सुबह उठते ही शरीर में एक अजीब सी भारीपन थी। गाँड में हल्का दर्द बाकी था, चूत में विकास के छोड़ गए निशान अभी भी महसूस हो रहे थे। आकाश नहा रहे थे। मैं किचन में चाय बनाते हुए बार-बार खिड़की की तरफ देख रही थी। विकास की बालकनी खाली थी। राहत मिली, लेकिन मन शांत नहीं था।
आकाश ने नाश्ते पर बताया, “आज करण दो बजे आएगा। मुझे तीन बजे एक क्लाइंट मीटिंग है, बाहर जाना पड़ेगा। तू उसे संभाल लेना। कागज़ात टेबल पर रख देना, वो साइन करके चला जाएगा।”
मेरा हाथ चाय के कप पर थोड़ा काँपा। आकाश ने नोटिस नहीं किया। उन्होंने मुस्कुराना, मुझे माथे पर किस करना और ऑफिस चले गए। दरवाज़ा बंद होते ही मैं कुर्सी पर बैठ गई। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। आज अकेली रहूँगी करण के साथ। विकास वाली जबरदस्ती के बाद करण की शांत नज़रें और भी खतरनाक लग रही थीं। क्योंकि वो जबरदस्ती नहीं कर रहा था। वो इंतज़ार कर रहा था कि मैं खुद टूटूँ।
दोपहर एक बजे मैंने नहाया। साड़ी चुनी – हल्की नीली, पतली। अंदर काला लेस वाला ब्रा-पैंटी सेट। पल्लू को जानबूझकर थोड़ा ढीला रखा। आईने के सामने खड़ी होकर खुद को देखा। चेहरा सामान्य था, लेकिन आँखों में भूख साफ झलक रही थी। मैंने खुद से कहा, “आज कुछ नहीं होगा। सिर्फ़ कागज़ात। बस।” लेकिन शरीर नहीं मान रहा था। चूत पहले से गीली होने लगी थी।
दो बजकर पाँच मिनट पर घंटी बजी। करण खड़ा था। सफेद शर्ट, स्लीव्स ऊपर चढ़े हुए, बाँहों की नसें साफ दिख रही थीं। हाथ में बैग। उसने मुस्कुराकर कहा, “नमस्ते गरिमा जी।”
मैंने दरवाज़ा खोला। “आइए। आकाश जी अभी निकले ही हैं। थोड़ी देर में मीटिंग को निकलेंगे।”
करण अंदर आया। उसकी नज़रें कमरे में घूमीं, फिर मुझ पर ठहरीं। “आप आज और भी खामोश लग रही हैं।”
मैंने चाय बनाने का बहाना किया। किचन में खड़ी थी कि वह पीछे आ गया। मुझसे दो कदम दूर खड़ा होकर बोला, “उस दिन डिनर पर जो मैंने कहा था, वो मजाक नहीं था। आप बहुत कुछ छुपाती हैं।”
मैंने मुड़कर देखा। “आपको मेरी जिंदगी के बारे में क्या पता?”
“कुछ नहीं। लेकिन आँखें बहुत कुछ कह देती हैं।” उसने एक कदम और बढ़ाया। “आप डरी हुई भी हैं, और भूखी भी।”
मेरा गला सूख गया। मैंने चाय का कप उसकी तरफ बढ़ाया। उसके हाथ ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उँगलियाँ गरम थीं। उसने कप एक तरफ टेबल पर रखा और मेरे हाथ को अपनी हथेली में ले लिया।
“अगर आप कहो तो मैं अभी चला जाऊँ। कोई जबरदस्ती नहीं।” उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी। “लेकिन अगर आप भी वही महसूस कर रही हो जो मैं… तो आज झूठ मत बोलना।”
मैं कुछ नहीं बोल पाई। बस उसकी आँखों में देखती रही। विकास की धमकी याद आ गई। उसकी मोटी लंड, उसकी गालियाँ, उसकी जबरदस्ती। और उसके सामने ये आदमी खड़ा था जो कह रहा था – बोलो तो चला जाऊँ। यही फर्क मुझे तोड़ रहा था।
मैंने धीरे से अपना हाथ उसके हाथ में और दबा दिया। बस इतना सा इशारा। करण समझ गया। उसने मेरा हाथ छोड़कर दरवाज़े की तरफ देखा, फिर कुंदा लगा दिया। कमरे में सिर्फ़ हमारे साँस लेने की आवाज़ थी।
वह पास आया। एक हाथ से मेरी ठुड्डी पकड़ी और धीरे से चूमा। विकास जैसा भूखा और जल्दी वाला चुंबन नहीं। धीमा, गहरा, जैसे वो मेरे होंठों का स्वाद ले रहा हो। मैंने आँखें बंद कर लीं। उसका दूसरा हाथ मेरी कमर पर आया और साड़ी के पल्लू को धीरे से हटाया। ब्लाउज के हुक एक-एक करके खुले। स्तन बाहर आ गए। करण ने उन्हें देखा, फिर दोनों हाथों से पकड़ लिया।
