वर्मा की बीवी मेरी रखैल – शीला आंटी की गंदी रखैली कहानी

मैं अक्षय, तेईस साल का। पढ़ाई के लिए पुणे के एक पुराने चॉल में शिफ्ट हुआ था। कमरा छोटा था, लेकिन सस्ता। नीचे वर्मा अंकल की किराने की दुकान थी। वर्मा अंकल अड़तालीस के थे, गंजे, पेट निकला हुआ, हमेशा पसीने से तर। उनकी बीवी शीला आंटी… जब पहली बार देखी तो साँस रुक गई।

शीला आंटी चौंतीस की थीं। गोरा चमकदार शरीर, भारी-भरकम छातियाँ जो ब्लाउज में समा नहीं पाती थीं, पतली कमर, और चौड़ी गोल गांड। साड़ी पहनती थीं तो पल्लू जानबूझकर कम रखतीं ताकि क्लीवेज साफ दिखे। चलते समय उनकी गांड ऐसे हिलती जैसे जानबूझकर लुभा रही हो। दो बच्चे थे—बेटी सातवीं में, बेटा तीसरी में। दोनों स्कूल चले जाते तो आंटी अकेली रह जातीं।

पहले दिन ही जब मैं किराया देने गया तो वर्मा अंकल दुकान पर थे। आंटी अंदर से निकलीं। लाल ब्लाउज में छातियाँ बाहर को धकेल रही थीं। उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे तक घूरा।

“नए हो ना? अकेले रहते हो?” आवाज में एक अजीब सी मिठास थी।

“हाँ आंटी।”

उन्होंने मुस्कुराते हुए पानी दिया। उँगलियाँ मेरे हाथ से छू गईं। जानबूझकर। मेरा लंड तुरंत हिल गया।

दूसरे दिन शाम को मैं सीढ़ियों पर बैठा था। आंटी नहाकर निकलीं। गीले बाल, शरीर से पानी की बूंदें टपक रही थीं। सफेद साड़ी गीली होने की वजह से अंदर का ब्रा और पेटिकोट साफ झलक रहा था। निप्पल की शक्ल तक दिख रही थी। उन्होंने मेरी तरफ देखा और धीरे से बोलीं, “इतनी देर तक घूरोगे तो लंड खड़ा हो जाएगा बेटा।”

मैं सहम गया। उन्होंने हँसकर कहा, “डर मत। मैंने तो इससे बड़े-बड़े देखे हैं।”

तीसरे दिन दोपहर को वर्मा अंकल दुकान पर व्यस्त थे। बच्चे स्कूल। मैं पानी लेने के बहाने नीचे गया। आंटी रसोई में थीं। ब्लाउज के ऊपर से उनकी छातियाँ पसीने से चमक रही थीं। उन्होंने मुझे अंदर बुलाया।

“अकेले हो ना कमरे में? रात को अकेलापन लगता होगा।”

मैंने सिर हिलाया। उन्होंने पास आकर मेरा कंधा सहलाया। फिर धीरे से नीचे हाथ बढ़ाया और पैंट के ऊपर से मेरे लंड को दबाया।

“ओहो… पहले से ही तना हुआ है। इतनी जल्दी?”

मेरी साँसें फूल गईं। उन्होंने हँसकर कहा, “अभी नहीं। रात को आ जाना जब वर्मा सो जाए। दुकान बंद करने के बाद वो दस बजे तक सो जाता है।”

मैं पूरे दिन बेचैन रहा। रात के साढ़े दस बजे जब चुपके से उनका दरवाजा खटखटाया तो आंटी ने खोला। अंदर अँधेरा था। सिर्फ एक छोटा बल्ब जल रहा था। आंटी ने सिर्फ पेटीकोट और ब्रा पहनी हुई थी। छातियाँ ब्रा से बाहर निकलने को तैयार थीं।

उन्होंने दरवाजा बंद किया और सीधे मेरे पैंट का बटन खोला। मोटा लंड बाहर निकला तो उनकी आँखें चमक उठीं।

“वाह… अच्छे साइज का है। वर्मा के छोटे से लंड से तो कई गुना बेहतर।”

उन्होंने घुटनों के बल बैठकर लंड को मुँह में ले लिया। गरम जीभ से चाटा, फिर पूरा अंदर ले गईं। गले तक। मैं कराह उठा। आंटी ने लंड मुँह से निकालकर बोलीं—

“वर्मा साले का लंड तो दो मिनट भी नहीं खड़ा रहता। बेकार का मर्द है। गंजा, पेट निकला, और लंड भी मुर्गे की तरह। रोज रात को मुझे अधूरा छोड़ देता है। तभी तो मैं बाहर मजे लेती हूँ।”

