मैं प्रणय, जब इलाहाबाद से अपने मौसाजी के गाँव पहुँचा तो दोपहर का सूरज सिर पर जल रहा था। बस से उतरा और कच्चे रास्ते पर चलने लगा। चारों तरफ हरियाली, खेत, और धूल। मौसाजी का घर गाँव के किनारे था। गेट पर आवाज़ लगाई तो मोटे शरीर वाले मौसाजी निकल आए। गले लगा लिया, मौसी ने चाय पिलाई। मैंने बैग कमरे में रखा। खिड़की से बाहर खेत दिख रहे थे।
अगली सुबह बाहर निकला तो बगल वाले घर से एक लड़की पानी भरने निकली। कुएँ के पास खड़ी थी। लाल ब्लाउज, हरी साड़ी। कमर इतनी पतली कि हाथ में आ जाए, छातियाँ साड़ी के नीचे से फूली हुई, जाँघें मोटी और गोल। चेहरा गोल-मटोल, बड़ी-बड़ी आँखें, बाल कमर तक खुले। मेरी नजरें चिपक गईं। उसने घड़ा उठाया और चल दी। चलते-चलते नजर मिली। एक पल के लिए आँखें भिड़ गईं। उसने जल्दी नजरें झुका लीं।
मौसाजी ने बताया, “वो आशा है। रामप्रसाद किसान की बेटी। बीस साल की। घर का सारा काम करती है।”
बीस साल की कुँवारी। और मैं अट्ठाईस। मन में वही छवि घूमने लगी। उसकी छातियाँ, उसकी कमर, उसकी वो गोल गांड जो साड़ी के नीचे हिल रही थी।
दूसरे दिन दोपहर को खेतों की तरफ निकला। रामप्रसाद के खेत में आशा अकेली बैठी थी बाजरे के पौधों के बीच। घाघरा-चोली पहने। चोली टाइट, छातियाँ बाहर धकेल रही थीं। पसीने से कपड़े चिपक गए थे। मैं पास रुका।
“नमस्ते भैया।”
“नमस्ते। अकेली हो?”
“पापा बाजार गए हैं।”
बातें होने लगीं। मैं उसकी छातियों को घूर रहा था। निप्पल की गोलाई साफ दिख रही थी। मेरा लंड पैंट में हिलने लगा। आशा भी मुझे देख रही थी—शहर वाला शरीर, मजबूत बाजू। बात करते-करते मेरी नजर बार-बार उसकी जाँघों के जोड़ पर जा रही थी। घाघरे के नीचे क्या होगा… कुँवारी बुर, कभी न छुई हुई।
तीसरे दिन शाम को कुएँ पर गया। आशा पहले से खड़ी थी। मैंने पानी निकालने का नाटक किया। दोनों पास आ गए।
“तुम शहर से हो ना?” उसने पूछा।
“हाँ।”
बात करते-करते उसका ब्लाउज थोड़ा खिसक गया। अंदर गोरा चमड़ा और गहरा गड्ढा दिख गया। मेरा लंड झट से सख्त हो गया। आशा ने जल्दी ठीक किया, गाल लाल हो गए। लेकिन मैं देख चुका था। रात को बिस्तर पर लेटा रहा। आशा का वो गड्ढा, उसकी भीगी चोली, उसकी मोटी जाँघें—सब याद आ रहा था। मैंने पैंट खोली और अपने मोटे लंड को हाथ में ले लिया। ऊपर-नीचे करने लगा। आशा की कुँवारी बुर सोच-सोचकर झड़ गया। वीर्य हाथ पर गिरते हुए सोचा—एक दिन इस बुर को चूसूँगा, फाड़ूँगा।
