गोरी चूत की प्यास: हबशी मजदूर का काला राक्षस (Part-1)

plot :biwi ki chudai : Gori chut ki pyas wali biwi roz balcony se habshi mazdoor ko dekhti hai. Ek din woh mazdoorni ki chut faad raha hota hai. Kala rakshas jaisa mota lund dekh kar biwi ki chut paani chhod deti hai. Part-1

मेरा नाम प्रिया है। उम्र छब्बीस साल। शादी को तीन साल हो चुके हैं। पति सुबह आठ बजे ऑफिस निकल जाता है और रात के नौ-दस बजे ही लौटता है। बीच का पूरा दिन सिर्फ मेरे और खाली घर का होता है। तीन साल में सेक्स इतना कम और इतना जल्दी खत्म हो जाता है कि शरीर की प्यास कभी बुझती ही नहीं। रात को जब वह सो जाता है तो मैं बाथरूम में जाकर उंगलियों से अपनी चूत को रगड़ती हूँ। कभी बिस्तर पर लेटकर तकिया दबाकर, कभी बाथरूम की दीवार से सटकर। हर रोज। बिना इसके नींद नहीं आती। ये biwi ki chudai आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।

शरीर मेरा वैसा ही है जैसा पुरुषों की नजरें बार-बार घूम जाती हैं। ऊँचाई पाँच फुट पाँच इंच। रंग गोरा, लेकिन धूप में हल्का गेहुँआ हो जाता है। स्तन बड़े और भारी हैं, तिरतीस साइज के। ब्लाउज के अंदर दबे रहते हैं फिर भी उनकी गोलाई साफ दिखती है। कमर पतली है, अट्ठाईस इंच। और उसके नीचे कूल्हे चौड़े, गोल, भारी। जब मैं चलती हूँ तो गांड की दोनों लोथें अलग-अलग हिलती हैं। साड़ी के नीचे भी उनकी हरकत छुप नहीं पाती। जांघें मोटी और मुलायम हैं। चूत पर घने काले बाल हैं जिन्हें मैं नियमित साफ रखती हूँ, लेकिन जड़ें हमेशा गीली रहती हैं। अंदर की दीवारें इतनी संवेदनशील हैं कि हल्की छुअन पर भी पानी छूटने लगता है।

हमारी बिल्डिंग के बगल में एक नई बिल्डिंग बन रही है। पाँच मंजिल तक ढांचा खड़ा हो चुका है। मेरी बालकनी से सीधा उस बिल्डिंग की तीसरी मंजिल का एक खाली कमरा दिखता है। दीवारें अभी पूरी नहीं बनी हैं, सिर्फ खंभे और फर्श हैं। वहीं मजदूर काम करते हैं।

पहली बार जब मैंने उसे देखा, तब सुबह के ग्यारह बज रहे थे। मैं बालकनी में कपड़े सुखाने गई थी। साड़ी पहनी थी, साधारण सी। अचानक नजर उस तरफ गई। एक आदमी दीवार के किनारे खड़ा सिगरेट पी रहा था। रंग उसका बहुत काला था, हबशी जैसा। शरीर लंबा और तगड़ा। कंधे चौड़े। बाजू इतने मोटे कि टी-शर्ट की आस्तीन तन गई थी। छाती चौड़ी और सपाट। कमर संकरी। पसीने से उसकी टी-शर्ट चिपक गई थी और नीचे का पेट साफ दिख रहा था—कड़े कड़े मांसपेशियों वाले। चेहरा तीखा, आँखें गहरी और बड़ी। होंठ मोटे। वह सिगरेट पीते हुए सीधा मेरी तरफ देख रहा था.

