गरिमा भाभी पार्ट 6: करण का लंबा खेल और कैमरे वाली शर्त

पिछले पार्ट में विकास ने मुझे बुरी तरह चोदा था जबकि करण दूर बैठकर हर आवाज़ सुन रहा था। रात को गाड़ी में करण ने मेरे मुँह में झड़कर एक नई शर्त रख दी थी – अब मैं दो मर्दों की हो चुकी हूँ..


उस रात के बाद तीन दिन बीत गए। तीनों दिन मैंने आकाश के साथ सामान्य जीवन जीने की पूरी कोशिश की। सुबह नाश्ता, शाम को खाना, रात को उनका प्यार भरा सेक्स। लेकिन हर बार जब आकाश मुझमें झड़ जाते, तो मुझे विकास का मोटा लंड और करण का लंबा लंड याद आ जाता। शरीर अब एक लंड से भरने वाला नहीं बचा था। भूख और गहरी हो गई थी।

विकास रोज़ मैसेज करता। कभी “आज आ”, कभी “कल आ”, कभी सिर्फ़ एक फोटो – अपनी तनी हुई लंड की। मैं हर मैसेज करण को फॉरवर्ड करती। करण का जवाब लगभग एक जैसा आता – “जा। सुनूँगा। मज़े ले।”

चौथे दिन सुबह करण का मैसेज आया।

“आज दोपहर दो बजे तैयार रह। आकाश को कह देना कि तुझे मार्केट जाना है। मैं तुझे लेने आऊँगा। आज लंबा समय निकाल। जहाँ कोई नहीं रोकेगा।”

मैंने आकाश को फोन कर बताया कि मुझे कुछ कपड़े और किराने का सामान लेना है, दो-तीन घंटे लग सकते हैं। आकाश ने सामान्य स्वर में कहा, “ठीक है, ध्यान रखना।” फोन काटते ही दिल जोरों से धड़कने लगा। आज विकास वाला जल्दबाजी वाला सेक्स नहीं होने वाला था। आज करण था। और करण ने वादा किया था – घंटों।

मैंने नहाया। काली साड़ी पहनी। अंदर फिर से कुछ नहीं। सिर्फ़ साड़ी। शरीर पहले से बेचैन था। दो बजते ही करण की गाड़ी सोसायटी के पीछे वाली गली में खड़ी थी। मैं चुपके से निकली और अंदर बैठ गई। करण ने मुझे एक नज़र देखा और गाड़ी स्टार्ट कर दी।

“आज कहाँ ले जा रहे हो?” मैंने पूछा। “थोड़ी दूर। एक शांत जगह। जहाँ तू जितना जोर से चीखना चाहे, चीख सके।”

लगभग चालीस मिनट बाद गाड़ी एक पुराने गेस्ट हाउस के सामने रुकी। बाहर से साधारण लग रहा था। करण ने चाबी निकाली और मुझे अंदर ले गया। कमरा साफ था। बड़ा बिस्तर, मोटी पर्दे, एक सोफा, और शराब की बोतल टेबल पर रखी हुई। दरवाज़ा बंद होते ही करण ने मुझे दीवार से लगा दिया और गहरा चूमा। इस बार जल्दी नहीं थी। उसका चुंबन धीमा लेकिन भारी था। जैसे वो मुझे अंदर तक चख रहा हो।

“तीन दिन से तड़प रहा था,” उसने मेरे गले पर होंठ रखते हुए कहा। “विकास तुझे रोज़ चोद रहा है। उसका पानी तेरे अंदर जा रहा है। आज मैं वो सब धोऊँगा… अपने तरीके से।”

उसने मेरी साड़ी धीरे-धीरे खोली। जब उसने देखा कि मैंने फिर से अंदर कुछ नहीं पहना है तो उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई। “तू अब पूरी बेशर्म हो गई है। अच्छा।”

करण ने मुझे बिस्तर पर लिटाया। खुद कपड़े उतारे। उसका लंबा लंड पहले से तना हुआ था। वह मेरे पास लेटा और पहले सिर्फ़ हाथों से मेरे पूरे शरीर को सहलाने लगा। स्तन, पेट, जाँघें, फिर चूत। उँगली से हग के दाने पर धीरे-धीरे गोले बनाते हुए बोला, “आज जल्दी नहीं झड़ने दूँगा तुझे। कई बार झेड़ेगी। और हर बार मेरे नाम से।”

उसने अपना मुँह मेरी चूत पर रख दिया। जीभ की चाल विकास से बिल्कुल अलग थी। विकास जल्दी और भूखे की तरह चाटता था। करण सटीक और क्रूर था। कभी सिर्फ़ दाने को चूसता, कभी पूरी जीभ अंदर तक घुसाकर हिलाता, कभी दाँतों से हल्के-हल्के काटता। मैं पंद्रह मिनट के अंदर दो बार झड़ गई। दोनों बार उसने मेरी टाँगें कसकर पकड़ी हुई थीं ताकि मैं भाग न सकूँ।

“अब बोल… किसकी जीभ बेहतर है? विकास की या मेरी?” “तेरी… तेरी बेहतर है…”

करण मुस्कुराया और ऊपर चढ़ आया। अपना लंबा लंड मेरी चूत पर रगदते हुए बोला, “आज तू विकास का नाम लेगी तो मैं और जोर से चोदूँगा। समझी?”

