मेरा नाम गरिमा है। उम्र तीस साल पूरी हो चुकी है, लेकिन शरीर अभी भी वैसा ही है जैसा शादी के समय था। बल्कि और निखरा हुआ। लंबे, घने, काले बाल जो कमर से थोड़ा नीचे तक आते हैं। गोरा-गेहुँआ रंग, बड़ी-बड़ी काली आँखें, पतले होंठ जिन पर हल्का सा प्राकृतिक गुलाबी रंग हमेशा रहता है। स्तन… हाँ, स्तन बड़े हैं। ब्रा के बिना भी भारी और गोल। कमर पतली, कूल्हे चौड़े और गाँड… गाँड ऐसी कि साड़ी के नीचे से भी उसका उभार साफ दिख जाता है। आकाश कहते हैं कि मैं उनकी “सबसे खूबसूरत गलती” हूँ। गलती इसलिए क्योंकि उन्होंने मुझसे शादी कर ली, और खूबसूरत इसलिए क्योंकि अब वो मुझे खोने से डरते हैं।
आकाश से शादी हुए ठीक छह साल और तीन महीने हो गए हैं। वो अच्छा पति है। बहुत अच्छा। सुबह मुझे चाय बनाकर देता है, रात को कभी-कभी पैर दबाता है, महीने में एक-दो बार मुझे शॉपिंग के लिए ले जाता है। लड़ता नहीं, गाली नहीं देता, न ही कभी किसी और औरत का नाम लेता है। लोग कहेंगे कि मैं किस्मत वाली हूँ। और सच पूछो तो प्यार के मामले में मैं किस्मत वाली ही हूँ। लेकिन शरीर… शरीर का किस्मत अलग होता है।
आकाश की लंड औसत साइज़ की है। न बहुत छोटी, न बहुत बड़ी। जब वो मुझमें घुसता है तो महसूस होता है, लेकिन वो भूख नहीं मिटती जो अंदर बैठी है। वो दस-बारह मिनट में झड़ जाता है। उसके बाद मुझे गले लगाकर सो जाता है। और मैं… मैं अँधेरे में आँखें खोले लेटी रहती हूँ। चूत में हल्का सा खालीपन लिए हुए। कभी-कभी बाथरूम जाकर अपनी उँगलियाँ अंदर डालती हूँ, कभी आकाश के लंड पर बचा हुआ पानी चाटने की कोशिश करती हूँ, लेकिन वो नींद में ही मुड़ जाता है। छह साल में मैंने उससे कभी नहीं कहा कि मुझे और चाहिए। क्योंकि कहने से क्या होता? आकाश बदल नहीं सकते। वो जैसे हैं, वैसे ही अच्छे हैं। लेकिन मैं… मैं वैसी नहीं रही।
शादी से पहले की ज़िंदगी याद आती है तो शरीर में एक अजीब सी गरमाहट फैल जाती है। कॉलेज के पहले साल में रोहित था। मेरा बैचमेट। उसकी लंड काली और मोटी थी। पहली बार उसने मुझे कॉलेज के लाइब्रेरी के पीछे वाले कमरे में चोदा था। मैंने साड़ी नहीं, जींस और टॉप पहना था। उसने मेरी जींस नीचे की, पैंटी एक तरफ की और खड़े-खड़े घुसेड़ दी। दर्द हुआ था, लेकिन मज़ा भी। उसके बाद हम लगभग हर हफ्ते मिलते थे। कभी वो मुझे अपने दोस्त के फ्लैट में ले जाता, कभी मैं उसके हॉस्टल के पीछे। उसने मुझे सिखाया था कि लंड कैसे चूसते हैं। कैसे आँखें ऊपर करके देखते हैं जब मुँह भरा हो। कैसे थूक लगा-लगा के लंड को चमकाना है।