चौथे दिन सुबह देखा कि आशा अपने आँगन में नहा रही है। बाँस की टट्टी के पीछे। पानी डालते समय साड़ी पूरी भीग गई। गीली साड़ी शरीर से चिपक कर उसकी गोल चूत और गांड की शक्ल साफ दिखा रही थी। मेरा लंड तुरंत खड़ा हो गया। मैं दूर से ही घूर रहा था। आशा ने पीठ मोड़ी तो उसकी चूत के दोनों लोथड़े अलग दिखे। मैंने मन ही मन गाली दी—साली की इतनी मस्त बुर, कब तक कुँवारी रहेगी।
उसी दिन दोपहर को मौसाजी और मौसी दोनों बाहर चले गए। घर खाली। आशा दूध लेकर आई।
“मौसीजी ने कहा था।”
मैंने बर्तन लिया। “अंदर आ जा, पानी पी ले।”
वह अंदर आ गई। मैंने दरवाजा बंद कर दिया। दोनों बैठे। मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम बहुत हॉट लगती हो आशा।”
वह काँप गई। मैंने चेहरा अपने तरफ घुमाया और होठों पर मुँह रख दिया। पहले हल्का, फिर जोर से। जीभ अंदर घुसा दी। आशा की साँसें तेज हो गईं। मैंने ब्लाउज के ऊपर से उसकी भारी छाती मसली। निप्पल कड़े हो चुके थे। ब्लाउज के अंदर हाथ डाल दिया। नंगी नरम छाती। एक निप्पल को उँगलियों से मरोड़ा। आशा कराह उठी।
“नहीं… मत करो…” लेकिन आवाज में मना करने का जोर नहीं था।
मैंने दूसरी छाती भी दबाई। “तेरी ये दूध वाली छातियाँ… चूसने का मन कर रहा है।”
आशा की चूत से मुझे गर्मी महसूस हो रही थी। मैंने घाघरे के अंदर हाथ डाल दिया। जाँघें मुलायम। और ऊपर—गर्म, गीली बुर। मेरी उँगली फट से उसकी फटी पर सरक गई। आशा जोर से काँपी।
“आह्ह… भैया…”
मैंने क्लिट को उँगली से मसला। आशा की टाँगें काँपने लगीं। दो उँगलियाँ अंदर ठूँस दीं। कुँवारी छेद इतना तंग था कि उँगलियाँ मुश्किल से घुसीं। आशा दर्द से सिसकी, लेकिन मैंने अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया। उसकी बुर से पानी बहने लगा। मैंने उँगलियाँ निकालकर सूँघीं—तीव्र गंध।
“साली, तेरी बुर पहले से इतनी गीली हो गई?”
आशा शर्म से लाल हो गई। तभी बाहर आवाज आई। वह झट से उठी और भाग गई। मेरी उँगलियाँ अभी भी गीली थीं। मैंने लंड निकालकर उन उँगलियों से मल दिया। आशा की बुर का स्वाद लेकर झड़ गया।
शाम को खेत के किनारे बबूल के पेड़ों के पीछे मिली। आशा खुद आई। उसने मेरा हाथ पकड़ा।
“कल जो किया… मुझे अच्छा लगा।”
मैंने उसे पेड़ से लगा लिया। मेरा सख्त लंड उसकी जाँघ से टकरा रहा था। उसने महसूस किया। आँखें फटी रह गईं। मैंने उसका हाथ पकड़कर अपनी पैंट पर रखा।
“ये ले, तेरी बुर के लिए खड़ा है। छू के देख।”
आशा का हाथ काँप रहा था, लेकिन उसने दबाया। मैंने पैंट का बटन खोला। मोटा लंड बाहर निकल आया। आशा की साँसें रुक गईं। मैंने उसका हाथ लंड पर फिरवाया।
“इतना मोटा… कैसे जाएगा?”