“बहुत खूबसूरत हैं,” उसने फुसफुसाया और एक निप्पल मुँह में ले लिया। जीभ घुमाते हुए चूसा, फिर हल्के दाँतों से दबाया। दर्द और मज़े का मिश्रण शरीर में करंट की तरह दौड़ा। मैंने उसके बाल पकड़ लिए। वह दूसरा निप्पल भी उसी तरह सताने लगा। मेरी साँसें तेज़ हो गईं।
करण ने मुझे गोद में उठाया और बेडरूम में ले गया। बिस्तर पर लिटाते हुए बोला, “आज कोई जल्दबाजी नहीं। मैं तुम्हें धीरे-धीरे तोड़ना चाहता हूँ।”
उसने मेरी साड़ी पूरी तरह खोली। पेटीकोट और पैंटी नीचे खींची। मैं पूरी नंगी लेटी थी। करण ने अपनी शर्ट के बटन खोले। बॉडी टाइट थी, सीने पर हल्के बाल, पेट सपाट। पेंट और अंडरवियर उतारते ही उसका लंड बाहर निकल आया। विकास जितना मोटा नहीं था, लेकिन लंबा और सीधा था। नसें साफ उभर रही थीं। मैंने हाथ बढ़ाकर उसे पकड़ा। गरम और सख्त।
करण बिस्तर पर चढ़ आया। उसने मेरी टाँगें फैलाईं और पहले मेरी चूत को देखा। “पहले से गीली हो… कितनी बेचैन हो तुम।” फिर उसने जीभ निकाली और सीधे चाटने लगा। विकास की तरह जल्दी-जल्दी नहीं। धीरे-धीरे, हर फड़के को अलग-अलग चाटते हुए, हग के दाने को मुँह में लेकर चूसते हुए। कभी जीभ अंदर तक घुसा देता, कभी सिर्फ़ ऊपर के हिस्से को सताता। मैं कराहने लगी। कमर बार-बार उठ रही थी।
“आह… करण… ऐसे… और…”
वह बिना रुके चाटता रहा। मैं एक बार झड़ गई। शरीर काँप रहा था। उसने सिर उठाया और मुस्कुराया। “अब असली शुरुआत करते हैं।”
उसने अपना लंबा लंड मेरी चूत पर टिकाया और धीरे-धीरे अंदर धकेलना शुरू किया। एक-एक इंच करके। जब पूरी लंड अंदर चली गई तो उसने रुककर मेरी आँखों में देखा। “बता… कैसा लग रहा है?”
“बहुत… गहरा लग रहा है…”
करण ने धीरे-धीरे हिलेगा शुरू किया। पहले लंबे और धीमे धक्के। हर बार लंड लगभग पूरी बाहर निकलती और फिर अंदर तक जाती। मैंने अपने पैर उसकी कमर पर लपेट लिए। वह एक हाथ से मेरे स्तन दबा रहा था, दूसरे से मेरे बाल। धीरे-धीरे उसकी रफ्तार बढ़ने लगी। धक्के तेज़ होने लगे। बिस्तर की आवाज़ आने लगी।
“तेरी चूत कितनी गरम है गरिमा… आकाश को पता है उसकी बीवी इतनी गीली रहती है?” “नहीं… मत पूछो…” “पूछूँगा। और तू बताएगी। तू आज मेरी है।”
उसने मेरी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रख लीं। अब और गहराई तक जा रहा था। हर धक्के के साथ मेरी गाँड बिस्तर से उठ रही थी। गालियाँ निकलने लगीं।
“आह… बहनचोद… जोर से… और जोर से चोद… फाड़ दे मेरी चूत…” “रंडी… शादीशुदा रंडी… पति के बिस्तर पर किसी और का लंड ले रही है…”
करण अचानक लंड निकालकर मुझे पलटा दिया। घुटनों के बल कर दिया। पीछे से फिर से घुसा दिया। एक हाथ से मेरे बाल पकड़े और दूसरे से मेरी गाँड के लोथों को फैलाया। तेज़-तेज़ चोदने लगा। आवाज़ गंदी आने लगी – थप-थप-थप।
“आज तेरी गाँड भी लूँगा। तैयार है?” मैंने सिर हिलाया। “हाँ… ले लो… जो करना है करो…”
उसने थूक लगाकर अपनी लंड गीली की और धीरे-धीरे गाँड की सेंध में धकेलना शुरू किया। दर्द हुआ। लेकिन विकास वाली जबरदस्ती जैसा नहीं। करण रुक-रुक कर पूछ रहा था, “दर्द हो रहा है? बोल।” मैंने दाँत भींचकर कहा, “हो रहा है… लेकिन मत निकाल… अंदर डाल…”
