गाँव की चाची पार्ट 2: खेत में जबरदस्ती लंड निकाला और चोदने पर मजबूर कर दिया

पार्ट 1 वाली रात के बाद मेरा शरीर पूरी तरह टूटा हुआ था। सुनीता चाची ने मुझे खटिया पर चूत और गाँड दोनों में इतना चोदा था कि सुबह उठते ही कमर में दर्द हो रहा था। लंड पर हल्की जलन भी थी। मैंने सोचा था कि अब दो-तीन दिन तो शांति रहेगी। चाची भी शायद संतुष्ट हो गई होंगी। लेकिन मैंने गाँव की इस औरत को कम आँका था।

सुबह ताऊजी बहुत जल्दी खेत चले गए। ताईजी भी किसी रिश्तेदार के घर चली गईं। घर में फिर से सिर्फ़ मैं और चाची रह गए। मैं अभी अपने कमरे में लेटा हुआ था, आँखें बंद किए हुए, कि दरवाज़े पर दस्तक हुई। चाची अंदर आ गईं। साड़ी पहने थीं, लेकिन ब्लाउज के ऊपर के दो हुक खुले हुए थे। उनके भारी स्तन का ऊपरी गोल हिस्सा साफ दिख रहा था। बाल खुले थे और माथे पर हल्का पसीना चमक रहा था।

“उठ रोहित। आज मेरे साथ खेत चलना पड़ेगा। ताऊजी ने कुछ दवा और नाश्ता भेजने को कहा है। अकेले नहीं जा सकती।”

मैंने आँखें खोलीं। “चाची… अभी शरीर में जान नहीं है। कल रात बहुत हो गया था।” वे खटिया के किनारे बैठ गईं और मेरे बालों में हाथ फेरते हुए बोलीं, “कल रात तो सिर्फ़ शुरुआत थी। आज खेत की खुली हवा में चोदने का मन कर रहा है। चल, उठ।”

उनकी आवाज़ में मिठास थी, लेकिन नीचे जिद भी छुपी थी। मैंने मना करने की कोशिश की, लेकिन वे मेरा हाथ पकड़कर खींचने लगीं। आखिरकार मुझे उठना पड़ा। नहाया, कपड़े पहने और उनके पीछे-पीछे चल दिया।

खेत गाँव से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर था। रास्ता कच्चा और सुनसान। दोनों तरफ हरे खेत और दूर-दूर तक कोई मकान नहीं। सूरज ऊपर चढ़ रहा था और गर्मी बढ़ने लगी थी। चाची आगे-आगे चल रही थीं। उनकी साड़ी का पल्लू हवा में उड़ रहा था। गाँड का गोल उभार हर कदम के साथ हिल रहा था। मैं पीछे से देखे जा रहा था। लंड हल्की-हल्की तनने लगी थी, लेकिन शरीर की थकान अभी भी भारी थी। मन में आवाज़ आ रही थी – “आज मत। बिल्कुल मत।” लेकिन आँखें उनकी गाँड से हट नहीं रही थीं।

आधे रास्ते पर चाची ने अचानक रुककर मेरी तरफ देखा। “क्या देख रहे हो रोहित? मेरी गाँड?” मैंने नज़रें हटा लीं। “नहीं चाची… ऐसे ही।” वे हँसीं। “झूठ मत बोल। तन तो गई होगी। दिखा।” मैंने कुछ नहीं कहा। वे पास आईं और मेरी पैंट के ऊपर हाथ रख दिया। लंड आधी तनी हुई थी। उन्होंने हल्के से दबाया। “देख, शरीर थका है लेकिन लंड तैयार है। शहर के लड़के का शरीर झूठ नहीं बोलता।”

फिर वे फिर से चलने लगीं। जैसे कुछ हुआ ही न हो।

खेत में पहुँचकर उन्होंने एक बड़े पेड़ के नीचे झोला रखा। आसपास बहुत दूर तक कोई नहीं दिख रहा था। सिर्फ़ हवा के झोंके और चिड़ियों की आवाज़। चाची ने साड़ी का पल्लू गिरा दिया और ब्लाउज के बाकी हुक खोलने लगीं। एक-एक करके। ब्लाउज खुला तो उनके भारी, गोरे स्तन धूप में चमकने लगे। निप्पल पहले से सख्त थे। उन्होंने ब्रा भी उतार दी। अब पूरी तरह ऊपर से नंगी खड़ी थीं।

“चाची… यहाँ मत… कोई आ सकता है।” मेरी आवाज़ में घबराहट थी। शरीर थका था, मन भी पूरी तरह तैयार नहीं था। वे मेरी तरफ आकर खड़ी हो गईं। उनके स्तन मेरे चेहरे के बिल्कुल सामने थे। “कोई नहीं आएगा। ताऊजी दूसरे खेत में हैं। यहाँ कम से कम एक घंटा सन्नाटा रहता है। और मुझे अभी चोदना है रोहित। कल रात वाली प्यास पूरी नहीं हुई।”