फिर था राजू। हमारे पुराने घर का बिजली मिस्त्री। उम्र में मुझसे छह-सात साल बड़ा। एक दोपहर मैं अकेली थी। माँ-बाबा बाजार गए हुए थे। राजू पंखे की मरम्मत करने आया। मैंने जानबूझकर अपनी नाइटी का फीता ढीला छोड़ रखा था। उसने देखा। फिर देखा। फिर दरवाज़ा बंद करके मुझे दीवार से लगा दिया। उसकी लंड रोहित से भी मोटी थी। उसने मुझे बिस्तर पर लिटाकर पहले चाटा, फिर चोदा। चार बार। आखिरी बार मेरी गाँड में। मैंने दर्द से आँखें बंद कर ली थीं, लेकिन जब वो अंदर झड़ रहा था तो मैं भी झड़ गई थी। राजू ने कहा था – “गरिमा, तुम शादी के बाद भी ऐसे ही रंडी बनी रहना।” उस दिन मुझे गुस्सा आया था। आज याद करके चूत गीली हो जाती है।
और सबसे खतरनाक था विक्की। कॉलेज के आखिरी साल का। विक्की पूरा पागल था। वो मुझे सिर्फ़ चोदता नहीं था, वो मुझे तोड़ता था। होटल के कमरों में रात-भर। कभी दोनों छेद एक साथ उँगलियों से फाड़ता, कभी मेरी गर्दन में हाथ दबाकर चोदता, कभी मेरे मुँह में झड़कर मुझे निगलने पर मजबूर करता। उसने एक बार कहा था – “तुझे एक लंड से काम नहीं चलेगा गरिमा। तुझे अलग-अलग लंड चाहिए। मोटे, लंबे, टेढ़े, मुड़े हुए… सब।” उस समय मैं हँसी थी। आज… आज लगता है उसने सच कहा था।
शादी के बाद मैंने सोचा था कि अब सब खत्म। आकाश काफी हैं। पहले साल तो ठीक था। नयी-नयी शादी, नयी-नयी चूत, आकाश भी जोश में रहते थे। लेकिन धीरे-धीरे सब सामान्य हो गया। अब सेक्स हफ्ते में एक-दो बार। कभी-कभी पंद्रह दिन बाद। और जब होता है तो… बस होता है। कोई गाली नहीं, कोई जबरदस्ती नहीं, कोई नया तरीका नहीं। सिर्फ़ प्यार भरी चुदाई। और मुझे प्यार भरी चुदाई के साथ… गंदी चुदाई भी चाहिए।
आज से लगभग तीन हफ्ते पहले हमारे फ्लैट के बगल वाले फ्लैट में नया परिवार आया। विकास और उसकी पत्नी। विकास उम्र में मुझसे थोड़ा बड़ा, करीब पैंतीस-छत्तीस का। लंबा, कंधे चौड़े, बाँहें मोटी, दाढ़ी हल्की-सी रखता है। पहली बार जब आकाश ने उसका परिचय करवाया था, तब उसकी नज़रें मेरे स्तनों पर एक पल के लिए टिकी थीं। बस एक पल। लेकिन मैंने देख लिया था। और अंदर ही अंदर कुछ हिल गया था।
पहले हफ्ते में दो-तीन बार सामना हुआ। लिफ्ट में, पार्किंग में, सोसायटी के गार्डन में। हर बार वो नमस्ते कहता, मैं भी कहती। लेकिन हर बार उसकी नज़रें थोड़ी देर ज्यादा टिकतीं। एक दिन मैं साड़ी में थी, पल्लू ठीक से नहीं रखा था। उसने देखा और फिर अपनी पत्नी की तरफ मुड़ गया जैसे कुछ हुआ ही नहीं। लेकिन उसकी गर्दन लाल हो गई थी।
दूसरे हफ्ते में एक शाम आकाश लेट से आया। मैं बालकनी में खड़ी थी। विकास भी अपनी बालकनी में खड़ा सिगरेट पी रहा था। दोनों बालकनियाँ पास हैं। उसने मुझे देखा। मैंने देखा। फिर उसने सिगरेट का कश लिया और धीरे से बोला – “भाभी, आज बहुत सुंदर लग रही हो।”
मैंने मुस्कुराकर कहा – “शुक्रिया।” और अंदर चली गई। लेकिन उस रात आकाश जब सो रहा था, मैंने अपनी उँगली चूत में डाल रखी थी और विकास का चेहरा याद कर रही थी।
तीसरे हफ्ते में तनाव बढ़ने लगा। एक दोपहर बिजली चली गई। मैं अकेली थी। आकाश ऑफिस। मैंने मोमबत्ती जलाई और सोफे पर किताब लेकर बैठ गई। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। विकास खड़ा था। हाथ में टॉर्च।
