पिछला पार्ट पढ़िए : बीवी की सहेली लंड पर ले ली
अपर्णा के साथ जो दो रातें गुजरी थीं, वे अभी भी शरीर में कहीं न कहीं बैठी हुई थीं। लॉज वाली रात और फिर उसके खाली फ्लैट वाली रात। दोनों बार इतना खुला और बेरोक सेक्स हुआ था कि उसके बाद कई दिन तक उसके शब्द और कराहें याद आती रहीं। उसके बाद मिलना कम हो गया था। पूजा घर पर रहती थी, अपर्णा का पति भी आ जाता था। बस कभी-कभी रात को मैसेज हो जाते थे। बातें गंदी होती थीं, लेकिन मिलना मुश्किल था।
फिर एक रात अपर्णा का मैसेज आया। “फोन उठा सकते हो?”
मैं बाथरूम में जाकर मिलाया। “बोल।” “मेरी एक सहेली है। नलिनी। पति बहुत पैसे वाला है, ज्यादातर टाइम बाहर रहता है। घर में सब कुछ है… लेकिन बेड पर वैसा कुछ नहीं। वो काफी अनसैटिस्फाइड रहती है। मैंने उससे तुम्हारी बात की है। नाम नहीं लिया। बस इतना कहा कि एक शादीशुदा आदमी है जो अच्छी तरह संभाल लेता है। उसने दिलचस्पी दिखाई है। मिलना चाहती है।”
मैं कुछ पल चुप रहा। “तू फिर से किसी को मुझसे मिलाने वाली है?” “अगर तुम्हें मंजूर हो तो। नलिनी पैसे वाली है। होटल, कमरा, जो भी लगे वो खुद उठाएगी। तुम्हें कुछ नहीं करना पड़ेगा। सोच लो। जबरदस्ती नहीं है।”
मैंने फोन काट दिया। रात भर मन उलझा रहा। अपर्णा के बाद एक और औरत। सुबह तक फैसला हो गया। दोपहर में अपर्णा को लिखा — “मिला दे।”
परसों शाम को अपर्णा ने एक लाउंज का अड्रेस भेजा। मैं समय पर पहुँचा। अंदर हल्की रोशनी थी। कॉर्नर टेबल पर अपर्णा बैठी थी। उसके साथ जो औरत थी, उसने पहली नजर में ही ध्यान खींच लिया।
नलिनी की उम्र बत्तीस-तैंतीस के बीच होगी। गोरी, साफ त्वचा। चेहरा तेज और आकर्षक। कद लंबा। ब्लैक फिटेड ड्रेस पहनी हुई थी। ड्रेस उसके शरीर पर ऐसे चढ़ा था जैसे जानबूझकर नाप कर बनाया गया हो। स्तन भारी और गोल थे, ड्रेस के ऊपर से उनका उभार साफ दिख रहा था। कमर पतली थी और नीचे की तरफ गाँड गोल तथा भरी हुई। जब वह थोड़ा सा हिलती तो ड्रेस के अंदर उसका शरीर एक अलग अंदाज में लहरियाता। बाल खुले थे, हल्की लिपस्टिक और आँखों में एक थकी हुई लेकिन भूखी चमक। गले में पतली सोने की चेन थी जो उसके क्लेविकल पर पड़ी हुई थी।
अपर्णा ने मुझे देखा और मुस्कुराई। “आ जाओ। नलिनी, ये मनोज। मनोज, ये नलिनी।”
नलिनी ने मेरी तरफ देखा। उसकी निगाह मेरे चेहरे पर कुछ सेकंड टिकी, फिर धीरे से नीचे सरककर मेरे सीने और हाथों पर गई। उसने हल्का मुस्कुराते हुए हाथ बढ़ाया। “नमस्ते। अपर्णा ने आपके बारे में काफी कुछ कहा है।” आवाज धीमी और भारी थी। हाथ नरम था, लेकिन पकड़ में एक आत्मविश्वास था।
हम बैठ गए। बातें पहले सामान्य रहीं। मौसम, लाउंज, शहर। अपर्णा बीच-बीच में बात निकालती रही। नलिनी कम बोल रही थी, लेकिन जब बोलती तो मेरी आँखों में देखकर बोलती। एक बार उसने गिलास उठाते हुए कहा, “अपर्णा कहती है आप बहुत बिजी रहते हो। फिर भी समय निकाल लेते हो कुछ खास लोगों के लिए।” मैंने उसकी तरफ देखा। “खास लोग कम मिलते हैं।” वो हल्के से मुस्कुराई। “तो फिर खास लोगों को समय देना चाहिए।”
थोड़ी देर बाद अपर्णा उठ खड़ी हुई। “मैं बार से कुछ और मँगवा लाती हूँ। तुम लोग बैठो।”
वो चली गई। टेबल पर हम दोनों रह गए। नलिनी ने गिलास घुमाया और सीधे पूछ लिया, “अपर्णा ने जो कहा… वो कितना सच है? कि आप औरत को अच्छी तरह से संभाल लेते हो?”