मेरी नजर उससे मिली। मैंने जल्दी से नजर हटा ली। दिल अजीब सा धड़कने लगा। शर्म और एक अजीब सी घबराहट दोनों एक साथ। मैं अंदर चली गई, लेकिन दिमाग में वही तस्वीर घूमती रही—उसका काला शरीर, उसकी आँखें।
दूसरे दिन फिर वही समय। मैं जानबूझकर बालकनी में गई। वह फिर वहीं था। इस बार सिगरेट नहीं, बल्कि हथौड़ा चला रहा था। हर बार हथौड़ा मारते हुए उसकी बाजू की नसें उभर आतीं। पसीना उसके माथे से बहकर गालों पर गिर रहा था। फिर उसकी नजर मुझ पर पड़ी। उसने हथौड़ा रोक दिया। सीधा देखने लगा। मैंने साड़ी का पल्लू ठीक किया, लेकिन नजर नहीं हटाई। अंदर कुछ अजीब सा खिंचाव हुआ। चूत में हल्की सी सनसनाहट हुई। मैं जल्दी से अंदर चली गई और कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया। उंगलियाँ अपने आप शॉर्ट्स के अंदर चली गईं। गीली हो चुकी थी। मैंने दो उंगलियाँ अंदर डालकर तेजी से हिलाईं। आँखें बंद करके उसी काले शरीर को याद किया। पानी निकल आया। लेकिन प्यास नहीं बुझी। ये desi biwi ki chudai आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।

तीसरे दिन मैंने जानबूझकर थोड़ी सेक्सी साड़ी पहनी। हल्की गुलाबी, ब्लाउज गहरा। बाल खोले। बालकनी में जाकर गमले में पानी डालने का नाटक किया। वह फिर वहाँ था। इस बार वह दीवार के किनारे खड़ा मुझे घूर रहा था। मेरी नजर उसकी आँखों में गई तो उसने जीभ से अपने मोटे होंठ चाटे। मेरी साँस अटक गई। शरीर में गर्मी दौड़ गई। मैंने मुंह फेर लिया, लेकिन गांड की लोथें साड़ी के नीचे हिल रही थीं। मुझे पता था वह देख रहा है। अंदर जाकर मैंने फिर उंगलियाँ चूत में डालीं। इस बार और जोर से। निप्पल को दूसरी हाथ से मसलते हुए। “आह… काला…” मुंह से निकल गया। पानी फर्श पर टपक गया।

चौथे, पाँचवें, छठे दिन यही सिलसिला चलता रहा। हर दिन मैं बालकनी में जाती। हर दिन वह देखता। मेरी असहजता कम होती जा रही थी। उसकी जगह एक भूख ले रही थी। मैंने साड़ियाँ बदलनी शुरू कर दीं। एक दिन लाल साड़ी, ब्लाउज इतना लो कि स्तनों की ऊपरी गोलाई साफ दिखे। दूसरे दिन काली साड़ी जिसमें गांड की शेप साफ उभर आए। जब मैं चलती तो जानबूझकर धीरे चलती ताकि गांड की हर लोथ अलग-अलग हिले। मुझे पता था वह देख रहा है। उसकी नजरें मेरी गांड पर टिक जातीं। मेरी चूत रोज भीग जाती।

सातवें दिन सुबह मैंने सबसे सेक्सी साड़ी निकाली। गहरा नीला रंग। ब्लाउज इतना टाइट कि निप्पल की शेप साफ दिख रही थी। साड़ी कमर पर इतनी कसकर बाँधी कि कमर और कूल्हों का फर्क साफ नजर आए। बाल खुले, हल्का मेकअप। बालकनी में गई। वह वहाँ था। इस बार वह काम नहीं कर रहा था। दीवार के किनारे खड़ा सिर्फ मुझे देख रहा था। मेरी नजर उसकी आँखों में गई। उसने धीरे से सिर हिलाया। जैसे कोई इशारा। मेरी चूत ने पानी छोड़ दिया। पैंटी गीली हो गई। मैं अंदर भाग गई। पूरे दिन बेचैन रही। उंगलियाँ बार-बार चूत में जाती रहीं। लेकिन संतुष्टि नहीं मिली।

अगले दिन सुबह ग्यारह बजे के आसपास मैं फिर बालकनी में गई। इस बार वह अकेला नहीं था। कमरे के अंदर एक औरत थी—मजदूरन। सांवली, दुबली, साड़ी पहने। वह आदमी उसे दीवार से सटाकर खड़ा किए हुए था। मेरी साँस रुक गई।

उसने उस औरत को गोद में उठा लिया। एक हाथ से उसकी एक टाँग पकड़ी और दूसरी टाँग उसके कंधे पर रख दी। औरत की साड़ी ऊपर उठी हुई थी। उसकी चूत पूरी नंगी और खुली हुई थी। और उस आदमी का लंड… मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। ये married woman sex story आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।

