मेरा नाम रोहित है। उम्र बाईस साल। शहर में रहता हूँ, कॉलेज करता हूँ। गर्मी की छुट्टियों में गाँव जाना लगभग मजबूरी बन चुका था। माँ-बाबूजी कह देते – “इस बार जाकर दादा-दादी से मिल आ। साल में एक बार तो जाता ही रह।” मैं मना नहीं कर पाता। इस बार भी वही हुआ। ट्रेन पकड़ी और सीधे अपने गाँव पहुँच गया।
गाँव हमारा छोटा सा है। पक्के मकान कम, ज्यादातर कच्चे या अधपक्के। खेत, तालाब, और शाम को बैठने वाली चौपाल। मैं अपने ताऊजी के घर ठहरा था। ताऊजी और ताईजी दोनों दिन भर खेत-खलिहान में व्यस्त रहते। घर में अक्सर अकेली रहतीं मेरी चाची – सुनीता चाची।
सुनीता चाची उम्र में मुझसे काफी बड़ी थीं। लगभग अड़तीस-उनतालीस की होंगी। लेकिन शरीर उनका ऐसा था कि गाँव की औरतें भी कभी-कभी हल्के स्वर में बातें करतीं। लंबी, गोरी-चिट्टी, भारी भरकम स्तन जो ब्लाउज में हमेशा तनाव पैदा करते दिखते, पतली कमर और गोल-मटोल गाँड। साड़ी पहनने का उनका अंदाज़ भी आम गाँव वाली औरतों जैसा नहीं था। पल्लू कभी-कभी इतना ढीला होता कि ब्लाउज का ऊपरी हिस्सा साफ झलक जाता। मैं पहले भी कई बार आया था, लेकिन इस बार कुछ अलग लगा। उनकी नज़रें मुझ पर थोड़ी देर ज्यादा टिकतीं।
पहले दो दिन सामान्य बीते। मैं सुबह सोकर उठता, चाची खाना लगातीं, ताऊजी खेत चले जाते, ताईजी भी किसी काम से निकल जातीं। घर में अकेलापन सा छा जाता। चाची किचन में काम करतीं या आँगन में कपड़े धोतीं। मैं मोबाइल चलाता या किताब देखने की कोशिश करता।
तीसरे दिन दोपहर की बात है।
ताऊजी और ताईजी दोनों खेत पर थे। घर में सिर्फ़ मैं और चाची। गर्मी जोरों पर थी। मैं अपने कमरे में पंखा चलाकर लेटा था कि अचानक बाहर से पानी की आवाज़ आई। आँगन में नल खुला था। मैं उठकर खिड़की से झाँका।
सुनीता चाची आँगन में खड़ी कपड़े धो रही थीं। लेकिन आज उनका ब्लाउज अलग था। बहुत पतला और गहरा लाल रंग का। पानी की छींटों से ब्लाउज पूरी तरह भीग चुका था और शरीर से चिपक गया था। उनके भारी स्तन साफ दिख रहे थे। ब्लाउज के अंदर ब्रा की रूपरेखा भी साफ थी, और निप्पल के उभरे हुए हिस्से तक नज़र आ रहे थे। साड़ी का पल्लू एक तरफ रखा था। कमर से ऊपर का पूरा ऊपरी हिस्सा पानी से चमक रहा था।
मैं खिड़की पर जमकर खड़ा रह गया। गला सूख गया। मेरा लंड तुरंत तन गया। चाची को पता था कि मैं घर में हूँ या नहीं, यह कहना मुश्किल था। लेकिन उन्होंने एक बार मेरी खिड़की की तरफ देखा। हमारी नज़रें मिलीं। वे मुस्कुराई नहीं, न ही शर्म से पल्लू संभाला। बस एक पल के लिए देखती रहीं, फिर फिर से कपड़े रगड़ने लगीं। इस बार उन्होंने थोड़ा और आगे झुककर काम किया। ब्लाउज और ज्यादा खुल गया। उनके गोल, भारी स्तन लगभग आधे बाहर आ गए थे। पानी की बूंदें उनके क्लीवेज से होती हुई नीचे सरक रही थीं।
मैंने खुद को नियंत्रित करने की कोशिश की, लेकिन आँखें हटी नहीं। चाची ने जानबूझकर अपना एक हाथ ऊपर किया और बाल पीछे किए। इस हरकत से उनके स्तन और भी उभर आए। फिर उन्होंने मेरी तरफ दोबारा देखा। इस बार उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। जैसे कह रही हों – “देख रहे हो ना? अच्छा लग रहा है?”