“भाभी, आपके यहाँ भी लाइट गई है? मेरे पास पावर बैंक है, अगर फोन चार्ज करना हो तो…”
मैंने उसे अंदर बुला लिया। सिर्फ़ बात करने के लिए। या शायद सिर्फ़ बात करने के लिए नहीं।
वो सोफे पर बैठा। मैं उसके सामने वाली कुर्सी पर। मोमबत्ती की रोशनी में उसका चेहरा और भी आकर्षक लग रहा था। बातें होती रहीं। घर-गृहस्थी, ऑफिस, शहर। फिर अचानक उसने पूछा – “भाभी, आप हमेशा इतनी सुंदर कैसे रहती हो? आकाश भैया किस्मत वाले हैं।”
मैं हँसी। “वो भी यही कहते हैं।” फिर चुप्पी। उसकी नज़रें मेरे गले से नीचे स्तनों की तरफ सरक गईं। साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसका हुआ था। जानबूझकर नहीं छोड़ा था… या शायद छोड़ ही दिया था।
“गरिमा…” उसने पहली बार मेरा नाम लिया। आवाज़ भारी थी। “माफ़ करना, लेकिन मैं रोज तुम्हें देखता हूँ। और रोज खुद को रोकता हूँ।”
मेरा दिल तेज़ धड़कने लगा। मैंने कुछ नहीं कहा। बस उसकी आँखों में देखा। उसने आगे बढ़कर मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी हथेली गरम थी। उसने मेरा हाथ अपनी पेंट पर रखा। नीचे पूरी तरह तनी हुई लंड थी। मोटी। लंबी। आकाश से साफ बड़ी।
मैंने हाथ नहीं हटाया। उँगली से हल्के से दबाया। उसने आँखें बंद कर लीं और साँस छोड़ी।
“छह साल हो गए शादी को…” मैंने धीरे से कहा। “आकाश अच्छा है। लेकिन…” “लेकिन एक लंड से पेट नहीं भरता।” उसने मेरी बात पूरी कर दी।
मैंने सिर हिलाया।
उसने मेरा हाथ और जोर से अपनी लंड पर दबाया। “तो आज पेट भर ले गरिमा। कोई नहीं जानता। न आकाश, न मेरी पत्नी।”
मैं उठी और दरवाज़े का कुंदा लगा दिया। मोमबत्ती की रोशनी में मैं उसके सामने खड़ी हो गई। उसने मेरी साड़ी का पल्लू धीरे से हटाया। फिर ब्लाउज के हुक खोले। मेरे स्तन बाहर आ गए। उसने दोनों हाथों से पकड़ लिया और जोर से दबाया। निप्पल को उँगली से घुमाया। फिर मुँह लगाकर चूसने लगा। दाँतों से हल्के से काटा। दर्द हुआ। अच्छा दर्द।
“आकाश ऐसे चूसता है?” उसने पूछा। “नहीं…” मेरी आवाज़ काँप रही थी। “वो प्यार से चूसते हैं। तुम… भूखे की तरह चूस रहे हो।”
वो मुस्कुराया और मुझे सोफे पर लिटा दिया। साड़ी पूरी तरह खोल दी। पेटीकोट और पैंटी एक साथ नीचे खींच दी। मैं पूरी नंगी हो गई। गले में मंगलसूत्र और हाथ में चूड़ियाँ। बस।
विकास ने मेरी टाँगें फैलाईं और मेरी चूत को देखा। “कितनी गीली है… आकाश की बीवी की चूत… किसी और के लिए तरस रही है।” उसने जीभ निकाली और सीधे चाटने लगा। जोर से, गंदे तरीके से। कभी पूरे फड़के को मुँह में लेकर चूसता, कभी हग के दाने को दाँतों से दबाता, कभी जीभ अंदर तक घुसा देता। मैं कराह रही थी। बालों को पकड़-पकड़ के उसकी तरफ खींच रही थी।
“आह… विकास… ऐसे ही… और जोर से चाट रंडी की चूत को…” गाली निकल गई मुँह से। छह साल बाद पहली बार।
