मेरा नाम स्वाती है। उम्र सत्ताईस साल। शादी को लगभग पौने दो साल हो चुके हैं। पति दिनेश। उम्र इकतीस। दिल्ली में रहते हैं। दिनेश एक कंपनी में मार्केटिंग हेड है। कमाता अच्छा है, बातें करना जानता है, और… औरतों के पीछे पागल है। शादी से पहले भी था, शादी के बाद भी रहा।
शादी के पहले छह महीने दिनेश मुझ पर मरता था। रात हो या दिन, जब मौका मिलता चोद देता। कभी बेडरूम में, कभी सोफे पर, कभी किचन में खड़े-खड़े। वो मुझे बहुत पसंद करता था। लेकिन छह महीने बाद अचानक सब बदल गया। पहले हफ्ते में दो-तीन बार छूता था, फिर महीने में एक बार, फिर कभी-कभी। अब तो महीनों बीत जाते हैं। जब मैं पहल करती हूँ तो बहाने बना देता है—थका हूँ, हेडेक है, कल कर लेंगे।
सच ये है कि दिनेश को टाइट चूत चाहिए। और मेरी चूत अब उसे ढीली लगने लगी है। ये बात उसने एक रात साफ शब्दों में कह दी थी।
मेरा शरीर उसके लिए अब भी आकर्षक है। कद 5’5″। गोरी चमकदार त्वचा। चेहरा सुंदर। बाल लंबे और काले। सबसे ज्यादा आकर्षण मेरे शरीर में है। स्तन भारी और गोल हैं—38 साइज। जब ब्रा में होती हूँ तो गड्ढा गहरा दिखता है। कमर पतली है, 28। और गाँड… गाँड पूरी गोल और उभरी हुई। जींस हो या साड़ी, पीछे से देखने वाले ठहर जाते हैं। जाँघें मोटी और मुलायम। पेट सपाट। कुल मिलाकर वो बॉडी है जिसे देखकर मर्द लंड खड़ा कर लें। लेकिन दिनेश को अब सिर्फ टाइट चूत का शौक है। बाहर लड़कियों के पीछे भागता है। मुझे पता है। कई बार उसके फोन में मैसेज देखे हैं। लेकिन मैं चुप रहती हूँ। लड़ाई करके क्या होगा।
उस रात की बात है। दिनेश कुछ दिनों बाद घर पर था। डिनर के बाद वो बेडरूम में लेटा टीवी देख रहा था। मैं नहाकर निकली। सिर्फ एक पतली नाइटी पहनी थी। अंदर कुछ नहीं। निप्पल नाइटी से साफ उभर रहे थे। मैं उसके बगल में लेट गई। हाथ से उसकी छाती पर फेरने लगी।
“आज थके नहीं हो?” मैंने धीमे से पूछा। दिनेश ने मेरी तरफ देखा। निगाह मेरे स्तनों पर गई। फिर उसने नाइटी का पल्ला हटाया और एक स्तन को मसल दिया। “कितने भारी हो गए हैं ये,” उसने कहा।
मैंने उसका हाथ पकड़कर नीचे ले गया। उसकी पैंट के ऊपर से लंड को सहलाया। वो धीरे-धीरे तन रहा था। दिनेश ने मुझे खींचकर ऊपर चढ़ा लिया। नाइटी एक झटके में ऊपर हो गई। उसने दोनों स्तनों को मुँह में ले लिया। जोर-जोर से चूसने लगा। दाँतों से हल्का काटा। मुझे मजा आने लगा। मैंने उसकी पैंट खोली। लंड बाहर निकाला। मोटा और सख्त। हाथ से ऊपर-नीचे किया।
“ले लो मुँह में,” उसने कहा।
मैंने झुककर लंड मुँह में ले लिया। टोपा चूसा। फिर गहराई तक ले गई। दिनेश ने मेरे बाल पकड़कर हल्के धक्के देने शुरू कर दिए। गला भर रहा था लेकिन मैंने रोका नहीं। थोड़ी देर बाद उसने मुझे उलटा कर दिया। पीछे से गाँड उठाई और एक झटके में लंड मेरी चूत में डाल दिया।
“आह्ह…” मेरी कराह निकल गई।