मैंने उसकी आँखों में देखा। “अपर्णा बातें थोड़ी बढ़ाकर कहती है।” “मुझे बढ़ाकर नहीं चाहिए,” नलिनी ने धीमे से कहा। “मुझे वैसा चाहिए जैसा है। मेरे पति साल में ज्यादातर बाहर रहते हैं। जब आते हैं तो थके होते हैं। बस निभाने भर का काम हो जाता है। कोई भूख नहीं, कोई जोश नहीं। मैं थक गई हूँ सिर्फ निभाई जाने से। मुझे चाही जाने की जरूरत है… जोर से, देर तक।”
उसकी बात में शर्म नहीं थी। एक साफ भूख थी। “और आप मानती हैं कि मैं वो कर सकता हूँ?” “अपर्णा ने कहा आप शादीशुदा हो। घर संभालते हो। और बेड पर… अलग हो। मुझे ड्रामा नहीं चाहिए। सिर्फ एक आदमी चाहिए जो मुझे भूखी न छोड़े।”
अपर्णा लौट आई। तीन गिलास लेकर। उसने दोनों के चेहरे देखे और बैठते हुए बोली, “बातें हो गईं लगती हैं।”
नलिनी ने मेरी तरफ देखा। “हो गईं। मनोज, अगर आपको मंजूर हो तो कल रात मिल सकते हैं? मेरे पास एक फ्लैट है। बिल्कुल अकेला। कोई नहीं आता।”
मैंने अपर्णा की तरफ देखा। वो शांत बैठी थी। फिर नलिनी की तरफ देखा। उसकी आँखों में इंतजार था। “ठीक है। कल।”
नलिनी ने नंबर सेव करवाया। लोकेशन बाद में भेजने वाली थी। बातचीत फिर हल्की हो गई, लेकिन टेबल के नीचे तनाव रह गया। नलिनी कभी-कभी मेरी तरफ देखती और मुस्कुरा देती। एक बार उसने कहा, “उम्मीद है कल आप थके हुए नहीं रहोगे।” मैंने जवाब दिया, “थकान तो बाद में होती है।” वो हँसी। अपर्णा ने आँखें घुमाईं लेकिन कुछ नहीं बोली।
रात को घर लौटते समय पूजा ने पूछा, “आज कहाँ थे?” “कुछ लोग मिल गए थे। बैठ गए।” वो मान गई। लेकिन मेरा मन नलिनी की भारी स्तनों वाली ड्रेस और उसकी साफ बातों में उलझा रहा।
अगली शाम नलिनी का मैसेज आया। “नौ बजे। लोकेशन भेज रही हूँ। समय पर आ जाना। आज जल्दी थकने वाले मूड में मत आना।”
मैंने मैसेज पढ़ा। अपर्णा ने जो दरवाजा खोला था, अब नलिनी उसे और खोल रही थी। और मैं उसमें घुसने जा रहा था।
अगली रात मैं नलिनी के भेजे हुए अड्रेस पर पहुँचा। फ्लैट शहर के बाहर एक शांत कॉम्प्लेक्स में था। लिफ्ट से तीसरी मंजिल पर गया और घंटी बजाई। दरवाजा खुद नलिनी ने खोला।
ब्लैक सिल्क का बाथरोब पहना था। बाथरोब के अंदर कुछ नहीं लग रहा था। बाल खुले थे, हल्की मेकअप, और आँखों में वही शांत भूख। उसने दरवाजा बंद किया और लॉक लगा दिया।
“समय पर आ गए,” उसने कहा। “अच्छा लगा।” “आपने कहा था समय पर आने को।” वो मुस्कुराई। “कहा था। और ये भी कहा था कि थके हुए मत आना।”
वो पास आई। इस बार कोई झिझक नहीं थी। उसने मेरे कॉलर में उँगलियाँ डालकर मुझे अपनी तरफ खींचा और सीधे होठों पर चुंबन कर लिया। चुंबन गहरा और धीमा था। उसकी जीभ ने मेरे होठों को खोला। मेरे हाथ उसके कमर पर चले गए। बाथरोब के नीचे उसका शरीर गरम और नंगा था। मैंने दोनों हाथों से उसकी गाँड को पकड़ा। भारी और गोल। उसने मेरे मुँह में ही हल्की कराह भरी।
“अपर्णा ने सही कहा था,” उसने साँस लेते हुए कहा। “तुम्हारे हाथ अच्छे हैं।”