उन्होंने मेरी पैंट का बटन खोला। मैंने उनका हाथ पकड़ लिया। “चाची सच में मन नहीं है। थकान बहुत है। लंड भी पूरी तरह खड़ी नहीं हो रही।” वे मेरी आँखों में देखकर बोलीं, “तो चाची खड़ी कर देंगी। तू खड़ा रह।”

इतना कहकर वे घुटनों के बल बैठ गईं और मेरी पैंट व अंडरवियर एक साथ नीचे खींच दीं। लंड बाहर निकल आई – आधी तनी हुई, थोड़ी ढीली। चाची ने उसे दोनों हाथों में पकड़ लिया और मुँह में ले लिया। गर्म, गीला और गहरे तक। उन्होंने जोर-जोर से चूसना शुरू किया। कभी पूरा अंदर ले जातीं, कभी सिर्फ़ अग्रभाग को जीभ से घुमातीं, कभी अंडकोष मुँह में लेकर चूसतीं। उनकी लार लंड पर बह रही थी। मैं खड़ा रहा। हाथ उनके सिर पर थे, लेकिन उन्हें रोकने की बजाय दबा रहा था।

थकान के बावजूद लंड उनकी जीभ की वजह से पूरी तरह तन गई। मोटी और सख्त। चाची ने लंड मुँह से निकाली और बोलीं, “अब खड़ी हो गई न? मुँह से मत बोल कि मन नहीं है। यह बता रहा है कि मन है।”

फिर उन्होंने मुझे पेड़ के नीचे जमीन पर धक्का देकर लिटा दिया। सूखी घास और मिट्टी शरीर के नीचे चुभ रही थी। चाची मेरे ऊपर सवार हो गईं। साड़ी कमर तक ऊपर कर ली। उनकी चूत मेरे लंड पर रगड़ने लगी। वे बहुत गीली थीं। पानी की गर्मी महसूस हो रही थी। “तू थका है तो लेटा रह। चाची खुद कर लेगी।”

उन्होंने लंड को सही जगह पर लगाया और एक झटके में बैठ गईं। पूरी लंड उनकी चूत में समा गई। उन्होंने जोर से कराह निकाली। फिर कमर हिलेगा करने लगीं – ऊपर-नीचे, गोल-गोल, आगे-पीछे। उनके भारी स्तन मेरे चेहरे के ऊपर उछल-उछल कर लग रहे थे। मैंने दोनों हाथों से स्तन पकड़ लिए और मसलने लगा। निप्पल को उँगली से दबाया। चाची की साँसें तेज़ हो गईं।

“आह्ह… कितना गहरा जा रहा है… कल रात से भी गहरा… जोर से दबा रोहित… चाची के स्तन जोर से मसल…”

वे खुद ही रफ्तार बढ़ाती जा रही थीं। उनकी चूत से पानी की आवाज़ साफ आ रही थी। कभी-कभी वे आगे झुककर मेरे मुँह पर अपना स्तन रख देतीं और कहतीं, “चूस… जोर से चूस।” मैं चूस लेता। वे और पागल होतीं। थोड़ी देर बाद वे जोर से काँपीं और झड़ गईं। उनकी चूत मेरे लंड को कसकर सिकुड़ गई। पानी मेरे पेट पर गिरने लगा। वे मेरे ऊपर गिरी रहीं। पसीने से तरबतर।

मैंने धीरे से कहा, “चाची… अब काफी है। चलो घर चलते हैं।” वे सिर उठाकर मेरी तरफ देखा। आँखों में अभी भी भूख थी। “काफी? तूने अभी तक नहीं झड़ा। खड़ा हो। अब तू चोद।”

मैंने विरोध किया। “शरीर में जान नहीं बची। सच में थक गया हूँ।” चाची गुस्से में बोलीं, “थक गया है तो भी चोद। चाची का मन हो रहा है। खड़ा हो।”

उन्होंने मुझे खींचकर खड़ा किया। खुद चारों तरफ घूमकर कुत्ते की पोजीशन में आ गईं। दोनों हाथ जमीन पर रखे, गाँड ऊपर की तरफ उठाई। साड़ी कमर तक लपटी हुई थी। उनकी चूत और गाँड दोनों धूप में चमक रहे थे। पीछे से देखकर लंड और सख्त हो गई। “डाल अंदर। और जोर से। आज खेत में ही निचोड़ना है।”

मैंने पीछे से लंड उनकी चूत में डाली। एक धक्के में पूरी। चाची ने जोर से आवाज़ निकाली। मैंने हिलेगा शुरू किया। शरीर थका था, लेकिन उनकी गालियाँ और कराहें सुनकर रफ्तार अपने आप बढ़ रही थी। “जोर से… और जोर से चोद… चाची की चूत फाड़ दे… ताऊजी के खेत में चोद रहा है तू… अह्ह…”

मैंने उनकी गाँड पर जोर-जोर से थप्पड़ मारे। वे और पीछे की तरफ धक्के देने लगीं। थोड़ी देर बाद मैंने लंड निकालकर गाँड की सेंध पर लगा दी। “यहाँ भी डाल। जबरदस्ती ही सही।”

