ऐसे बनी मैं रंडी

मेरा नाम मनीषा है। उम्र तैंतीस साल। विधवा।

पति की मृत्यु हुए चार साल हो चुके थे। दुर्घटना में चला गया था। उसके बाद से मैं अकेली ही सब कुछ संभाल रही थी — घर, पैसे, और अपना छोटा बेटा। बेटा छह साल का है। उसकी पढ़ाई का ख्याल रखना मेरे लिए सबसे जरूरी था। इसलिए मैंने होम ट्यूशन टीचर रखवाया।

टीचर का नाम था कबीर। उम्र लगभग अट्ठाईस-उनतीस। लंबे कद का, गेहुँआ रंग, हल्की दाढ़ी। पहली बार जब वह घर आया तो मैंने सोचा सिर्फ पढ़ाने वाला आदमी है। साधारण। लेकिन धीरे-धीरे सब कुछ बदल गया।

पहले महीने वह सिर्फ आता, एक घंटे पढ़ाता और चला जाता। मैं चाय दे देती, थोड़ी बहुत बात कर लेती। अकेली औरत हूँ, बात करने वाला कोई था नहीं। पड़ोस की औरतें सिर्फ सहानुभूति दिखाती थीं, असल में कोई पास नहीं आता था। रातें बहुत लंबी लगती थीं। शरीर की प्यास भी थी, लेकिन मैंने उसे दबाना सीख लिया था।

एक दिन बारिश हो रही थी। कबीर पढ़ाकर निकला तो मैंने कहा, “बारिश रुकने तक रुक जाओ। भीगकर बीमार पड़ जाओगे।”

वह रुक गया। मैंने चाय बनाई। दोनों बैठे बातें करने लगे। उसने पूछा, “आप इतनी अकेली कैसे रह लेती हैं?”

मैं मुस्कुराई। “आदत हो गई है।”

लेकिन उस दिन उसकी नजर मेरी तरफ थोड़ी देर तक टिकी रही। मेरी साड़ी के ब्लाउज पर, फिर मेरी आँखों पर। मुझे अच्छा भी लगा और शर्म भी आई। पति की मृत्यु के बाद किसी मर्द ने मुझे इस तरह नहीं देखा था।

उसके बाद वह रोज थोड़ी देर और रुकने लगा। कभी पानी पीने के बहाने, कभी बेटे की कॉपी जाँचने के बहाने। मैं भी चाहने लगी कि वह रुके। उसकी आवाज, उसकी हँसी, उसका पास बैठना — सब कुछ मेरे सूने शरीर को छूने लगा।

एक शाम की बात है। बेटा सो चुका था। कबीर पढ़ाकर उठने ही वाला था कि मैंने कहा, “आज खाना खाकर जाना। अकेले मैंने ज्यादा बना लिया है।”

वह हँसा। “आपका हुक्म।”

खाना खाते समय हमारी बातें और गहरी हो गईं। उसने बताया कि उसकी भी शादी तय हो रही है, लेकिन दिल नहीं लग रहा। मैंने अपनी जिंदगी की अकेलापन की बात की। अचानक उसकी कुर्सी मेरे करीब आ गई। उसके हाथ ने मेरा हाथ छू लिया।

“मनीषा जी… आप बहुत खूबसूरत हो।”

मेरा दिल तेज धड़कने लगा। “ऐसे नहीं कहते… मैं तुमसे बड़ी हूँ। और विधवा हूँ।”

“उम्र का क्या है। और विधवा होने से औरत की जरूरतें खत्म नहीं हो जातीं।”

उसने मेरा हाथ और कसकर पकड़ लिया। मैंने विरोध नहीं किया। इतने साल बाद किसी मर्द का स्पर्श… मेरा शरीर काँप उठा। कबीर ने धीरे से मेरा चेहरा अपनी तरफ घुमाया और होंठों पर होंठ रख दिए। पहले हल्के से, फिर जोर से। जीभ अंदर घुस आई। मैंने भी जवाब देना शुरू कर दिया। चार साल का भूखा शरीर एकदम जाग उठा।

चुंबन गहरा होता गया। उसका हाथ मेरी कमर पर था, फिर धीरे-धीरे ऊपर सरकते हुए मेरे स्तन पर आ गया। ब्लाउज के ऊपर से ही मसलने लगा। मेरे निप्पल सख्त हो चुके थे। मैं हल्के से कराह उठी।

“कबीर… यह गलत है…”

“गलत लग रहा है क्या?” उसने मेरे गले में साँस छोड़ते हुए पूछा।

“नहीं… लेकिन…”