मेरा लंड पूरी तरह खड़ा हो चुका था। पैंट में तना हुआ। मैंने खिड़की से हटकर दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ाया। दिल जोरों से धधक रहा था। आँगन में जाकर खड़ा हो गया। चाची ने मेरी तरफ देखा और बोलीं,
“रोहित… पानी पी लोगे? गर्मी बहुत है।”
आवाज़ में सामान्यता थी, लेकिन उनकी नज़रें मेरे पैंट पर टिकी हुई थीं। जहाँ मेरा लंड साफ उभर रहा था। मैंने सिर हिलाया। “हाँ चाची…”
वे किचन की तरफ गईं। मैं पीछे-पीछे हो लिया। किचन में उन्होंने ठंडा पानी का गिलास दिया। मैं पी रहा था कि उन्होंने अचानक कहा,
“ब्लाउज पूरी तरह भीग गया। बदलना पड़ेगा।”
इतना कहकर वे मेरे सामने ही ब्लाउज के हुक खोलने लगीं। एक… दो… तीन। ब्लाउज खुल गया। उनके भारी, गोरे स्तन ब्रा में कैद थे। लेकिन ब्रा भी गीली थी और लगभग पारदर्शी। निप्पल साफ दिख रहे थे। वे ब्रा के हुक के पीछे हाथ ले गईं और खोल दिया। दोनों स्तन झूलते हुए बाहर आ गए। बड़े, गोल, भारी। निप्पल गहरे भूरे और सख्त।
मैं गिलास पकड़े बस देखता रह गया। चाची मुस्कुराईं। “क्या देख रहे हो रोहित? पहली बार स्तन देखे हैं क्या?” मेरी आवाज़ नहीं निकली। उन्होंने मेरे हाथ से गिलास लिया और एक तरफ रखा। फिर मेरा हाथ पकड़कर अपने एक स्तन पर रख दिया। “छू के देख। कितने भारी हैं।”
मेरा हाथ उनके नरम, गर्म स्तन पर था। मैंने हल्के से दबाया। चाची की साँस भारी हो गई। “और जोर से दबा… डर मत।”
मैंने दोनों हाथों से उनके स्तन मसलने शुरू कर दिए। निप्पल को उँगली से घुमाया। चाची की आँखें आधी बंद हो गईं। “आह… बहुत दिनों बाद किसी ने इतने अच्छे से दबाए हैं…”
फिर उन्होंने मेरी पैंट पर हाथ रखा। लंड को ऊपर से पकड़ लिया। “इतना तन गया है… शहर के लड़के का लंड गाँव की चाची देखकर खड़ा हो गया?” वे हँसीं। फिर मेरी पैंट का बटन खोला और जिपर नीचे किया। अंडरवियर के अंदर से मेरे लंड को बाहर निकाला। उनका हाथ गरम था। उन्होंने धीरे-धीरे ऊपर-नीचे करना शुरू किया। “बड़ा है… मोटा भी। ताऊजी का इतना नहीं है।”
इतना कहकर वे घुटनों के बल बैठ गईं और मेरे लंड को मुँह में ले लिया। गर्म, गीला मुँह। उन्होंने गहराई तक चूसा। मैं दीवार का सहारा लेकर खड़ा रहा। चाची बहुत अच्छी तरह लंड चूस रही थीं। कभी सिर तक ले जातीं, कभी सिर्फ़ अगला हिस्सा चूसतीं, कभी जीभ से नीचे तक चाटतीं। उनकी दोनों हाथों से मेरे अंडकोष सहलाए जा रहे थे।
“चाची… अह्ह…” वे लंड मुँह से निकालकर बोलीं, “चुप रहो और मज़ा लो। आज चाची तुम्हें पूरा निचोड़ेंगी।”
थोड़ी देर और चूसने के बाद वे उठीं। मेरा हाथ पकड़कर अपने कमरे में ले गईं। कमरे में खटिया बिछी थी। उन्होंने साड़ी और पेटीकोट दोनों एक साथ नीचे गिरा दिए। अब वे सिर्फ़ नंगी थीं। भारी स्तन, थोड़ी सी चर्बी वाली कमर, और घनी काली चूत। उन्होंने खुद खटिया पर लेटकर टाँगें फैला दीं। “आओ रोहित। चाची की चूत चोदो।”