फिर से मुँह में ले लिया। जोर-जोर से चूसने लगीं। गालिँ देते हुए—

“साले वर्मा की बीवी हूँ… लेकिन आज तेरा लंड चूस रही हूँ। उस बेकार के मर्द को पता भी नहीं चलेगा कि उसकी बीवी कितनी रंडी है।”

मैंने उनके बाल पकड़कर मुँह में और गहरा धकेला। आंटी ने गैग किया लेकिन रोका नहीं। थोड़ी देर बाद उठीं और बिस्तर पर लेट गईं। पेटीकोट ऊपर कर लिया। पैंटी नहीं पहनी थी। घनी काली झाड़ी के बीच चमकती हुई गीली चूत।

“आजा… आज मेरी चूत को अच्छी तरह चोद। वर्मा की तरह दो झटके मारकर मत झड़ना।”

मैं उनके ऊपर चढ़ गया। लंड उनके चूत के मुँह पर रखा। धीरे से धकेला। अंदर इतनी गरम और गीली थी कि लंड खुद सरक गया। आंटी ने आह भरी।

“आह्ह… कितना मोटा है… वर्मा का तो अंदर जाते ही खो जाता था। तूने तो पूरी भर दी।”

मैंने जोर से धक्के शुरू कर दिए। हर धक्के के साथ उनकी भारी छातियाँ उछल रही थीं। मैंने ब्रा खोल दी और दोनों निप्पल मुँह में लेकर चूसने लगा। आंटी कराह रही थीं—

“हाँ… ऐसे ही चोद… वर्मा साले से कहीं बेहतर है तेरा लंड। उस नामर्द को बताऊँगी क्या? नहीं… वो तो सिर्फ दुकान का मालिक है। असली मर्द तो तू है।”

मैंने उनकी टाँगें कंधों पर चढ़ा लीं और गहराई तक ठोकने लगा। चूत चिपचिपी आवाजें निकाल रही थी। आंटी पागलों की तरह बोल रही थीं—

“चोद मुझे… वर्मा की बीवी को चोद… उस गंजे के सामने तो मर्द बनता है, लेकिन बिस्तर पर हरामी निकला। तूने आज मेरी प्यास बुझा दी।”

मैंने गति और बढ़ा दी। आंटी की चूत बार-बार सिकुड़ रही थी। वह जोर से काँपीं और झड़ गईं। उनकी चूत ने मेरे लंड को इतनी जोर से निचोड़ा कि मैं भी नियंत्रण खो बैठा। गर्म वीर्य की धार उनके अंदर छोड़ दी। एक के बाद एक।

थोड़ी देर दोनों पड़े रहे। आंटी ने मेरे लंड को धीरे से सहलाते हुए कहा—

“अब तू मेरी रखैल बनने वाली नहीं… मैं तेरी रखैल बन गई। वर्मा की बीवी होकर भी तेरे लंड की गुलाम।”

मैंने उनके निप्पल को फिर से मुँह में लिया। लंड दोबारा उठने लगा था। आंटी मुस्कुराईं।

“रात अभी बाकी है। आज पूरा मजा ले। कल से रोज़ आना। वर्मा को पता भी नहीं चलेगा कि उसकी बीवी रात-रात भर किसके लंड पर नाच रही है।”

बाहर चॉल शांत था। अंदर शीला आंटी की कराहें फिर से शुरू हो गई थीं। मैंने उन्हें कुत्ते की तरह कर दिया और पीछे से लंड धँसा दिया। उनकी गोल गांड मेरे पेट से टकरा रही थी।

“ले… ले रंडी… वर्मा की बीवी… आज तेरी चूत की सही चूदाई हो रही है।”

आंटी पीछे को धकेलते हुए बोलीं—

“हाँ चोद… उस बेकार के मर्द की बीवी को चोद… उसकी इज्जत की चूत में अपना लंड घुसा… आह्ह… और जोर से…”

मैंने उनके बाल पकड़कर खींचे और जान तोड़कर ठोकने लगा। कमरा चप-चप की आवाजों से भर गया। आंटी की गालियाँ और कराहें एक हो गई थीं।

“वर्मा साले… तेरी बीवी आज किसी और के लंड से चूद रही है… तू सो रहा है दुकान में… और मैं यहाँ… आह्ह… पूरा अंदर… हाँ… ऐसे ही फाड़…”

मैंने दूसरी बार उनके अंदर ही झड़ दिया। वीर्य उनकी जाँघों तक बह निकला। आंटी थककर बिस्तर पर गिर गईं। मैं उनके बगल में लेट गया। उन्होंने मेरा लंड हाथ में लेकर धीरे-धीरे हिलाना शुरू कर दिया।

