गरिमा भाभी पार्ट 3: दो मर्दों के बीच फँसी हुई भूख

पिछले पार्ट में विकास ने धमकी देकर मेरी गाँड मारी थी और उसी रात करण नाम के एक नए मर्द ने अपनी शांत लेकिन गहरी नज़रों से मुझे उलट-पुलट कर दिया था।


विकास के जाने के बाद मैं लगभग पैंतालीस मिनट तक बाथरूम में बैठी रही। गाँड में अभी भी उसकी लंड का अहसास बाकी था। पानी की धार से साफ करने की कोशिश की, लेकिन वो गंदगी अंदर तक बैठ चुकी थी। शरीर साफ हो गया था, मन नहीं। डर था। अगर विकास सच में आकाश से कुछ कह दे तो? लेकिन डर के नीचे एक और भावना भी थी – उत्तेजना। उस धमकी भरी चुदाई में एक अलग ही मज़ा था। जैसे कोई मुझे जबरदस्ती अपने काबू में ले रहा हो।

रात को आकाश जब सो रहे थे, मैंने उनका हाथ पकड़ रखा था। उनके सोने की साँसें सुनते हुए मैं खुद से सवाल कर रही थी – “मैं क्या बनती जा रही हूँ?” जवाब नहीं मिला। सिर्फ़ शरीर की भूख और बढ़ती जा रही थी।

अगले दो दिन शांति से बीते। विकास ने न तो फोन किया, न ही सामने आया। लेकिन मुझे पता था कि वो बस मौके का इंतज़ार कर रहा है। तीसरे दिन सुबह आकाश ने बताया कि करण आज शाम को घर आएगा। कुछ प्रोजेक्ट के कागज़ात पर चर्चा करनी है। “तू चाय-नाश्ता बना देना गरिमा। करण अच्छा लड़का है, थोड़ी देर रुकेगा।”

मैंने सिर हिला दिया। लेकिन अंदर कुछ और ही चल रहा था। करण की वो नज़रें याद आ गईं। विकास जैसी भुखी और जबरदस्ती वाली नहीं। बल्कि धीमी, पढ़ने वाली, जैसे वो अंदर तक देख रहे हों।

शाम को करण आए। सलेटी रंग की शर्ट, काली पैंट, हाथ में लैपटॉप बैग। आकाश के साथ बैठकर काम करने लगे। मैंने चाय बनाई, समोसे निकाले। जब मैं ट्रे लेकर गई तो करण ने सिर उठाकर देखा और मुस्कुराया।

“बहुत मेहनत कर दी आपने,” उसने कहा। आकाश बोले – “मेरी पत्नी है ही ऐसी। सब कुछ परफेक्ट रखती है।” करण की नज़रें एक पल के लिए मेरे चेहरे पर ठहर गईं। “नज़र आ रहा है।”

मैंने मुस्कुराकर ट्रे रख दी और किचन में वापस चली गई। लेकिन दिल की धड़कन तेज़ हो चुकी थी।

लगभग पौन घंटे बाद आकाश का फोन बजा। ऑफिस से कोई जरूरी कॉल थी। वो बालकनी में बात करने चले गए। करण अकेला बैठकर लैपटॉप देख रहा था। मैं पानी का जग लेकर गई। जग रखते समय मेरा हाथ उसके हाथ से छू गया। दोनों एक पल के लिए रुक गए।

करण ने धीरे से कहा – “आप बहुत खामोश रहती हैं गरिमा जी।” मैंने जवाब दिया – “आदत है।” “आदत अच्छी है। लेकिन कभी-कभी खामोशी के अंदर बहुत कुछ छिपा होता है।”

मैंने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में कोई हड़बड़ी नहीं थी। बस एक शांत जिज्ञासा। विकास की धमकी के बाद ये शांति और भी खतरनाक लग रही थी। क्योंकि ये शांति मुझे अपनी तरफ खींच रही थी।

आकाश की कॉल लंबी खिंच गई। करण ने लैपटॉप बंद किया और थोड़ा आगे बढ़कर बोला – “अगर मैं बहुत ज्यादती कर रहा हूँ तो रोक देना। लेकिन उस दिन डिनर पर जब आप हँस रही थीं, तो लगा जैसे आप बहुत कुछ छुपा रही हैं।”

मेरा गला सूख गया। “आपको ऐसा क्यों लगा?” “ क्योंकि मैं भी बहुत कुछ छुपाता हूँ।” उसने सीधे मेरी आँखों में देखा। “और छुपाने वाले लोग एक-दूसरे को पहचान लेते हैं।”

उस पल मुझे लगा कि कमरे में हवा कम पड़ गई है। मैं कुछ बोल पाती इससे पहले आकाश वापस आ गए। बातचीत सामान्य हो गई। करण ने जल्दी से कागज़ात समेटे और चलने को तैयार हो गया। जाने से पहले उसने मुझसे कहा – “चाय बहुत अच्छी थी। अगली बार फिर तसल्ली से पीऊँगा।”

रात को आकाश ने मुझे चोदा। प्यार से, धीरे से, जैसे रोज़ करते हैं। उनकी लंड अंदर-बाहर हो रही थी और मैं करण की आँखें याद कर रही थी। जब आकाश झड़ गए तो उन्होंने मुझे गले लगा लिया। मैंने उनकी पीठ सहलाते हुए सोचा – “मैं तुम्हसे प्यार करती हूँ आकाश… लेकिन मेरा शरीर अब सिर्फ़ तुम्हारे प्यार से नहीं भर रहा।”


दो दिन बाद दोपहर का समय था। आकाश ऑफिस थे। मैं घर में अकेली थी कि फोन पर मैसेज आया। अनजान नंबर।