मैं उनके ऊपर चढ़ गया। लंड को उनकी चूत पर रगड़ा। वे पहले से बहुत गीली थीं। एक धक्के में आधी लंड अंदर चली गई। चाची ने जोर से कराह निकाली। “आह्ह… पूरा डाल… धीरे-धीरे मत…”
मैंने पूरा लंड अंदर तक धकेल दिया। उनकी चूत गर्म और टाइट थी। मैंने हिलेगा शुरू किया। पहले धीमे, फिर तेज़। खटिया चरमराने लगी। चाची के स्तन मेरे चेहरे पर उछल रहे थे। मैंने एक निप्पल मुँह में ले लिया और जोर से चूसा। वे मेरे बाल पकड़कर अपनी तरफ खींच रही थीं।
“जोर से चोदो… चाची को जोर से चोदो… ताऊजी तो ऐसे नहीं चोदते…” “कैसे चोदते हैं ताऊजी?” “हल्के-हल्के… दस मिनट में थक जाते हैं। तू मत थकना… आज खूब चोदना…”
मैंने उनकी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रख लीं। अब और गहराई तक जा रहा था। हर धक्के पर उनकी गाँड खटिया से उठती। चूत की आवाज़ आने लगी – चप-चप-चप। चाची गालियाँ भी निकालने लगीं। “साले… कितना मोटा लंड है तेरा… मेरी चूत फाड़ रहा है… और जोर से… फाड़ दे चाची की चूत…”
मैंने रफ्तार और बढ़ा दी। पसीना दोनों के शरीर पर चमक रहा था। चाची एक बार जोर से काँपीं और झड़ गईं। उनकी चूत मेरे लंड को कसकर सिकुड़ गई। मैंने रुककर नहीं, और तेज़ चोदना जारी रखा। थोड़ी देर बाद मैंने भी जोरदार धक्कों के साथ उनके अंदर ही झड़ दिया। गर्म पानी की धार उनके अंदर फूट रही थी। मैं उनके ऊपर गिरा रहा।
दोनों की साँसें तेज़ चल रही थीं। चाची मेरे बाल सहलाते हुए बोलीं, “बहुत दिनों बाद इतना अच्छा चोदा गया हूँ रोहित… तू शहर से आया है तो सही… लंड तो गाँव वालों जैसा मज़बूत है।”
मैंने उनका चेहरा देखा। पसीने से चमक रहा था। आँखों में संतुष्टि थी। “चाची… ताऊजी अगर आ गए तो…” वे हँसीं। “अभी दो घंटे हैं। खेत से इतनी जल्दी नहीं लौटते। और आज तो मैंने तुझे सिर्फ़ चखाया है। शाम को जब सब सो जाएँ… तब असली मज़ा लेना।”
उन्होंने मुझे अपने ऊपर से हटाया और उलटे लेट गईं। गाँड ऊपर की तरफ उठाई। दोनों हाथों से अपने गाँड के लोथों को फैलाया। “अब यहाँ भी डाल। धीरे से। दर्द होगा लेकिन सह लूँगी।”
मैंने लंड पर उनकी चूत का पानी लगाया और गाँड की सेंध पर टिकाया। धीरे-धीरे धक्का दिया। बहुत टाइट था। चाची ने तकिया दबा लिया। आधी लंड जाने पर वे बोलीं, “रुक… थोड़ा रुक…” फिर खुद पीछे की तरफ धक्का दिया। धीरे-धीरे पूरी लंड उनकी गाँड में समा गई। मैंने धीमे धक्के शुरू किए।
“आह्ह… साले… गाँड फट रही है… लेकिन मत निकाल… चोदते रह…”
मैंने धीरे-धीरे रफ्तार बढ़ाई। उनकी गाँड मेरे लंड को कस रही थी। थोड़ी देर बाद वे फिर से कराहने लगीं। मैंने एक हाथ आगे करके उनकी चूत में उँगली डाल दी। दोनों जगह एक साथ। चाची पागल हो रही थीं। “रोहित… आज तुमने चाची को पूरी तरह चोद दिया… अब रोज़ चोदना… ताऊजी के रहते हुए भी…”