“जाएगा। तेरी कुँवारी बुर को चीरते हुए जाएगा।”
मैंने उसकी साड़ी का पल्लू हटाया और घाघरे के अंदर हाथ डाल दिया। फिर से उँगलियाँ अंदर। इस बार तीन। आशा मुँह दबाकर कराह रही थी। उसकी बुर चिपचिपी हो चुकी थी। मैंने कहा, “कल घर खाली रहेगा। आ जाना। आज रात सोच-सोचकर हिलाऊँगा तेरी बुर को।”
अगले दिन मौसाजी-मौसी दो दिन के लिए चले गए। शाम होते ही आशा आई। दरवाजा बंद किया। मैंने उसे गोद में उठाया और बिस्तर पर पटक दिया। साड़ी, ब्लाउज, घाघरा—सब फाड़कर उतार दिया। आशा नंगी लेटी थी। भारी छातियाँ, पतली कमर, घनी काली झाड़ी। बुर के होंठ थोड़े फूले और चमक रहे थे।
मैंने कपड़े उतारे। मेरा लंड तनकर खड़ा था—मोटा, नसों से भरा, टोपा चमक रहा था। आशा की आँखें फटी रह गईं।
“इतना बड़ा डालोगे तो फट जाएगी मेरी…”
“फटेगी। आज तेरी कुँवारी बुर चूर-चूर कर दूँगा।”
मैं उसके ऊपर चढ़ गया। होठों को चूसा, गर्दन को काटा, फिर छातियों पर टूट पड़ा। एक निप्पल मुँह में लेकर जोर-जोर से चूसा, दाँतों से काटा। आशा कराह रही थी। दूसरी छाती मसलता रहा। फिर नीचे सरका। जाँघें फैला दीं। बुर के पास मुँह ले जाकर लंबा चाटा। जीभ अंदर घुसा दी। आशा की कमर उछल गई।
“आह्ह… क्या कर रहे हो… जीभ… अंदर…”
मैंने क्लिट को चूसा, दाँतों से हल्का काटा। आशा चीख रही थी। उसकी बुर से पानी मेरी जीभ पर बह रहा था। मैंने चाट-चाट कर उसे पागल कर दिया। जब अच्छी तरह भीग गई तो ऊपर आया। लंड उसके बुर के मुँह पर रखा।
“देख, अब तेरी कुँवारी बुर में घुसने वाला हूँ।”
धीरे धकेला। सिर्फ टोपा अंदर गया। आशा दर्द से मुँह बना रही थी।
“आह्ह… दर्द… बहुत दर्द…”
“सहन कर रंडी। अभी पूरा जाएगा।”
मैंने और धकेला। झिल्ली टूटने की आवाज आई। आशा की आँखों में आँसू आ गए। मैं रुका नहीं। एक जोर का धक्का मारा—पूरा लंड अंदर धँस गया। आशा की बुर फट गई। खून लगा। अंदर इतनी तंग थी कि मेरा लंड दबकर रह गया।
“मादरचोद कितनी टाइट है तेरी बुर… पहली बार चोदी जा रही है ना?”
आशा सिर्फ सिसक रही थी। मैंने धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू किया। हर धक्के के साथ खून और पानी निकल रहा था। आशा की कराहें बदलने लगीं—दर्द से मजे की तरफ। मैंने गति बढ़ा दी। बिस्तर चरमरा रहा था। उसकी छातियाँ उछल रही थीं। मैंने दोनों टाँगें कंधों पर चढ़ा लीं और गहराई तक ठोकने लगा।
“ले… ले… कुँवारी बुर चोद रहा हूँ… चूर-चूर कर दूँगा आज।”
आशा पागल हो रही थी। उसकी बुर मेरा लंड निचोड़ रही थी। मैंने और जोर लगाया। चप-चप की आवाजें पूरे कमरे में गूँज रही थीं। आशा की आँखें पीछे मुड़ने लगीं। शरीर अकड़ गया। वह जोर से काँपी—पहला झटना। उसकी बुर बार-बार सिकुड़कर मेरे लंड को निचोड़ रही थी।
मैं रुका नहीं। उसे पलटा, घुटनों के बल किया। पीछे से लंड फिर से धँसा दिया। अब और गहरा जा रहा था। उसकी गोल गांड मेरे पेट से टकरा रही थी। मैंने थप्पड़ मारे।
“बोल रंडी… कैसी लग रही है तेरी फटी हुई बुर?”