दिनेश ने जोर-जोर से पेलना शुरू किया। उसके हाथ मेरी कमर पर थे। हर धक्के के साथ मेरे स्तन बिस्तर पर रगड़ खा रहे थे। मैं कराह रही थी। काफी दिनों बाद चुदाई हो रही थी। शरीर मजा ले रहा था। दिनेश की साँसें तेज हो गईं। वो और तेज ठोकरें मारने लगा।
“कितनी ढीली हो गई है तेरी चूत,” उसने अचानक कहा। आवाज में नाराजगी थी। “पहले कितनी टाइट थी। अब तो जैसे कुछ भी नहीं लग रहा।”
मेरा शरीर अकड़ गया। लेकिन वो रुकने वाला नहीं था। वो पेलता रहा। “बाहर की लड़कियों की चूत कितनी कसकर पकड़ती है लंड को… तेरी तो बस गरम छेद बच गई है।”
मैंने तकिया दबा लिया। आँखों में आँसू आ गए थे। दिनेश ने कुछ और जोरदार धक्के मारे और मेरे अंदर ही झड़ गया। गरम पानी की धार महसूस हुई। वो मेरे ऊपर से हटा। लंड निकालते ही वीर्य मेरी जाँघों पर बहने लगा।
वो बिस्तर के किनारे बैठ गया। साँसें लेते हुए बोला, “स्वाती, सच्ची बात बताऊँ? अब तेरी चूत में मजा नहीं आता। ढीली हो गई है। तू समझती क्यों नहीं।”
मैं चुप रही। नाइटी ठीक की। शरीर में अभी भी उत्तेजना थी, लेकिन मन भारी हो गया था। दिनेश बाथरूम चला गया। मैं अंधेरे में लेटी रही। उसकी बातें कानों में गूँज रही थीं—“ढीली हो गई है तेरी चूत… बाहर की लड़कियों की चूत कितनी कसकर पकड़ती है…”
रात भर नींद नहीं आई।
सुबह दिनेश ऑफिस चला गया। घर में अकेली थी। आईने के सामने खड़ी होकर अपने नंगे शरीर को देखा। स्तन भारी थे। कमर पतली। गाँड गोल। जाँघें मुलायम। शरीर में कोई कमी नहीं थी। फिर भी पति को अब मजा नहीं आता था। क्योंकि चूत टाइट नहीं रही।
मैंने नहाया। नाश्ता बनाया। लेकिन मन बार-बार उसी बात पर चला जाता। दिनेश की वो गंदी बातें। और सबसे ज्यादा चुभने वाली बात ये थी कि वो सही कह रहा था। शादी के पहले महीनों में मेरी चूत वाकई बहुत टाइट थी। अब उतनी नहीं रही।
दोपहर को सास का फोन आया। वो गाँव से दिल्ली आने वाली थीं। ससुर विजयराज भी साथ में। विजयराज… उम्र अट्ठावन-उनसठ की होगी। दिनेश के पिता। पहले कभी ज्यादा बात नहीं हुई थी। लेकिन जब भी आते थे तो उनकी निगाहें मुझ पर थोड़ी देर ज्यादा ठहरती थीं। मैंने कभी ध्यान नहीं दिया था।
अगले दिन सुबह सास-ससुर दिल्ली आ गए। सास सरिता की तबीयत ठीक नहीं चल रही थी। डॉक्टर को दिखाने आई थीं। ससुर विजयराज साथ में थे।
विजयराज रिटायर्ड मिलिट्री मैन हैं। उम्र अट्ठावन साल की हो गई है, लेकिन बदन अभी भी कसकर बना हुआ है। कद लंबा। कंधे चौड़े। बाजू मोटी और नसें फूली हुई। पेट हल्का सा निकला है लेकिन ढीला नहीं। चलने-फिरने में भी फौजी अनुशासन झलकता है। सफेद बालों में काले मिलाए हुए। आँखें तेज। जब बोलते हैं तो आवाज में एक गंभीर वजन रहता है।
स्वागत में मैंने नमस्ते की। विजयराज की निगाह मेरे चेहरे से सरककर गर्दन पर गई, फिर साड़ी के गड्ढे पर। बस एक पल के लिए। लेकिन वो पल मैंने नोटिस कर लिया। सास अंदर चली गईं। विजयराज ने अपना बैग रखते हुए कहा,
“तुम और भी गदरा गई हो स्वाती। दिल्ली का मौसम सूट कर रहा है लगता है।”
मैंने हल्की मुस्कान दी और रसोई की तरफ चली गई। लेकिन उनकी वो निगाह दिमाग में रह गई।
