग चुकी थी जो आसानी से शांत होने वाली नहीं थी।
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