“अच्छी… बहुत अच्छी… और जोर से चोदो…”
मैंने दोनों हाथों से उसकी गांड के लोथड़े फैलाए और जान तोड़कर ठोकने लगा। आशा फिर से कराहने लगी। दूसरा झटना भी आ गया। मैं खुद करीब था। आखिरी धक्के इतने जबरदस्त मारे कि आशा का शरीर आगे सरक गया। मैंने गहरी साँस ली और अपना पूरा गर्म वीर्य उसकी बुर के अंदर उड़ेल दिया। एक के बाद एक धार। आशा की फटी हुई बुर वीर्य से भर गई।
दोनों पसीने से तर बिस्तर पर गिरे। मेरा लंड अभी भी अंदर था। धीरे-धीरे ढीला पड़ रहा था। आशा की जाँघों पर खून और वीर्य मिलकर बह रहे थे। उसकी बुर लाल और सूजी हुई थी।
मैंने उसके बाल पकड़कर चेहरा उठाया। “अब तेरी कुँवारी बुर मेरी हो गई। रात अभी बाकी है। और चोदूँगा।”
आशा थकी हुई आँखों से देख रही थी। बाहर गाँव सो रहा था। और अंदर मेरा लंड फिर से उठने लगा था।
आशा अभी भी मेरे नीचे लेटी हुई थी। साँसें हाँफ रही थीं। उसकी फटी हुई बुर से मेरा वीर्य और खून मिलकर जाँघों पर बह रहा था। मैंने अपना आधा-सख्त लंड बाहर निकाला। छेद खुला हुआ था, लाल, सूजा हुआ। मैंने उँगली से छुआ तो आशा काँप गई।
“दर्द हो रहा है?”
वह धीरे से बोली, “हो रहा है… लेकिन… अच्छा भी लग रहा है।”
मैंने मुस्कुराते हुए उसके बाल चेहरे से हटाए। “रात लंबी है साली। अभी तो सिर्फ एक बार चोदा है। तेरी ये कुँवारी बुर पूरी तरह चूर नहीं हुई।”
मेरा लंड फिर से उठने लगा था। आशा की नंगी छातियाँ, उसके कड़े निप्पल, और वो खुली हुई गीली बुर देखकर खून सिर पर चढ़ रहा था। मैंने उसे पलटा। अब वह पेट के बल लेटी थी। मैंने उसकी गांड के दोनों लोथड़े फैलाए। बीच में उसकी फटी बुर चमक रही थी। मैंने थूक लगाकर लंड पर मल दिया और सीधा अंदर धँसा दिया।
आशा चीख पड़ी। “आह्ह… अरे… धीरे…”
“धीरे चोदूँगा तो मजा कैसे आएगा रंडी?”
मैंने कमर पकड़ी और जोर-जोर से ठोकना शुरू कर दिया। हर धक्के के साथ उसकी गांड मेरे पेट से टकरा रही थी। चप-चप की आवाज पूरे कमरे में गूँज रही थी। आशा तकिया दबाए हुए कराह रही थी। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा।
“बोल… कैसी लग रही है तेरी चूदी हुई बुर?”