चाची ने खुद दोनों हाथों से अपनी गाँड के लोथ फैलाए। “डाल… दर्द सह लूँगी… पूरा डाल दे…”

मैंने धीरे-धीरे गाँड में लंड धकेली। बहुत टाइट था। चाची ने दाँत भींच लिए और तकिया की जगह अपनी बाँह में मुँह दबा लिया। आधी लंड जाने पर वे बोलीं, “पूरा डाल… मत रुक… चाची सह लेगी…” मैंने पूरा डाल दिया। फिर धीमे लेकिन भारी धक्के लगाने लगा। उनकी गाँड मेरे लंड को कसकर पकड़े हुए थी। धीरे-धीरे रफ्तार बढ़ाई। एक हाथ से उनके बाल पकड़े, दूसरे से उनकी चूत में दो उँगलियाँ डाल दीं। दोनों जगह एक साथ। चाची लगभग चीख रही थीं।

“आह्ह… साले… गाँड फट रही है… लेकिन चोदते रह… खेत में चाची की गाँड चोद… कोई सुन नहीं रहा… और जोर से…”

मैं थक चुका था, लेकिन रुक नहीं पा रहा था। उनकी आवाज़ें, उनकी गालियाँ, उनकी भीगी हुई चूत और टाइट गाँड – सब कुछ मिलाकर लंड और सख्त होती जा रही थी। थोड़ी देर और चोदने के बाद मैंने गाँड में ही जोरदार धक्कों के साथ झड़ दिया। गर्म पानी की तेज़ धार उनके अंदर गई। मैं पीछे हट गया। चाची जमीन पर गिर गईं। उनकी गाँड से सफेद पानी रिस रहा था और जाँघों पर बह रहा था। वे करवट लेकर लेटी रहीं। स्तन धूप में चमक रहे थे। साँसें तेज़ चल रही थीं।

मैं थककर पेड़ के नीचे बैठ गया। शरीर में कोई ताकत नहीं बची थी। लंड अभी भी हल्की-हल्की तनी हुई थी लेकिन कमजोर। चाची थोड़ी देर बाद उठीं। साड़ी ठीक की, ब्लाउज पहना लेकिन हुक पूरे बंद नहीं किए। वे मेरे पास आकर बैठ गईं और मेरे लंड को हाथ में ले लिया। धीरे-धीरे सहलाने लगीं। “देख, अभी भी हल्का तना हुआ है। शाम को घर में फिर से चोदना पड़ेगा। आज तो खेत वाली प्यास ही बुझाई है।”

मैंने उनकी तरफ देखा। पसीने से तरबतर चेहरा, बिखरे बाल, और आँखों में संतुष्टि। “चाची… तुम कभी थकती नहीं हो क्या?” वे हँसीं। “गाँव की औरतें सिर्फ़ खेत नहीं जोततीं रोहित। कभी-कभी शहर के लंड भी जोत लेती हैं। तू थकता रहेगा, चाची नहीं थकने वाली। जब तक तू गाँव में है, रोज़ चोदना है। चाहे तेरा मन हो या न हो।”

उन्होंने झोले से पानी की बोतल निकाली। दोनों ने पीया। फिर कपड़े ठीक किए। खेत का सामान रखा और वापस घर की तरफ चल दिए। रास्ते में चाची बिल्कुल सामान्य बातें करने लगीं – फसल कैसी है, ताऊजी का मूड, अगली बारिश कब होगी। जैसे अभी कुछ हुआ ही न हो। लेकिन मेरे शरीर पर अभी भी उनकी चूत और गाँड का अहसास बाकी था। पैंट में हल्की गीलापन थी और कमर में दर्द।

घर पहुँचते ही ताईजी भी लौट आईं। सामान्य दिन शुरू हो गया। खाना, बातें, शाम की चाय। लेकिन जब सब खाना खा रहे थे, तो चाची ने मेरी तरफ देखकर आँख मार दी। फिर धीरे से, ताकि कोई न सुने, बोलीं,

“रात को ताऊजी जल्दी सो जाएँगे। तू जागता रहना। आज खेत में अधूरा रह गया है।”

मैंने सिर झुका लिया। दिल जोरों से धधक रहा था। शरीर थका था, लंड दुख रही थी, लेकिन उनके शब्दों से फिर से हल्की सनसनाहट होने लगी थी।

गाँव की इस चाची ने मुझे पूरी तरह अपने काबू में ले लिया था। खेत में जबरदस्ती लंड निकाला था। थके हुए शरीर के बावजूद चोद लिया था। और अब रात को फिर से बुला रही थीं।

मैं समझ गया था – जब तक मैं इस गाँव में हूँ, सुनीता चाची मुझे चैन से सोने नहीं देंगी। चाहे मेरा मन हो या न हो… चाची का मन हर वक्त एक ही चीज़ का रहता है। चोदने का।

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