“कल दोपहर को बच्चे स्कूल जाएँगे… वर्मा दुकान पर रहेगा… तू आ जाना। आज तो बस शुरुआत है। मैंने बहुतों को चोदा है… अमीरों को, सेठों को… लेकिन तेरा लंड… इसमें कुछ बात है।”

मैंने उनकी गीली चूत में उँगली डाली। अभी भी नमी थी। आंटी ने आँखें बंद कर लीं।

“अब सो जा। सुबह जल्दी उठना होगा। वर्मा को शक नहीं होना चाहिए।”

मैं उनके नंगे शरीर से चिपककर लेटा रहा। मन में एक ही बात घूम रही थी—वर्मा अंकल की बीवी अब मेरी रखैल बन चुकी थी। और यह सिलसिला अभी शुरू ही हुआ था।

सुबह जब आँख खुली तो शीला आंटी मेरे सीने पर हाथ रखे सो रही थीं। नंगी। उनकी भारी छातियाँ मेरे शरीर से दबी हुई थीं। मैंने धीरे से उनका निप्पल मुँह में लिया और चूसने लगा। आंटी कराहते हुए जागीं।

“फिर से? रात भर चोदा और अभी भी भूखा है?”

मैंने जवाब में उनके नीचे हाथ बढ़ाया। चूत अभी भी थोड़ी गीली और चिपचिपी थी। रात के वीर्य की नमी बाकी थी। आंटी ने मेरा हाथ पकड़ लिया।

“अभी नहीं। वर्मा जग जाएगा। शाम को आ। आज दुकान जल्दी बंद करेगा। बच्चों को नानी के घर छोड़ने वाला है।”

मैं उठकर कपड़े पहनने लगा। आंटी ने मेरे लंड को एक बार फिर मुँह में लिया, जोर से चूसा और कहा—

“इस लंड को याद रखना। शाम तक इसके लिए तरसती रहूँगी। वर्मा साले का तो छूने से भी मजा नहीं आता।”

मैं उनके होठों पर जोर से चुंबन लेकर निकला।

दोपहर तक मन नहीं लगा। बार-बार आंटी की नंगी शरीर, उनकी गाली-गलौज वाली चुदाई याद आ रही थी। शाम के सात बजे जब वर्मा अंकल बच्चों को लेकर निकले तो मैंने इंतजार किया। साढ़े आठ बजे चुपके से उनके घर का दरवाजा खटखटाया।

आंटी ने खोला। इस बार उन्होंने सिर्फ एक पतली साड़ी पहन रखी थी। अंदर कुछ नहीं। साड़ी के नीचे बिल्कुल नंगी। छातियाँ साड़ी से चिपककर हिल रही थीं। उन्होंने मुझे अंदर खींचा और दरवाजा बंद किया।

“आज पूरा समय है। वर्मा रात भर नहीं आएगा।”

मैंने उनकी साड़ी का पल्लू खींचकर नीचे गिरा दिया। भारी गोरी छातियाँ मुक्त हो गईं। मैंने दोनों को हाथों में भर लिया और निप्पल को दाँतों से काटा। आंटी जोर से कराह उठीं।

“आह्ह… ऐसे ही काट… वर्मा तो सिर्फ दबाता था। तू तो खून निकाल दे।”

मैंने उन्हें बिस्तर पर धक्का देकर लिटा दिया। जाँघें फैला दीं। उनकी चूत पहले से चमक रही थी। मैंने मुँह लगा दिया। जीभ अंदर तक घुसाकर चाटने लगा। आंटी की कमर उछलने लगी।

“हाँ… चाट… वर्मा की बीवी की चूत चाट… उस गंजे हरामी की बीवी की पेशाब वाली जगह चाट… आह्ह…”

मैंने क्लिट को जोर से चूसा। आंटी के नाखून मेरी पीठ पर गड़ गए। थोड़ी देर बाद वे खुद मुझे खींचकर ऊपर ले आईं।

“अब डाल… पूरा डाल… आज मेरी चूत को फाड़ दे।”

मैंने लंड उनके चूत पर रखा और एक झटके में पूरा अंदर धँसा दिया। आंटी चीख पड़ीं।

“आह्ह्ह… मादरचोद कितना गहरा… वर्मा का तो आधा भी नहीं जाता था… तूने तो गर्भ तक पहुँचा दिया…”

मैंने जोर-जोर से ठोकना शुरू किया। हर धक्के के साथ उनकी छातियाँ उछल रही थीं। मैंने दोनों हाथों से छातियाँ मसलते हुए चोदा। आंटी पागलों की तरह गालियाँ दे रही थीं—

“चोद… वर्मा साले की बीवी को चोद… उस नामर्द की इज्जत की चूत में अपना लंड घुसा… उसकी बीवी को अपनी रंडी बना… हाँ… ऐसे ही… और जोर से…”