लंड बहुत लंबा था। कम से कम आठ-नौ इंच। और मोटाई इतनी कि मुट्ठी में भी पूरी न समाए। रंग बिल्कुल काला, चमकदार, नसें उभर हुईं। सिर का भाग और भी मोटा और गोल। वह लंड उस औरत की चूत के मुंह पर टिका था। फिर उसने जोर से धक्का मारा। पूरा लंड एक ही झटके में अंदर चला गया। औरत की चीख निकल गई। “आह्ह्ह… बाबा… फट गई…”

लेकिन वह रुका नहीं। उसने औरत को गोद में उठाए रखा और जोर-जोर से हिचकोले मारने लगा। हर धक्के के साथ उसके अंडकोष उसकी गांड से टकराते। चूत से सफेद-सफेद झाग निकल रहा था जो उसके लंड पर चिपक जाता और फिर अंदर-बाहर होते हुए और फैल जाता। औरत की चूत इतनी फैल चुकी थी कि लंड की मोटाई पूरी समा रही थी। पानी की धारा लगातार बह रही थी—उसकी टाँगों से होती हुई फर्श पर गिर रही थी।

वह और तेज हो गया। कमर ऐसे हिला रहा था जैसे कोई मशीन हो। औरत की चीखें अब सिसकारियाँ बन गई थीं। “और जोर से… पूरे अंदर… आह्ह्ह…” उसने औरत के बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और उसकी गर्दन पर काटने लगा। नीचे लंड पूरे जोर से चूत फाड़ रहा था। हर धक्के के साथ चप-चप की आवाज आ रही थी। चूत से निकला पानी उसके लंड और अंडकोष पर चमक रहा था।

मैं बालकनी में पत्थर की तरह खड़ी थी। साँसें तेज चल रही थीं। मेरी अपनी चूत ने इतना पानी छोड़ दिया था कि पैंटी पूरी तर हो गई थी और जांघों से नीचे बह रहा था। निप्पल इतने सख्त हो गए थे कि ब्लाउज से छेद करते नजर आ रहे थे। मैंने साड़ी का पल्लू दबा रखा था अपने मुंह पर, ताकि आवाज न निकले। लेकिन आँखें उस काले लंड से हटा ही नहीं पा रही थीं। जोर-जोर से धक्के… चूत का फटना… पानी का बहना… औरत का कांपना…

अचानक वह रुका। लंड पूरा अंदर दबाए रखा। औरत का शरीर अकड़ गया। उसकी चूत ने लंड को जकड़ लिया। पानी की एक तेज धारा छूटी। फिर उसने लंड बाहर निकाला। लंबा, काला, चमकता हुआ, ऊपर तक सफेद झाग लगा हुआ। उसने औरत को नीचे उतारा। औरत की टाँगें कांप रही थीं। चूत पूरी खुली और लाल होकर फड़क रही थी। अंदर से उसका पानी अभी भी रिस रहा था। ये biwi sex story आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।

वह आदमी मुड़ा। सीधा मेरी तरफ देखा। हमारी नजरें मिलीं। उसने अपने लंड को हाथ में लिया और धीरे-धीरे ऊपर-नीचे किया। फिर मुस्कुराया। एक धीमी सी, काली सी मुस्कान।

मेरी टाँगें कांपने लगीं। मैं अंदर की तरफ लड़खड़ाते हुए भागी। दरवाजा बंद किया। दीवार से सटकर बैठ गई। उंगलियाँ अपने आप साड़ी के अंदर चली गईं। पैंटी हटाई। चूत इतनी गीली थी कि उंगलियाँ फिसल रही थीं। मैंने तीन उंगलियाँ एक साथ अंदर डाल दीं और जोर-जोर से हिलाने लगी। आँखें बंद थीं। सिर्फ वही काला लंबा लंड दिख रहा था जो औरत की चूत फाड़ रहा था। “आह्ह्ह… हबशी… लंड… फाड़ दे…” मुंह से निकल रहा था। पानी की धार छोटी। पूरे शरीर में कंपकपी दौड़ गई। लेकिन प्यास और बढ़ गई।

मैं फर्श पर लेटी रही। साँसें तेज। चूत अभी भी फड़क रही थी। दिमाग में सिर्फ एक बात घूम रही थी—कल वह फिर वहाँ होगा। और मैं… मैं अपनी चूत उसकी उस काली, मोटी, लंबी लंड से फड़वाना चाहती हूँ।

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