पहले दिन तो सब सामान्य रहा। सास की तकलीफ की बातें, डॉक्टर का अपॉइंटमेंट, खाना-पीना। लेकिन शाम को जब मैं कपड़े बदलने कमरे में गई तो अजीब सा माहौल महसूस हुआ। मेरी अलमारी का एक दराज थोड़ा खुला था। अंदर मेरी इस्तेमाल की हुई पैंटी पड़ी थी। मैंने करीब जाकर देखा। पैंटी थोड़ी सी खिसकी हुई लग रही थी। जैसे किसी ने उठाकर देखी हो।
मैंने पीछे मुड़कर देखा। कोई नहीं था। लेकिन दिल की धड़कन तेज हो गई।
रात को खाने पर सब टेबल पर बैठे। दिनेश भी था। विजयराज ने अचानक पूछ लिया,
“स्वाती, तुम्हें घर का काम करते हुए थकान तो नहीं होती? इतनी पतली कमर है। टूट न जाए कहीं।”
सास हँसी। दिनेश ने भी हल्के से मजाक में कहा, “पापा अब आप भी…” विजयराज मुस्कुराए। “बात तो सही है। बहू का ख्याल रखना चाहिए।”
लेकिन उनकी आँखें जब मुझसे मिलीं तो उसमें सिर्फ ख्याल वाली बात नहीं थी। कुछ और था। मैंने नजरें झुका लीं। खाने में स्वाद नहीं रहा।
अगली सुबह दिनेश का फोन आया। कंपनी की मीटिंग के लिए उसे सिंगापुर जाना पड़ रहा था। दस दिन का टूर। शाम की फ्लाइट थी। उसने जल्दी-जल्दी सामान पैक किया। जाने से पहले बोला,
“तू सास-ससुर का ध्यान रखना। और ज्यादा नखरे मत करना।”
मैंने सिर हिलाया। मन में एक अजीब खालीपन था। दिनेश के जाने के बाद घर में सिर्फ मैं, सास और ससुर रह गए।
दो दिन बाद सास की तबीयत थोड़ी बिगड़ी। दिनेश की बहन डॉक्टर है। सास को उसके घर ले जाने का फैसला हुआ। इलाज और आराम दोनों हो जाएँगे। सास ने मुझे कहा,
“तुम घर संभालना। पापा अकेले हैं। उनका ख्याल रखना।”
सास चली गईं। घर में सिर्फ मैं और विजयराज बच गए।
अगली सुबह की बात है। मैं नहाकर निकली तो देखा ससुर का कमरा खुला है। अंदर से हल्की आवाज आ रही थी। मैंने धीरे से झाँका।
विजयराज बिस्तर पर बैठे थे। मेरा एक ब्रा उनके हाथ में था। काला लेस वाला। वो उसे नाक के पास लगाए हुए गहरी साँस ले रहे थे। दूसरी हाथ से अपनी पैंट के अंदर लंड सहला रहे थे। आँखें बंद थीं। साँसें तेज।
मेरा दिल जोर से धधक उठा। मैं वहाँ से हट गई। लेकिन आँखों के सामने से वो नजारा नहीं हटा। मेरा ब्रा… उनके हाथ में… और वो लंड दबाते हुए सूंघ रहे थे।
मैं अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर बैठी। साँसें तेज चल रही थीं। दिमाग में ख्याल आ रहा था कि ससुर मेरे इस्तेमाल किए कपड़ों से हस्तमैथुन कर रहे हैं। शरीर में एक अजीब सी गर्मी फैलने लगी।
थोड़ी देर बाद जब मैं बाहर निकली तो विजयराज हॉल में अखबार पढ़ रहे थे। सामान्य। जैसे कुछ हुआ ही न हो। मैं रसोई में गई। उनकी कमीज सोफे पर पड़ी थी। पसीने वाली। मैंने खुद को रोका नहीं। कमीज उठाई और हल्के से सूंघा। पुरुष की गंध। तेज और भारी। मुझे वो गंध… पसंद आ गई।