उसने मेरा जवाब नहीं सुना। उठकर मेरे पास आ गया। मुझे कुर्सी से उठाया और दीवार से सटा दिया। दोनों हाथों से मेरा चेहरा पकड़कर फिर से चूमने लगा। नीचे उसका लंड मेरी जाँघ से टकरा रहा था — सख्त और गर्म। मेरी चूत खुद-ब-खुद गीली होने लगी थी।

मैंने उसके बालों में हाथ डाल दिया। “बेटा सो रहा है… शोर मत करना।”

कबीर ने मेरी साड़ी का पल्लू हटाया। ब्लाउज के हुक खोले। मेरे स्तन बाहर आ गए। उसने दोनों को हाथों में लिया और जोर से मसला। फिर मुँह में एक निप्पल ले लिया और चूसने लगा। दाँत से हल्के से काटा। मेरे शरीर में करंट सा दौड़ गया।

“आह्ह… कबीर…”

वह मुस्कुराया। “बहुत दिनों से तरस रही हो न?”

मैंने शर्म से आँखें बंद कर लीं। “हाँ… बहुत।”

उसने मेरी साड़ी और पेटीकोट एक साथ नीचे गिरा दिए। अब मैं सिर्फ पैंटी में थी। कबीर ने पैंटी के अंदर हाथ डाल दिया। उँगली सीधे मेरी चूत पर गई।

“वाह… इतनी गीली। रंडी जैसी गीली हो रखी हो।”

उसके मुँह से ‘रंडी’ शब्द सुनकर मुझे हल्की जलन हुई, लेकिन साथ में एक अजीब मजा भी आया। इतने साल बाद कोई मुझे इस तरह बुला रहा था। उसने पैंटी खींचकर नीचे गिरा दी। मेरी मुंडी हुई चूत उसके सामने थी। वह झुक गया और जीभ निकालकर चाटने लगा।

“आह्ह्ह्ह… धीरे…”

मेरी टाँगें काँप रही थीं। कबीर की जीभ मेरी चूत के छेद में घुस रही थी, क्लिटोरिस को चूस रही थी। मैं दीवार का सहारा लिए खड़ी थी। उसके बालों को पकड़कर अपनी चूत और उसके मुँह में दबा रही थी। इतनी देर बाद किसी का मुँह मेरी चूत पर था कि मैं पागल होने वाली थी।

थोड़ी देर बाद वह उठा। अपनी पैंट खोली। उसका लंड बाहर आया — मोटा, लंबा, सिर चमक रहा था। मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। पति का इतना बड़ा नहीं था।

“डर गई?” उसने पूछा।

“थोड़ा…”

उसने मुझे गोद में उठाया और बेडroom की तरफ ले गया। बेटे के कमरे से दूर वाले कमरे में। बिस्तर पर लिटा दिया। खुद ऊपर चढ़ गया। लंड को मेरी चूत पर रगड़ने लगा। गीलेपन से फिसल रहा था। फिर एक जोर का धक्का मारा।

“आह्ह्ह्ह्ह!”

पूरा लंड अंदर तक चला गया। मेरी चूत फैल गई। दर्द और मजे का मिश्रण था। कबीर रुका नहीं। धक्के मारने लगा — जोरदार, गहरे। हर धक्के पर मेरे स्तन हिल रहे थे। मैंने अपने पैर उसकी कमर पर लपेट लिए।

“चोदो… जोर से चोदो… चार साल बाद चोद रहे हो मुझे…”

कबीर और तेज हो गया। बिस्तर की आवाज आने लगी। वह मेरे कान में बोल रहा था, “मनीषा आंटी… आज से तुम मेरी रंडी हो। समझी?”

“हाँ… तुम्हारी रंडी… आह्ह… और अंदर…”

उसने मेरी दोनों टाँगें कंधों पर रख दीं। और गहराई तक चोदने लगा। मेरी चूत की आवाज पूरे कमरे में गूँज रही थी — चप-चप-चप। मैं बार-बार झड़ रही थी। शरीर ऐंठ रहा था। कबीर ने भी जल्दी नहीं की। लंबे समय तक चोदता रहा। फिर अचानक उसकी गति तेज हुई।

“अंदर झाड़ूँ?”

