उस रात के बाद मैंने लगभग दो घंटे तक बाथरूम में पानी की धार के नीचे खड़ी रहकर शरीर धोया। गाँड से विकास का पानी अभी भी रिस रहा था। हर बार जब उँगली पीछे ले जाकर सेंध को छूती, तो एक अजीब सा सिहरन सा शरीर में दौड़ जाता। मैंने खुद से कई बार कहा – “ये गलती थी। बस एक बार की बात थी।” लेकिन दिमाग के किसी कोने में एक आवाज़ हँस रही थी – “एक बार? तू जानती है ये एक बार नहीं रहने वाली।”
आकाश रात के लगभग साढ़े नौ बजे घर आए। मैंने सामान्य सा चेहरा बना लिया था। खाना परोसा, मुस्कुराई, उनकी थकान के बारे में पूछा। वो थके हुए थे। खाना खाकर सीधे बिस्तर पर लेट गए। मैं भी उनके पास लेट गई। कुछ देर बाद उनका हाथ मेरे स्तन पर आ गया। वो मुझे चाहते थे।
मैंने साड़ी खोल दी। आकाश ने जैसे रोज़ करते हैं, वैसे ही प्यार से मेरे स्तन चूसे, धीरे-धीरे चूत में उँगली की, फिर अपनी लंड निकालकर अंदर डाल दी। उनकी लंड… आज और भी छोटी लग रही थी। विकास की मोटी, नसों वाली लंड के बाद ये ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कोई बच्चों का खिलौना अंदर-बाहर हो रहा हो। आकाश दस मिनट में ह Hapँफते हुए झड़ गए। मुझे गले लगाकर बोले – “गरिमा, तुम मेरी जान हो।”
मैंने उनके बाल सहलाते हुए कहा – “मैं भी तुमसे प्यार करती हूँ।” और अंदर ही अंदर विकास की गाँड में झड़ी हुई गरमाहट याद कर रही थी।
अगले तीन दिन मैंने विकास से बचने की कोशिश की। लिफ्ट में देखते ही दूसरी मंज़िल का बटन दबा देती, बालकनी में कम जाती, दरवाज़े की घंटी बजने पर पहले आँख से देखती। लेकिन शरीर नहीं मान रहा था। रात को सोते समय बार-बार वही सीन याद आ जाता – उसकी मोटी लंड जब पहली बार मेरी गाँड में घुसी थी, वो दर्द, वो भर जाना, वो गालियाँ। चूत अपने-आप गीली हो जाती।
चौथे दिन दोपहर को दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैंने आँख से देखा – विकास खड़ा था। हाथ में एक छोटा सा थैला। दिल ज़ोर से धड़का। मैंने दरवाज़ा खोला।
“क्या बात है?” मेरी आवाज़ में नाराज़गी थी, लेकिन शरीर में उत्तेजना।
वो अंदर आ गया और दरवाज़ा खुद बंद कर दिया। “तीन दिन से छुप रही हो गरिमा। क्यों?”
“गलती हो गई थी उस दिन। अब मत आया करो।”
विकास हँसा। वो हँसी अच्छी नहीं लग रही थी। उसने थैला टेबल पर रखा और पास आकर मेरी ठुड्डी पकड़ ली। “गलती? तूने खुद दरवाज़े का कुंदा लगाया था। खुद घुटनों पर बैठकर मेरी लंड चूसी थी। और जब मैंने गाँड मारी तो ‘अंदर झेड़’ चिल्ला रही थी। अब अचानक गलती?”
मैंने उसका हाथ हटाने की कोशिश की, लेकिन उसने और कस लिया। “सुन गरिमा… मैं तेरे पति से बात कर सकता हूँ। या तेरी सास को फोन कर सकता हूँ। लेकिन मैं वैसा नहीं करना चाहता। मैं सिर्फ़ तुझे फिर से चोदना चाहता हूँ।”
धमकी साफ थी। और अजीब बात ये थी कि डर के साथ-साथ मेरी चूत और गीली हो गई थी। खतरनाक वाला मज़ा।
मैंने आँखें नीचे कर लीं। “आज नहीं… आकाश कोई भी समय आ सकते हैं।”
“आकाश चार बजे से पहले नहीं आते। मुझे पता है।” उसने मेरी साड़ी का पल्लू खींच लिया। “आज मैं तेरी चूत नहीं, सिर्फ़ गाँड लूँगा। और तू बिना एक शब्द निकाले सहेगी। समझी?”