उसने एक झटके में पूरी लंड अंदर डाल दी। मैंने जोर से साँस रोकी। करण ने मेरी दोनों कलाई बिस्तर के ऊपर पकड़ लीं और लंबी-लंबी स्ट्रोक्स में चोदने लगा। हर बार लंड लगभग पूरी बाहर निकलती और फिर जड़ तक धँस जाती।

“आह… करण… धीरे…” “धीरे नहीं। तू अब धीरे की आदी नहीं रही।”

वह तेज़ होता गया। बिस्तर जोरों से हिलने लगा। गालियाँ निकलने लगीं। मैं खुद बोल रही थी – “जोर से… और जोर से चोद… मेरी चूत फाड़ दे…” करण ने मेरी टाँगें अपने कंधों पर रख लीं। अब और गहराई तक पहुँच रहा था। पसीना दोनों के शरीर पर चमक रहा था। अचानक उसने लंड निकाली और मेरे मुँह के सामने पकड़ ली।

“चूस। अपनी चूत का स्वाद चूस।”

मैंने उसका लंड मुँह में ले लिया। गीला और गरम। करण ने बाल पकड़कर धक्के दिए। फिर फिर से चूत में डाल दिया। इस बार उसने मुझे कुत्ते की पोजीशन में कर दिया। एक हाथ से मेरे बाल पकड़े, दूसरे से मेरी गाँड पर थप्पड़ मारे। हर थप्पड़ के साथ धक्का और तेज़ होता गया।

“बता… विकास ऐसे चोदता है क्या?” “नहीं… तू… तू अलग चोदता है…” “कैसे अलग?” “तू… तू मुझे पागल बना देता है…”

करण ने अचानक लंड गाँड की सेंध पर लगा दी। थूक लगाए बिना धीरे-धीरे धकेलना शुरू किया। दर्द हुआ। मैंने चादर पकड़ ली। वह रुक-रुक कर अंदर जाता रहा जब तक पूरी लंड गाँड में न समा गई। फिर उसने धीमे लेकिन भारी धक्के लगाने शुरू किए। एक हाथ आगे लाकर मेरी चूत में दो उँगलियाँ घुसा दीं।

“आज दोनों छेद भरूँगा। और तू गिनेगी कितनी बार झेड़ी।”

अगले लगभग एक घंटे तक करण ने मुझे अलग-अलग अंदाज़ में चोदा। कभी चूत, कभी गाँड, कभी दोनों में उँगलियाँ और लंड एक साथ। बीच-बीच में वह मुझे पानी पिलाता, फिर से शुरू कर देता। मैं चार बार और झड़ चुकी थी। शरीर काँप रहा था। आवाज़ बैठने लगी थी। आखिर में उसने मुझे लिटाया और चूत में जोरदार धक्कों के साथ अंदर झड़ गया। इतना ज्यादा कि पानी बाहर तक आने लगा।

वह मेरे बगल में गिरा। दोनों की साँसें तेज़ चल रही थीं। कुछ देर खामोशी रही। फिर करण ने धीरे से कहा, “विकास को लगता है वह तुझे काबू में रखे हुए है। वह गलत है। असली काबू मेरे हाथ में है।”

मैंने उसकी तरफ देखा। “तुम मुझसे क्या चाहते हो करण?” “सब कुछ। तेरा शरीर, तेरी गालियाँ, तेरा डर, तेरी भूख। और धीरे-धीरे… तेरा मन भी।” उसने मेरे बाल सहलाते हुए कहा, “अगली बार जब विकास तुझे बुलाए, तो मैं भी वहाँ कहीं पास में हूँगा। शायद सुनूँ, शायद देखूँ। शायद… शामिल भी हो जाऊँ।”

मेरी आँखें फैल गईं। “तीनों…?” करण हँसा। वो हँसी पहली बार सच में खतरनाक लगी। “अभी नहीं। लेकिन संभावना तो है। तू तैयार है क्या?”

मैं जवाब नहीं दे पाई। शरीर तो तैयार था। मन अभी भी आकाश के प्यार और इस गंदे खेल के बीच फँसा हुआ था।

करण ने मुझे नहाने को कहा। नहाते समय उसने भी साथ में आ करके फिर से मुझे दीवार से लगाकर खड़े-खड़े चोदा। इस बार सिर्फ़ चूत में। जब हम तैयार हुए तो उसने एक छोटी सी शीशी निकालकर मेरे पर्स में रख दी।

“ये क्या है?” “एक छोटा सा कैमरा। अगली बार जब विकास के यहाँ जाएँ, तो कहीं लगा देना। मैं देखना चाहता हूँ। अपनी आँखों से।”

मैंने शीशी को देखा। हाथ काँप रहे थे। करण ने मेरा चेहरा पकड़कर कहा, “तू अब पीछे नहीं हट सकती गरिमा। तूने खुद इस खेल में कदम रखा है। अब बस गहराई में जाना बाकी है।”

वापस सोसायटी पहुँचते समय सूरज डूबने लगा था। करण ने मुझे छोड़ते हुए कहा, “आज रात आकाश जब तुझे चोदे, तो मेरा और विकास का ख्याल रखना। और कल मुझे बताना कैसा लगा।”

मैं घर पहुँची। आकाश अभी नहीं आए थे। मैंने नहाया, साड़ी बदली, लेकिन अंदर करण का पानी अभी भी था। मैं आईने के सामने खड़ी होकर खुद को देख रही थी।

आकाश की पत्नी। विकास की धमकी वाली रंडी। करण की खेल वाली औरत।

तीनों चेहरे एक ही शरीर में समा गए थे। और सबसे डरावना सच ये था कि मुझे तीनों ही अच्छे लगने लगे थे।

फोन बजा। विकास का मैसेज था।

“कल दोबारा आना। आज की कमी पूरी करूँगा।”

मैंने मैसेज पढ़ा और करण को फॉरवर्ड कर दिया। साथ में एक लाइन और लिखी –

“कैमरा कैसे लगाना है, बता देना।”

भेज दिया।

अब खेल और गहरा होने वाला था। और मैं खुद उसमें कूदने जा रही थी।

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