“हाँ… अंदर डाल… मेरी चूत में भर दे…”

उसने आखिरी जोरदार धक्के मारे और फिर रुक गया। गरम-गरम माल की धार मेरी चूत के अंदर छूटने लगी। मैंने उसे और अंदर खींच लिया। दोनों पसीने से तरबतर थे।

कबीर मेरे ऊपर गिरा रहा। उसका लंड अभी भी अंदर था। मैं उसके बाल सहला रही थी। “साले… कितना चोदा…”

वह हँसा। “यह तो शुरुआत है आंटी। अब रोज़ चोदूँगा तुम्हें।”

उस रात हमने दो बार और किया। एक बार उसने मुझे घोड़ी बनाकर पीछे से चोदा। मेरी गाँड पर थप्पड़ मारते हुए। दूसरी बार मेरे मुँह में लंड डालकर गला चोदा। मैंने पहली बार किसी का इतना गहरा लंड अपने गले में लिया था। आँखों से आँसू आ गए थे, लेकिन मैंने रोका नहीं। जब उसने मेरे मुँह में झाड़ा तो मैंने सब निगल लिया।

सुबह जब वह जाने लगा तो दरवाजे पर खड़े होकर बोला, “आज से तुम सिर्फ मेरी रंडी हो। कोई और मर्द मत देखना।”

मैंने सिर्फ सिर हिलाया। अंदर ही अंदर एक अजीब सुकून था। चार साल की भूख एक रात में कुछ हद तक बुझी थी। लेकिन भूख और बढ़ गई थी।

अगले दिन से हमारी मुलाकातें बदल गईं। वह ट्यूशन के बहाने आता, बेटे को आधा घंटा पढ़ाता, फिर बेटे को कमरे में खेलने भेजकर मुझे चोदता। कभी रसोई में, कभी बाथरूम में, कभी मेरी अंदर वाली कोठरी में। मैंने खुद को पूरी तरह खोल दिया था।

एक दिन उसने मेरी गाँड में लंड डाला। पहले बहुत दर्द हुआ। मैंने तकिया दबाकर चीख दबाई। लेकिन धीरे-धीरे मजा आने लगा। कबीर मेरी गाँड चोदते हुए कह रहा था, “आंटी की गांड भी रंडी वाली है… कितनी टाइट है…”

मैं पीछे की तरफ धक्के दे रही थी। “फाड़ दो… मेरी गांड फाड़ दो अपने लंड से…”

उस दिन उसने मेरी गाँड में ही माल भरा। जब लंड निकाला तो सफेद गाढ़ा माल बाहर निकल रहा था। मैं बिस्तर पर गिरी रही। शरीर में कोई ताकत नहीं बची थी।

धीरे-धीरे मैं उसकी पूरी रंडी बन गई। वह जब कहता कि चुचियाँ निकालो, मैं निकाल देती। जब कहता कि मुँह खोलो, मैं खोल देती। जब कहता कि गाँड फैलाओ, मैं फैला देती। शर्म जाती रही। बची रह गई सिर्फ प्यास।

एक शाम उसने मुझे अपने दोस्त के बारे में बताया। “कल मेरे एक यार को भी मिलवाऊँ? तुम्हें दोनों मिलकर चोदेंगे।”

पहले मैंने मना किया। फिर सोचा — अब मैं कौन सी पतिव्रता रह गई हूँ। विधवा औरत, जो अपने बेटे के टीचर से चुदवाती है। अब दो हो या तीन, क्या फर्क पड़ता है।

“ठीक है,” मैंने कहा। “लेकिन बेटे के सामने कुछ नहीं होना चाहिए।”

कबीर मुस्कुराया। “डरो मत। सब सावधानी से होगा।”

उस रात जब वह गया तो मैं शीशे के सामने खड़ी रही। नंगी। अपने शरीर को देखा — भारी स्तन, गोल गाँड, इस्तेमाल से थोड़ी ढीली हो चुकी चूत। चार साल पहले मैं एक साधारण गृहस्थी औरत थी। आज मैं एक रंडी थी। अपने ही घर में, अपने बेटे के टीचर की रंडी।

और अजीब बात यह थी कि मुझे पछतावा नहीं हो रहा था। सिर्फ यह सोचकर शरीर में गर्मी उठ रही थी कि कल दो लंड मेरे अंदर होंगे।

मैंने साड़ी पहनी और बेटे के कमरे में जाकर देखा। वह सो रहा था। मैंने उसके माथे पर हाथ फेरा। फिर अपने कमरे में आकर बिस्तर पर लेट गई। जाँघों के बीच अभी भी कबीर का सूखा हुआ माल चिपका हुआ था।

मैंने आँखें बंद कीं और धीरे से अपने आप से कहा —

“ऐसे बनी मैं रंडी।”

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