मैं उनकी गाँड में ही दूसरी बार झड़ गया। जब लंड निकाली तो सफेद पानी बाहर निकल रहा था। चाची खटिया पर गिरी रहीं। शरीर ढीला पड़ गया था।
थोड़ी देर बाद वे उठीं और साड़ी लपेट ली। ब्लाउज नहीं पहना। सिर्फ़ साड़ी। स्तन खुले हुए थे। उन्होंने मेरा चेहरा पकड़कर कहा,
“आज रात को मेरे कमरे में आना। ताऊजी के सो जाने के बाद। और हाँ… अगली बार अपने दोस्त को भी लेकर आना शहर से। चाची अकेली एक लंड से नहीं भरती।”
मैं हैरान रह गया। वे मुस्कुराईं और किचन की तरफ चली गईं। जैसे कुछ हुआ ही न हो।
मैं अपने कमरे में आकर लेट गया। शरीर में अभी भी उनके स्तन, उनकी चूत और उनकी गाँड का अहसास बाकी था। लंड दोबारा तन गई थी।
शाम को ताऊजी और ताईजी लौटे। खाना लगा। सामान्य बातें हुईं। चाची बिल्कुल सामान्य व्यवहार कर रही थीं। लेकिन जब मेरी नज़र उन पर पड़ती तो वे हल्के से मुस्कुरा देतीं। एक बार खाना लगाते समय उन्होंने जानबूझकर मेरे सामने झुककर स्तन और दिखाए।
रात को सब सो गए। घर में सन्नाटा छा गया। मैं लगभग बारह बजे तक इंतज़ार करता रहा। फिर चुपके से उठा और चाची के कमरे की तरफ बढ़ा। दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर अंधेरा था। मैंने धीरे से धक्का दिया।
चाची खटिया पर नंगी लेटी थीं। टाँगें फैली हुईं। चूत साफ दिख रही थी। उन्होंने मेरी तरफ देखा और बोलीं,
“आ गए… देर कर दी। चाची इंतज़ार में भीग रही थी।”
उन्होंने मुझे खटिया पर खींच लिया। इस बार कोई धीरज नहीं था। उन्होंने खुद मेरे लंड को मुँह में लिया और जोर-जोर से चूसा। फिर अपने ऊपर बैठा लिया और खुद चूत में लंड डाल ली। तेज़-तेज़ हिलेगा करने लगीं। उनके भारी स्तन मेरे चेहरे पर बार-बार लग रहे थे। मैंने दोनों को मुँह में लेकर चूसा।
“आज रात भर चोदना है रोहित… सुबह तक… ताऊजी को कुछ नहीं पता चलना चाहिए…”
मैंने उन्हें पलटा और पीछे से चोदना शुरू किया। कभी चूत में, कभी गाँड में। चाची मुँह दबाए कराह रही थीं। गालियाँ निकाल रही थीं। “साले शहर के लड़के… गाँव की चाची को फाड़ रहे हो… और फाड़ो… पूरी रात फाड़ो…”
हमने उस रात तीन बार किया। आखिरी बार जब मैं उनकी गाँड में झड़ रहा था तो उन्होंने मेरे बाल पकड़कर कहा,
“पार्ट 2 में और मज़े लेंगे। अगली बार जब शहर से आना… तो तैयार रहना। चाची तुम्हें अकेला नहीं छोड़ने वाली।”
मैं उनके बगल में गिरा रहा। शरीर थक चुका था। चाची मेरी छाती पर हाथ रखे हुए थीं। बाहर मुर्गे की आवाज़ आने वाली थी।
गाँव की इस गर्मी ने मुझे पहले कभी इतना गरम नहीं किया था। सुनीता चाची ने कर दिया था।
और यह तो सिर्फ़ शुरुआत थी।