“बहनचोद… बहुत जोर से… अंदर तक जा रहा है…”
मैं और तेज हो गया। लंड पूरा अंदर-बाहर हो रहा था। आशा की बुर अब इतनी गीली थी कि आसानी से घुस जा रहा था, लेकिन अभी भी टाइट थी। मैंने एक हाथ आगे बढ़ाकर उसकी क्लिट मसलनी शुरू कर दी। आशा पागल हो गई। उसकी कमर खुद पीछे को धकेलने लगी।
“हाँ… वैसे ही… और मसल… आह्ह…”
मैंने थप्पड़ बरसाए उसकी गांड पर। लाल निशान पड़ गए। आशा कराहते हुए झड़ गई। उसकी बुर जोर-जोर से सिकुड़ रही थी। मैंने महसूस किया कि वो मेरे लंड को निचोड़ रही है। लेकिन मैं रुका नहीं। उसी हालत में उसे चोदता रहा। आशा की आवाजें अब सिसकियों में बदल गई थीं।
जब मेरा भी करीब आया तो मैंने लंड बाहर निकाला। आशा को घुमाया और उसके मुँह के सामने लाया।
“अब मुँह खोल। अपना वीर्य पी।”
आशा हिचकिचाई। मैंने बाल पकड़कर मुँह में ठूँस दिया। वह गैग कर रही थी, लेकिन मैंने पीछे नहीं हटा। गले तक धकेला। आँसू उसकी आँखों से बह रहे थे। मैंने कुछ जोर के धक्के मारे और अपना दूसरा राउंड का गर्म वीर्य उसके मुँह में उड़ेल दिया। आशा निगलने की कोशिश कर रही थी, कुछ बाहर भी बह निकला। मैंने ठोड़ी पकड़कर कहा, “सब पी जा रंडी। एक बूँद बर्बाद नहीं होगी।”
वह निगल गई। मैंने उसके होठों पर थप्पड़ मारा। “शाबाश।”
थोड़ी देर दोनों लेते रहे। मैंने पानी पिया और आशा को भी दिया। उसकी बुर अभी भी खुली और लाल थी। मैंने उँगली अंदर डालकर घुमाई। आशा सिसकी।
“अभी थक गई क्या? रात बाकी है।”
आधा घंटा बाद मेरा लंड फिर खड़ा हो गया। इस बार मैंने आशा को अपनी गोद में बैठाया। उसने खुद लंड पकड़कर अपनी बुर पर रखा और धीरे-धीरे बैठ गई। पूरा अंदर जाते ही उसकी आँखें बंद हो गईं।
“आह्ह… पूरा… पूरा अंदर है…”
मैंने उसकी कमर पकड़ी और नीचे से धक्के मारने लगा। आशा की छातियाँ मेरे चेहरे के सामने उछल रही थीं। मैंने एक निप्पल मुँह में ले लिया और जोर से चूसने लगा। दाँतों से काटा। आशा पागलों की तरह अपनी कमर हिला रही थी। खुद चोद रही थी अपनी बुर को।
“साली… खुद ही मस्त होकर नाच रही है लंड पर।”
मैंने उसके दोनों निप्पल मरोड़े। आशा जोर से चीखी और फिर से झड़ गई। इस बार इतनी जोर से कि उसकी बुर से पानी मेरे लंड पर छलक आया। मैंने उसे बिस्तर पर पटक दिया और मिशनरी में ले लिया। टाँगें कंधों तक मोड़ दीं। अब पूरा वजन डालकर ठोक रहा था। आशा की बुर पूरी तरह खुल चुकी थी, लेकिन मैं चाहता था कि और फटे।
“आज के बाद तेरी बुर कभी पहली जैसी नहीं रहेगी। चूर-चूर कर दी मैंने।”
आशा आँसू और मजे के मिश्रण में डूबी हुई थी। “चोदो… और चोदो… फाड़ दो पूरी…”
मैंने उसी रफ्तार से एक घंटे तक चोदा। पसीने से दोनों तरबतर थे। बिस्तर गीला हो चुका था। आखिर में मैंने गहरी साँस ली और तीसरी बार अपना वीर्य उसकी बुर के अंदर छोड़ दिया। इतना कि बाहर तक बहने लगा।
अब आशा बोल नहीं पा रही थी। बस हाँफ रही थी। मैं उसके बगल में लेट गया। हाथ से उसकी सूजी हुई बुर सहला रहा था। उँगली अंदर डालकर वीर्य निकाल रहा था और फिर से अंदर ठूँस रहा था।
“देख कितना वीर्य भर दिया है तेरी बुर में। कल तक निकलता रहेगा।”
आशा ने थकी हुई आवाज में कहा, “तुम… बहुत बुरे हो…”
मैं हँसा। “बुरे नहीं, तेरी बुर का मालिक हूँ अब।”
रात के दो बज रहे थे। मैं सोने नहीं दे रहा था। थोड़ी देर बाद फिर से उठा। इस बार आशा को कुत्ते की तरह किया। हाथ-पैर फैला दिए। पीछे से घुसा और बाल पकड़कर खींचते हुए चोदा। आशा की गांड पर थप्पड़, कमर पर नाखून। मैं गालियाँ बरसा रहा था।
“ले मादरचोद… ले चूत… गाँव की कुँवारी रंडी… शहर वाले लंड से फट गई ना?”