धीरे-धीरे पूरी लंड गाँड में समा गई। करण ने रुककर मुझे सहलाया, फिर हिलेगा शुरू किया। पहले धीमे, फिर तेज़। एक हाथ आगे लाकर मेरी चूत में उँगली घुसा दी और हग को रगड़ने लगा। दर्द और मज़े का मिश्रण पागल बना रहा था। मैं चीख रही थी, गालियाँ निकाल रही थी।
“साला… गाँड फट रही है… लेकिन चोद… जोर से चोद… आकाश के घर में मेरी गाँड मार…” “मार रहा हूँ… और मारता रहूँगा… तू अब सिर्फ़ उसकी नहीं रही…”
अचानक बाहर से घंटी बजी। दोनों रुक गए। दिल मेरे मुँह में आ गया। करण ने धीरे से लंड बाहर निकाली। मैं काँप रही थी। घंटी दोबारा बजी। करण ने इशारे से मुझे चुप रहने को कहा और पेंट पहनकर बाहर गया। मैंने जल्दी से चादर ओढ़ ली। कमरे से आवाज़ आ रही थी। कोई पूछ रहा था – गैस का बिल या कुछ। करण ने निपटाया और दरवाज़ा बंद करके वापस आया।
वह बिस्तर के पास खड़ा होकर मुझे देख रहा था। “डर गई थी?” मैंने सिर हिलाया। “अच्छा हुआ। डर के साथ चुदाई और मजेदार होती है।”
उसने फिर से पेंट उतारी और मेरे ऊपर चढ़ गया। इस बार कोई धीरज नहीं था। सीधे चूत में लंड डालकर तेज़-तेज़ चोदने लगा। मैंने उसके कंधे पकड़ लिए। वह मेरे गले पर दांत गड़ा रहा था, स्तन काट रहा था।
“आज मैं तेरे अंदर झड़ूँगा। दोनों जगह। पहले चूत में, फिर गाँड में।”
उसने अपना वादा पूरा किया। पहले चूत में जोरदार धक्कों के साथ झड़ गया। गर्म पानी की धार महसूस हुई। फिर लंड निकालकर गाँड में डाल दी और बाकी बचा हुआ पानी वहाँ छोड़ दिया। मैं भी उसी समय झड़ गई। शरीर काँप रहा था, आँखों के आगे अँधेरा छा गया।
करण मेरे बगल में लेट गया। दोनों की साँसें तेज़ चल रही थीं। कुछ देर खामोशी रही। फिर उसने धीरे से कहा, “विकास को जानती हो न?”
मेरा शरीर अकड़ गया। “क्या?” “तुम्हारे पड़ोसी। मैंने उसे देखा है। और उसने भी मुझे देखा है। जब मैं तुम्हारे घर आ रहा था।” करण ने मेरी तरफ देखा। “वह तुम्हें धमका रहा है ना?”
मैं कुछ नहीं बोल पाई। सिर्फ़ आँखें फटी की फटी रह गईं। करण ने मेरे बाल सहलाते हुए कहा, “डरो मत। मैं तुम्हें नहीं बताऊँगा आकाश को। लेकिन अब तुम अकेली नहीं हो इस खेल में। विकास सोचता है वह तुम्हें काबू में रखे हुए है। वह गलत है।”
मैंने उसकी आँखों में देखा। “तुम… तुम क्या चाहते हो?” करण मुस्कुराया। वो मुस्कान पहली बार थोड़ी खतरनाक लगी। “मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी भी बनो। और विकास को उसका सबक सिखाया जाए। धीरे-धीरे।”
उसने उठकर कपड़े पहनने शुरू कर दिए। जाने से पहले बिस्तर के पास आकर बोला, “अगली बार जब वह तुम्हें बुलाए, तो जाना। लेकिन मुझे मैसेज करना। मैं सब सुनना चाहता हूँ। और देखना भी।”
दरवाज़ा बंद होते ही मैं बिस्तर पर बैठी रह गई। शरीर में करण का पानी अभी भी भरा था। दिमाग में तूफान चल रहा था।
विकास एक तरफ धमकी दे रहा था। करण दूसरी तरफ धीरे-धीरे जाल बिछा रहा था। और मैं… मैं दोनों के बीच फँसी जा रही थी।
सबसे खतरनाक बात ये थी कि मुझे डर के साथ-साथ मज़ा भी आ रहा था। भूख और बढ़ गई थी। अब सिर्फ़ लंड नहीं चाहिए थे। अब खेल चाहिए था। खतरनाक वाला खेल।
मैंने अपना फोन उठाया। विकास का मैसेज पहले से पड़ा था – “कल दोबारा आना। वरना सब बता दूँगा।”
मैंने करण का नंबर सेव किया और एक छोटा सा मैसेज टाइप किया।
“वह कल बुला रहा है।”
भेज दिया।
अब पीछे मुड़ने का कोई रास्ता नहीं बचा था।

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