शाम को मैंने देखा विजयराज बालकनी में थे। फर्श पर लेटकर पुशअप्स कर रहे थे। बदन पर सिर्फ बनियान और हाफ पैंट। बाजू की मांसपेशियाँ तनकर उभर आई थीं। पसीना चमक रहा था। फिर वो उठे और केगेल एक्सरसाइज करने लगे। साँस नियंत्रित रखते हुए निचले हिस्से को कसना-छोड़ना। मैं दरवाजे के पीछे खड़ी सब देखती रही। उनकी जाँघों की मांसपेशियाँ हर बार तन जातीं। पैंट में लंड का उभार साफ दिख रहा था।
मेरी चूत हल्की सी गीली हो गई।
मैं वहाँ से हटी। कमरे में जाकर आईने के सामने खड़ी हो गई। नाइटी में मेरे स्तन भारी लग रहे थे। निप्पल कड़े हो चुके थे। दिनेश की बात याद आई—“तेरी चूत ढीली हो गई है।” और सामने ससुर का वो तगड़ा बदन, वो गंध, वो हस्तमैथुन का नजारा।
रात को खाने पर हम दोनों टेबल पर बैठे। मैंने जानबूझकर थोड़ी लो नेक नाइटी पहन रखी थी। विजयराज की निगाह बार-बार मेरे गड्ढे पर जा रही थी।
उन्होंने अचानक कहा, “स्वाती, तुम बहुत संभलकर रहती हो। लेकिन कभी-कभी शरीर की जरूरतें भी होती हैं। दबाने से नहीं दबतीं।”
मैंने उनकी तरफ देखा। “आप क्या कहना चाह रहे हैं ससुर जी?” वो शांत स्वर में बोले, “जो तुम समझ रही हो। दिनेश तुम्हें नजरअंदाज करता है। ये मैं देख सकता हूँ। और तुम्हारा शरीर… अभी भी जवान है।”
मेरा गला सूख गया। मैंने जवाब नहीं दिया। लेकिन टेबल के नीचे मेरी जाँघें भींच गईं। चूत में हल्की सी धड़कन हो रही थी।
रात को अपने कमरे में लेटी तो नींद नहीं आई। बार-बार ससुर का पसीना, मेरा ब्रा उनके हाथ में, और उनकी केगेल एक्सरसाइज याद आ रही थी। उँगली से अपनी चूत छुई तो वो पूरी गीली थी।
रात के लगभग बारह बज रहे थे। घर में सन्नाटा था। मैं अपने कमरे में लेटी हुई थी। शरीर में बेचैनी इतनी बढ़ गई थी कि उँगली से बार-बार छूने पर भी मन नहीं भर रहा था। दिमाग में सिर्फ ससुर का पसीना, मेरा ब्रा उनके हाथ में, और उनकी तगड़ी बॉडी घूम रही थी।
अचानक दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई।
“स्वाती… सो गई क्या?” विजयराज की गहरी आवाज थी।
मैंने दरवाजा खोला। वो बनियान और हाफ पैंट में खड़े थे। पसीने की हल्की गंध अभी भी थी। आँखों में साफ भूख थी।
“सो नहीं पा रही,” मैंने धीमे से कहा।
वो अंदर आ गए। दरवाजा बंद किया। कुछ पल दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और अपनी पैंट पर रख दिया। पैंट के अंदर लंड पूरी तरह तना हुआ था।
“ये सुबह से इसी हालत में है,” उन्होंने कहा। “तेरे ब्रा की खुशबू से।”
मैंने हाथ से दबाया। सख्त। मैंने उनकी पैंट नीचे सरका दी। लंड बाहर निकल आया। साढ़े छह इंच लंबा। मोटा। ऊपर से नीचे तक मोटी-मोटी नसें फूली हुईं। टोपा चमक रहा था। मैंने उसे हाथ में लिया और हल्के से ऊपर-नीचे किया। विजयराज की साँस भारी हो गई।
“मुँह में ले,” उन्होंने आदेश दिया।
मैं घुटनों के बल बैठ गई। पहले जीभ से टोपा चाटा। फिर पूरा मुँह में ले लिया। नसें जीभ पर साफ महसूस हो रही थीं। मैंने गहराई तक लेना शुरू किया। गला भर गया। आँखों में आँसू आ गए लेकिन रुकी नहीं। विजयराज ने मेरे बाल पकड़कर हल्के धक्के देने शुरू कर दिए।
“हाँ… ऐसे चूस… बहू होकर ससुर का लंड चूस रही है तू…”