मैंने उनकी टाँगें मोड़कर कंधों तक कर लीं। अब पूरा वजन डालकर ठोक रहा था। चूत से चप-चप की तेज आवाजें निकल रही थीं। आंटी की आँखें पीछे मुड़ने लगीं।

“मैं झड़ने वाली हूँ… अंदर… अंदर ही झड़ना… वर्मा को कभी अंदर नहीं झड़ने देती थी… तू झाड़… अपनी रखैल की चूत में भर दे…”

मैंने गति और बढ़ा दी। आंटी जोर से काँपीं। उनकी चूत ने मेरे लंड को इतनी जोर से निचोड़ा कि मैं नियंत्रण खो बैठा। गर्म वीर्य की धार उनके अंदर छोड़ दी। आंटी संतुष्ट होकर लेट गईं।

लेकिन मैं रुका नहीं। पाँच मिनट बाद लंड फिर तन गया। आंटी मुस्कुराईं।

“फिर से? आज तो मार ही डालेगा।”

मैंने उन्हें कुत्ते की तरह कर दिया। पीछे से लंड धँसाया। उनकी गोल गांड मेरे पेट से जोर-जोर से टकरा रही थी। मैंने बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और गाली देते हुए चोदा—

“ले रंडी… वर्मा की बीवी… आज तेरी चूत की सही सेवा हो रही है… उस बेकार के मर्द को बता… उसकी बीवी कितनी मजे से चूद रही है…”

आंटी पीछे को धकेलते हुए जवाब दे रही थीं—

“हाँ बताऊँगी… वर्मा साले… तेरी बीवी किसी जवान लंड से चूद रही है… तू दुकान में बैठ… मैं यहाँ लंड पर नाच रही हूँ… आह्ह… पूरा अंदर… फाड़ दे मेरी चूत…”

मैंने उनकी गांड पर जोरदार थप्पड़ मारे। लाल निशान पड़ गए। आंटी और जोर से कराहने लगीं। दूसरी बार भी मैंने उनके अंदर ही झड़ दिया। वीर्य इतना निकला कि उनकी जाँघों से बहकर बिस्तर गीला हो गया।

अब दोनों पसीने से तरबतर थे। आंटी ने मेरे लंड को हाथ में लेकर साफ किया और फिर मुँह में ले लिया। वीर्य का स्वाद लेते हुए बोलीं—

“अपनी रखैल का काम है… मालिक का लंड साफ करना। वर्मा का तो छूने से भी घिन आती थी। तेरा लंड चूसने में मजा आता है।”

मैंने उनके बाल पकड़कर मुँह में और गहरा धकेला। आंटी गैग कर रही थीं लेकिन रोक नहीं रही थीं। थोड़ी देर बाद मैंने तीसरी बार उनके मुँह में ही झड़ दिया। आंटी ने सब निगल लिया। एक बूँद बाहर नहीं गिरने दी।

रात के बारह बज रहे थे। आंटी मेरे ऊपर चढ़ गईं। खुद लंड पकड़कर अपनी चूत में बैठा लिया। अब वे खुद कमर हिला-हिलाकर चोद रही थीं। छातियाँ मेरे चेहरे पर झूल रही थीं। मैंने दोनों निप्पल मुँह में लेकर काटे।

आंटी बोलीं—

“देख… वर्मा की बीवी तेरे लंड पर बैठकर नाच रही है… उस गंजे हरामी को अगर पता चले तो दिल का दौरा पड़ जाए… लेकिन पता नहीं चलेगा… क्योंकि मैं तेरी रखैल हूँ… सिर्फ तेरी…”

मैंने उनकी कमर पकड़कर नीचे से धक्के मारने शुरू कर दिए। आंटी की कराहें तेज हो गईं। चौथी बार दोनों एक साथ झड़े। आंटी मेरे ऊपर गिर पड़ीं। साँसें फूल रही थीं।

“अब काफी है… कल फिर आ। रोज़ आ। जब तक तू इस चॉल में है, मैं तेरी रखैल रहूँगी। वर्मा को सिर्फ खाना और दुकान दिखाना है। असली मजा तुझे देना है।”

मैंने उनके माथे पर चुंबन लिया। “तू मेरी रखैल है शीला। वर्मा की बीवी होकर भी।”

आंटी मुस्कुराईं। “हाँ… वर्मा की बीवी… लेकिन अक्षय की रंडी।”

बाहर सन्नाटा था। अंदर शीला आंटी मेरे लंड को धीरे-धीरे सहलाती हुई लेटी थीं। उनका शरीर अभी भी काँप रहा था। मैंने तय कर लिया था—जब तक पुणे में हूँ, वर्मा अंकल की बीवी मेरी रखैल बनी रहेगी। और हर रात उनकी चूत को अपनी भरपूर सेवा दूँगा।

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