“बालकनी में आओ।”

मैंने पहचान लिया – विकास। दिल ज़ोर से धधकने लगा। मैं बालकनी में गई। विकास अपनी बालकनी में खड़ा था। सिगरेट पी रहा था।

“आज दो बजे मेरे घर आना। पत्नी मार्केट गई है। दो घंटे बाद ही आएगी।” मैंने सिर हिलाया – “नहीं।” “गरिमा, तू मेरी बात टाल रही है। आकाश को सब बताने में मुझे एक मिनट भी नहीं लगेगा।” “तुम ऐसा नहीं कर सकते…” “कर सकता हूँ। और करूँगा भी। दो बजे। तैयार रहना।”

मैं वापस कमरे में आई तो हाथ काँप रहे थे। डर था। लेकिन डर के साथ-साथ चूत में गर्मी भी बढ़ रही थी। मैंने फैसला किया कि आज विकास के पास जाऊँगी। सिर्फ़ इस डर को खत्म करने के लिए… या शायद अपनी भूख के लिए।

दो बजे मैंने साड़ी पहनी और विकास के फ्लैट का दरवाज़ा खटखटाया। उसने तुरंत खोल दिया और अंदर खींच लिया। दरवाज़ा बंद होते ही उसने मुझे दीवार से लगा दिया और जोर से चूमा। उसके मुँह में सिगरेट और इलायची की मिली-जुली गंध थी।

“तीन दिन से तड़प रहा था,” उसने कहा और मेरी साड़ी का ब्लाउज के हुक खोलने लगा। “आज तेरी चूत और गाँड दोनों लूँगा। और तू मज़े से लेगी।”

मैंने विरोध नहीं किया। शरीर पहले ही हार चुका था। विकास ने मुझे बेडरूम में ले जाकर बिस्तर पर धकेल दिया। साड़ी, पेटीकोट, ब्रा, पैंटी – सब कुछ जल्दी-जल्दी उतार दिया। मैं पूरी नंगी लेटी थी। उसने अपनी पेंट खोली और मोटा लंड बाहर निकाला। पहले दिन से भी ज्यादा तना हुआ।

“पकड़ इसे,” उसने कहा।

मैंने हाथ बढ़ाकर उसका मोटा लंड पकड़ा। गरम और सख्त। मैंने उसे मुँह में ले लिया। विकास ने मेरे बाल पकड़कर धक्के देने शुरू कर दिए। गले तक लंड जा रही थी। आँखों से पानी आ रहा था लेकिन मैं रोक नहीं रही थी।

“हाँ… ऐसी चुदाई चूस… आकाश की बीवी बनके…”

कुछ देर बाद उसने मुझे लिटाया और बिना किसी चाट-पिट के सीधे चूत में लंड धकेल दिया। एक ही झटके में पूरी लंड अंदर चली गई। मैंने जोर से कराह निकाली। विकास ने मेरी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रख लीं और जानवर की तरह चोदने लगा। बिस्तर चरमरा रहा था।

“बता… कैसी लग रही है मेरी लंड?” “बहुत… बहुत मोटी लग रही है… जोर से चोद… फाड़ दे…”

वो और तेज़ हो गया। गालियाँ निकाल-निकाल कर चोद रहा था। “रंडी… धोखेबाज रंडी… पति के रहते हुए पड़ोसी से चूत मरवा रही है…” मैं भी गालियाँ निकाल रही थी। “हाँ… रंडी हूँ… चोद मुझे… अपनी मोटी लंड से फाड़…”

वह लगभग बीस मिनट तक लगातार चोदता रहा। फिर लंड निकालकर मुझे पलटा और गाँड में डाल दिया। इस बार दर्द कम लगा। शरीर अब उसकी लंड की आदत पकड़ने लगा था। विकास ने जोर-जोर से गाँड मारी और आखिर में चूत में वापस डालकर अंदर ही झड़ गया। गर्म पानी की धार महसूस हुई।

वो मेरे ऊपर गिरा और साँस लेते हुए बोला – “अब तू मेरी हो गई गरिमा। जब चाहूँगा, तू आएगी।”

मैं कुछ नहीं बोली। सिर्फ़ उसकी भारी साँसें सुन रही थी। शरीर संतुष्ट था, लेकिन मन में एक अजीब सा खालीपन था। विकास की चुदाई में मज़ा तो था, लेकिन वो सिर्फ़ शरीर को भर रही थी। मन को नहीं।


घर वापस आकर मैंने नहाया और कपड़े बदले। शाम को आकाश आए तो मैं सामान्य बनने की कोशिश कर रही थी। खाना खाते समय आकाश ने बताया कि कल करण फिर आएगा। इस बार अकेला। कुछ फाइनल डॉक्युमेंट्स पर साइन करने हैं। आकाश को एक मीटिंग में बाहर जाना पड़ सकता है।

मेरा दिल एक पल के लिए रुक सा गया।

रात को जब आकाश सो रहे थे, मैं छत की तरफ देख रही थी। एक तरफ विकास था – धमकी, जोर-जबरदस्ती, मोटी लंड और गंदी गालियाँ। दूसरी तरफ करण – शांत नज़रें, धीमे शब्द और वो अहसास कि वो मुझे सिर्फ़ शरीर नहीं, कुछ और भी देख रहा है।

मुझे पता था कि कल कुछ होने वाला है। और इस बार मैं खुद उससे भागने वाली नहीं थी।

शरीर की भूख अब सिर्फ़ लंड की नहीं रह गई थी। अब उसे कुछ और भी चाहिए था। कुछ खतरनाक। कुछ नया। और करण… करण बिल्कुल वैसा ही लग रहा था।

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