मैंने और जोर से चूसा। थूक बह रहा था। लंड पूरी तरह गीला हो चुका था। थोड़ी देर बाद उन्होंने मुझे उठाया और बिस्तर पर लिटा दिया। मेरी नाइटी एक झटके में ऊपर कर दी। पैंटी खींचकर फाड़ दी।
“अब मेरी बारी,” उन्होंने कहा और मेरे जाँघों के बीच मुँह डाल दिया।
उनकी जीभ सीधे मेरी चूत पर लगी। पहले पंखुड़ियाँ चाटीं। फिर क्लिट पर जोर से चूसा। मैंने बिस्तर की चादर पकड़ ली। वो जीभ अंदर तक घुसाकर चाटने लगे। कभी क्लिट चूसते, कभी नीचे तक लीक करते। मेरी कमर बार-बार उछल रही थी।
“आह्ह… ससुर जी… और… वहाँ…”
उन्होंने दो उँगलियाँ अंदर डाल दीं और जीभ से क्लिट चूसते रहे। मैं पागल हो रही थी। पानी बहने लगा।
फिर उन्होंने कहा, “ऊपर आ जा। 69 करते हैं।”
मैं उनके ऊपर उलटी लेट गई। मेरी चूत उनके मुँह पर। उनका लंड मेरे मुँह में। दोनों एक साथ एक-दूसरे को चाटने और चूसने लगे। मैं लंड को गले तक ले जा रही थी। वो मेरी चूत को चाट-चाटकर गीला कर रहे थे। कमरे में चप-चप और गंदी आवाजें गूँज रही थीं।
थोड़ी देर बाद वे रुके। मुझे नीचे उतारा। जाँघें फैलाईं। अपना नसों वाला लंड मेरी चूत पर रखा और एक जोर का धक्का मारा।
“आह्ह्ह…!”
साढ़े छह इंच का मोटा लंड एकदम अंदर तक धँस गया। विजयराज रुक गए। “देख… कितनी गरम और गीली है। दिनेश कहता है ढीली हो गई है? ये चूत तो अभी भी लंड को कसकर पकड़ रही है।”
वे धीरे-धीरे हिलने लगे। हर धक्के के साथ नसें मेरी दीवारों को रगड़ रही थीं। फिर गति तेज हो गई। वो जोर-जोर से पेलने लगे।
“क्या टाइट चूत है तेरी बहू… दिनेश पागल है जो इसे छोड़कर बाहर भटकता है… इतनी गरम… इतनी नमी… लंड को चूस रही है ये चूत…”
मैं कराह रही थी। उनके तगड़े शरीर का वजन मुझ पर था। बाजू की नसें तन रही थीं। वे मेरी टाँगें कंधों पर उठाए और और गहराई तक मारने लगे।
“बोल… किसकी चूत चुद रही है?” “ससुर जी की… आपकी… आह्ह… जोर से…” “दिनेश की बीवी होकर ससुर का लंड ले रही है… मजा आ रहा है न?” “हाँ… बहुत आ रहा है… फाड़ दो… पूरी फाड़ दो…”
वे पागलों की तरह चोदने लगे। बिस्तर चरमरा रहा था। मेरे स्तन उनके हाथों में आकर मसले जा रहे थे। निप्पल मरोड़े जा रहे थे। मैं दूसरी बार झड़ गई। चूत ने उनके लंड को जोर से जकड़ लिया। लेकिन वे रुके नहीं।
“अभी और ले… ससुर का पूरा पानी अंदर ले…”
कुछ और तेज धक्कों के बाद उनका शरीर अकड़ गया। गरम वीर्य की तेज धार मेरे अंदर छूटने लगी। एक के बाद एक। मैं महसूस कर सकती थी कि वो भर रहा है। वे कुछ देर अंदर ही रहे। फिर लंड बाहर निकाला। वीर्य मेरी जाँघों से होता हुआ बिस्तर पर गिरने लगा।
दोनों हाँफ रहे थे। विजयराज मेरे बगल में लेट गए। उन्होंने मेरे गीले बाल हटाए और कहा,
“अब से जब भी दिनेश बाहर जाएगा… ये चूत मेरे पास रहेगी। समझी?”
मैंने आँखें बंद करके सिर हिलाया। शरीर में दर्द और सुकून दोनों था। जाँघों के बीच ससुर का पानी अभी भी गर्म था।
उस रात मैंने पहली बार महसूस किया कि दिनेश ने जो कमी छोड़ी थी… ससुर ने पूरी तरह भर दी थी।