मैं कुछ बोल पाती उससे पहले उसने मुझे पलटा और दीवार से लगा दिया। साड़ी ऊपर की, पेटीकोट और पैंटी एक झटके में घुटनों तक खींच दी। ठंडी हवा ने मेरी नंगी गाँड को छुआ। विकास ने थूक लगाकर अपनी लंड गीली की और बिना किसी प्रस्तावना के सीधे गाँड की सेंध पर लगा दी।
“आह्ह… धीरे…” मैंने कहा।
“चुप।” उसने मेरे बाल पकड़ लिए और एक जोर का धक्का मारा। आधी लंड अंदर चली गई। दर्द से आँखें बंद हो गईं। उसने दूसरा धक्का मारा – पूरी लंड गाँड में समा गई।
“अब बता… अच्छी लग रही है न तेरी गाँड में मेरी लंड?”
मैंने दाँत भींचकर कहा – “हाँ… लग रही है…”
वो पीछे से तेज़-तेज़ चोदने लगा। हर धक्के के साथ मेरी गाँड की मांसपेशियाँ फैल रही थीं। उसने एक हाथ आगे बढ़ाकर मेरी चूत में उँगली डाल दी और हग के दाने को तेजी से रगड़ने लगा। दर्द और मज़े का मिश्रण पागल कर रहा था।
“रंडी… आकाश की बीवी… दिन-दहाड़े अपनी गाँड मरवा रही है… कैसी लग रही है?” “बहुत… बहुत जोर से मर… फाड़ दे…”
गालियाँ खुद निकल रही थीं। विकास और बेकाबू हो गया। उसने मेरी दोनों बाँहें पीछे कर दीं और बालों से पकड़कर और तेज़ गाँड मारने लगा। दीवार से मेरे स्तन रगड़ खा रहे थे। अचानक उसने लंड बाहर निकाली, मुझे घुमाया और मुँह के अंदर ठूंस दी।
“चूस… अपनी गाँड का स्वाद चूस।”
मैंने आँखें बंद करके उसकी लंड चूसी जिसमें मेरी ही गाँड की गंध थी। उसने फिर से पीछे घुमाया और गाँड में डालकर आखिरी जोरदार धक्कों के साथ अंदर ही झड़ गया। गर्म पानी फिर से गाँड भर गया।
वो लंड निकालकर पेंट पहनने लगा। “अगली बार जब बुलाऊँ, तो तैयार रहना। और हाँ… अगली बार तेरी चूत में भी दूंगा, गाँड में भी। दोनों एक साथ।”
मैं दीवार से लगकर बैठी रही। गाँड से उसका पानी टपक रहा था। डर था, शर्म थी, और उसके नीचे एक गहरी भूख भी थी जो और बढ़ गई थी।
उसके अगले दिन आकाश ने घर पर डिनर पार्टी रखी। उनके ऑफिस के दोस्त आने वाले थे। मैंने खाना बनाया, घर सजाया। मेहमानों में एक नया चेहरा भी था – करण। आकाश का नया प्रोजेक्ट पार्टनर। उम्र करीब बत्तीस-तैंतीस, स्मार्ट, हल्की सी दाढ़ी, तेज़ आँखें। जब आकाश ने मेरा परिचय करवाया तो करण ने हाथ मिलाते समय मेरी आँखों में थोड़ी देर तक देखा। बस इतना सा। लेकिन उस एक नज़र में कुछ ऐसा था जो विकास वाली नज़र से अलग था – ज्यादा शांत, ज्यादा पढ़ने वाली।
रात भर मैंने नोटिस किया कि करण की नज़रें बार-बार मुझ पर आ रही थीं। जब मैं पानी देने जाती, जब मैं हँसती, जब मैं आकाश के कंधे पर हाथ रखती। हर बार वो देखता और मुस्कुरा देता। खाने के बाद जब सब बालकनी में सिगरेट पीने गए, करण थोड़ी देर बाद किचन में आ गया। मैं बर्तन समेट रही थी।
“बढ़िया खाना बनाया है आपने,” उसने कहा। “शुक्रिया।” वो पास आकर खड़ा हो गया। “आकाश बहुत किस्मत वाला है। ऐसी पत्नी घर पर हो तो ऑफिस का तनाव भी कम लगने लगता होगा।”
मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया, लेकिन अंदर कुछ हिल गया। विकास वाली धमकी और जबरदस्ती के बाद करण का ये शांत अंदाज़ अलग लग रहा था। खतरनाक भी, लेकिन अलग तरह से।
रात को सब जाने के बाद आकाश ने कहा – “करण अच्छा लड़का है। आगे चलकर शायद बिजनेस में साथ काम करें।” मैंने सिर हिलाया और बिस्तर पर लेट गई। आँखें बंद करके दो चेहरे याद आ रहे थे – एक विकास का, जिसने आज मेरी गाँड फुदकवाई थी, और एक करण का, जिसकी नज़रों में कुछ और था।
मुझे पता था कि ये कहानी अब सिर्फ़ विकास तक सीमित नहीं रहने वाली। शरीर और भूख दोनों बढ़ रहे थे। और मैं… मैं रुकने वाली नहीं थी।

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