वो और पागल हो गया। दस-पंद्रह मिनट तक वो सिर्फ़ चाटता रहा। मैं दो बार झड़ चुकी थी। पानी सोफे पर फैल गया था। फिर उसने अपनी पेंट खोली। लंड बाहर निकली। काली, नसों वाली, मोटी और लंबी। मैंने हाथ बढ़ाकर पकड़ ली। आकाश की लंड के मुकाबले ये जानवर लग रही थी।
मैं घुटनों के बल बैठ गई और उसे मुँह में ले लिया। पूरा अंदर तक। गले तक। आँखों से पानी आने लगा। विकास ने मेरे बाल पकड़ लिए और धीरे-धीरे धक्के देने लगा।
“चूस… आकाश की बीवी बनके ऐसे लंड चूस… रंडी… तेरा मुँह तो चूत जैसा गरम है…”
मैं चूसती रही। थूक लगा-लगा के, आवाज़ निकाल-निकाल के। फिर उसने मुझे फिर से लिटाया। लंड को मेरी चूत पर टिकाया और एक जोर का धक्का मारा।
“आह्ह्ह… बहनचोद… कितनी मोटी है…”
पूरी लंड अंदर तक चली गई। उसने मेरी दोनों टाँगें फैला रखीं और तेज़-तेज़ चोदने लगा। सोफे की आवाज़ आने लगी। मेरी गाँड बार-बार उठ-गिर रही थी।
“ले… ले रंडी… तेरे पति के घर में तुझे चोद रहा हूँ… कैसी लग रही है असली लंड?” “बहुत… बहुत मस्त… और जोर से… फाड़ दे… आकाश वाला तो बच्चों का खिलौना है इसके आगे…”
वो हँस पड़ा और और तेज़ हो गया। पसीना बह रहा था। उसने मेरे स्तन पकड़-पकड़ के दबाए, निप्पल को मोड़ा, गालियाँ दीं। मैं भी गालियाँ निकाल रही थी।
“साला… धोखा दे रही हूँ… अपने पति के साथ… लेकिन क्या मज़ा आ रहा है… चोद… और चोद…”
अचानक उसने लंड निकाली और मुझे पलटा दिया। घुटनों के बल कर दिया। पीछे से फिर से घुसा दी। अब और गहराई तक जा रहा था। उसने मेरी गाँड के लोथों को फैलाया और अंगूठा गाँड की सेंध पर रखा।
“ये गाँड भी दूँगा आज। आकाश ने मारी है कभी?” “नहीं… कभी नहीं…”
उसने थूक लगाया और धीरे-धीरे गाँड में धक्का दिया। दर्द हुआ। आँखों से आँसू आ गए। लेकिन मैं पीछे हट नहीं। धीरे-धीरे पूरी लंड गाँड में समा गई। फिर उसने चोदना शुरू किया। पहले धीरे, फिर जानवर की तरह।
“आह… मादरचोद… गाँड फट रही है… लेकिन मत रुक… अंदर ही झेड़… आकाश के घर में अपनी गंदी औलाद ठोक…”
विकास पागल हो चुका था। जोर-जोर के धक्के। मेरी चीखें। सोफे की चरमराहट। अचानक उसने जोर का एक धक्का मारा और गाँड के अंदर ही झड़ गया। गर्म पानी फूट-फूट कर अंदर भर रहा था। मैं भी उसी वक्त झड़ गई। पूरा शरीर काँप रहा था।
वो लंड निकाल कर एक तरफ गिर गया। मैं भी लेटी रही। गाँड से उसका पानी रिस रहा था, जाँघों पर बह रहा था। मंगलसूत्र अभी भी गले में ठंडा-ठंडा लग रहा था।
विकास ने मेरी तरफ देखा। साँस फूल रही थी। “गरिमा… ये सिर्फ़ शुरुआत है।”
मैंने उसकी आँखों में देखा। अंदर कुछ टूट चुका था। और कुछ नया जन्म ले चुका था।
आकाश शाम को आएंगे। मुझे नहाना है। साड़ी बदलनी है। खाना बनाना है। और इस गंदगी को छिपाना है।
लेकिन आज रात जब आकाश मुझे चोदेंगे… तो मैं विकास की मोटी लंड याद करूँगी।
और मुस्कुराऊँगी।