आशा बस कराह रही थी। “हाँ… फट गई… पूरी फट गई… और चोदो…”
मैंने चौथी बार उसके अंदर ही झड़ दिया। अब मेरा लंड भी सुन्न पड़ने लगा था। आशा की बुर इतनी सूज गई थी कि छूने से भी दर्द हो रहा था। मैंने उसे नहाने के लिए उठाया। कुएँ से पानी लाकर उसके पूरे शरीर पर डाला। विशेषकर उसकी बुर पर। ठंडे पानी से वह सिसक रही थी। मैंने साबुन से धीरे-धीरे साफ किया। उँगलियाँ फिर से अंदर चली गईं। आशा ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
“अब नहीं… दर्द हो रहा है बहुत।”
मैंने चुंबन लिया। “अच्छा, सुबह तक आराम कर। लेकिन सुबह फिर लूँगा।”
हम दोनों नंगे ही बिस्तर पर सो गए। आशा मेरे सीने से चिपककर सोई। उसकी टाँग मेरे लंड पर थी।
सुबह जब आँख खुली तो सूरज निकल चुका था। आशा अभी भी नंगी सोई थी। उसकी जाँघों के बीच सूखा वीर्य और खून के निशान थे। बुर लाल और थोड़ी खुली हुई दिख रही थी। मेरा लंड सुबह-सुबह फिर तन गया। मैंने उसके पास मुँह ले जाकर बुर चाटनी शुरू कर दी। आशा आँखें खोलते हुए कराह उठी।
“प्रणय… अब नहीं…”
“एक बार सुबह की। फिर छोड़ दूँगा।”
मैंने उसे बिना पूरी तरह जगाए मिशनरी में ले लिया। आधा सोई हुई हालत में उसकी बुर में लंड धँसा दिया। आशा दर्द और नींद के मेल में सिसक रही थी। मैंने धीरे-धीरे लेकिन गहराई तक चोदा। उसकी छातियाँ मुँह में ले-लेकर चूसता रहा। आखिर में पाँचवी बार उसके अंदर झड़ गया।
अब सच में दोनों थक चुके थे। आशा ने मेरा चेहरा पकड़कर कहा, “तुमने मेरी बुर सच में चूर-चूर कर दी। चलने में भी दर्द होगा।”
मैंने उसके माथे पर चुंबन लिया। “याद रहेगी जिंदगी भर ये रात। गाँव की कुँवारी बुर, शहर वाले लंड ने फाड़ दी।”
हमने कपड़े पहने। आशा ने साड़ी बाँधी तो भी उसकी चलने की चाल बदल चुकी थी। थोड़ी टेढ़ी-मेढ़ी। दरवाजे पर खड़ी होकर बोली, “कब जा रहे हो वापस?”
“दो दिन और ठहरूँगा।”
उसकी आँखों में एक अजीब चमक थी। “तो… रात को फिर आ जाऊँ?”
मैंने उसकी गांड पर जोर से थप्पड़ मारा। “आ जा। अब तेरी बुर की आदत लग गई है मुझे।”
आशा मुस्कुराई और चली गई। मैं दरवाजे पर खड़ा उसकी हिलती हुई गांड को देखता रहा। पैंट में लंड फिर से हिलने लगा था।
दो दिन और… मैंने मन ही मन तय कर लिया था। इन दो दिनों में आशा की बुर को इतना चोदूँगा कि वो शहर जाते वक्त भी मेरे लंड की याद में भीगी रहे।
गाँव की कुँवारी बुर… चूर-चूर हो चुकी थी। और बाकी बची-खुची भी मैं चूर कर देने वाला था।