मैंने बाथरोब की डोरी खोल दी। बाथरोब कंधों से सरक कर फर्श पर गिर गया। नलिनी बिल्कुल नंगी खड़ी थी। भारी गोरे स्तन, गुलाबी निप्पल, चिकनी त्वचा, और जाँघों के बीच हल्के बालों वाली चूत। शरीर ऐसा लग रहा था जैसे नियमित देखभाल से निकला हो। मैंने दोनों स्तनों को हाथ में लिया और मसला। निप्पल उँगलियों के नीचे कड़े हो गए। फिर मैंने एक निप्पल मुँह में ले लिया और जोर से चूसा।
“आह्ह… हल्के से मत… जोर से चूसो,” उसने मेरे बाल पकड़ते हुए कहा।
मैंने उसे बेडरूम की तरफ धकेला। बिस्तर पर गिराया। खुद कपड़े उतारने लगा। जब मेरा लंड बाहर आया तो नलिनी ने उसे देखा और हाथ से पकड़ लिया। “काफी अच्छा है… मोटा और सख्त। अपर्णा ने झूठ नहीं बोला।”
उसने झुककर लंड को मुँह में ले लिया। पहले चाटा, फिर गहराई तक ले गई। गला तक। आँखों में आँसू आ गए लेकिन रुकी नहीं। मैंने उसके बाल पकड़कर धीरे-धीरे धक्के दिए। कुछ देर बाद उसने लंड निकाला और बिस्तर पर लेट गई। जाँघें फैला दीं।
“अब अंदर आओ। देर मत करो।”
मैं उसके ऊपर चढ़ गया। लंड को उसकी गीली चूत पर रगदा और धीरे-धीरे अंदर धकेला। नलिनी ने लंबी साँस ली। “आह्ह… हाँ… पूरा अंदर तक ले जाओ…”
मैंने पूरा लंड अंदर तक डाल दिया। उसकी चूत गरम और टाइट थी। मैंने धीमे लंबे धक्के लगाने शुरू किए। हर धक्के पर उसके भारी स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। मैंने दोनों स्तनों को मसला और निप्पल मरोड़े।
“और तेज… मनोज… मुझे हल्के-फुल्के नहीं चाहिए। जोर से चोदो,” उसने आँखें बंद करके कहा।
मैंने रफ्तार बढ़ा दी। बिस्तर चरमरा रहा था। नलिनी की कराहें तेज हो गईं। उसने अपने पैर मेरी कमर के पीछे लपेट लिए। “हाँ… ऐसे… और गहरा… मेरी चूत फाड़ दो आज…”
मैंने उसकी टाँगें कंधों पर रख लीं और और गहराई तक मारने लगा। नलिनी जोर-जोर से कराह रही थी। “अपर्णा ने कहा था तुम अच्छे हो… सच कहा… और जोर से… गाली भी दो…”
“कितनी प्यासी हो नलिनी… पति के पैसे से सब कुछ खरीद लिया लेकिन चोदने वाला मर्द नहीं मिला,” मैंने कहा। “नहीं मिला… इसलिए तुम्हें बुलवाया… अब चोदो… रंडी की तरह चोदो मुझे…”
मैंने उसे पलटा और पीछे से पकड़ लिया। एक हाथ से बाल खींचे और दूसरे से गाँड पर थप्पड़ मारा। लंड फिर से चूत में डालकर जोर-जोर से पेलने लगा। “हाँ… थप्पड़ मारो… और जोर से चोदो… आज पूरी रात चाहिए…”
हमने उस रात दो लंबे राउंड किए। कभी धीरे, कभी बहुत जोर से। नलिनी खुद ऊपर बैठकर भी चोदी। उसके भारी स्तन मेरे चेहरे पर गिरते रहे। आखिरी बार जब मैं उसके अंदर झड़ा तो वह भी जोर से काँपते हुए झड़ गई। दोनों पसीने से तर थे।
थोड़ी देर बाद नलिनी मेरे सीने पर लेटी हुई बोली, “अपर्णा से कहना… सही आदमी भेजा है उसने। अगली बार जब पति बाहर जाए… फिर बुलवाऊँगी।”
मैंने उसके बालों में उँगलियाँ फेरते हुए जवाब दिया, “बुलाना। आ जाऊँगा।”
