किरायेदार की रसीली औरत

plot :kirayedar sex story : Makanmalkin Sarita ki akeli jawani ne tenant ko apne shareer ka kirayedar bana liya. Slow burn ke baad garam chudai. Full desi chudai kahani.

घर के पिछले हिस्से में जो कमरा खाली था, उसका किराया सिर्फ छह हजार था। पानी और बिजली अलग। मैंने झट से हाँ कह दी। मकानमालकिन ने चाबी देते हुए बस इतना कहा, “शांति से रहना। रात को ग्यारह बजे के बाद टीवी का आवाज कम रखना।”

उनका नाम सरिता था। उम्र कहीं अड़तीस-चालीस के बीच होगी। शरीर से वे पतली नहीं थीं। गोल चेहरा, बड़े स्तन जो ब्लाउज के अंदर दबाए रखने पर भी अपना वजूद बताते थे, और कमर के नीचे भारी कूल्हे। साड़ी वे हमेशा कसकर बाँधती थीं, जिससे उनकी आकृति साफ नजर आती। पति रेलवे में जॉब करते थे और हफ्ते में चार-पाँच दिन बाहर ही रहते थे। बेटा हॉस्टल में था। घर में ज्यादातर वे अकेली ही रहतीं। ये antarvasana bhabhi ki chudai आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।

पहले पंद्रह दिन मैंने उन्हें सिर्फ सुबह और शाम को देखा। सुबह वे आँगन में तुलसी को पानी देतीं, शाम को छत पर चाय लेकर बैठतीं। हमारी बातें सीमित थीं—नमस्ते, मौसम, पानी की टंकी। लेकिन हर बार जब वे साड़ी का पल्लू सँभालतीं तो उनकी बाजू की चिकनी त्वचा और ब्लाउज के गले से दिखता गला मेरी नजर खींच लेता।

एक शाम बारिश हो रही थी। मैं अपने कमरे में नहीं था, बाहर से सामान लेकर लौटा तो देखा वे आँगन में खड़ी कपड़े समेट रही हैं। साड़ी भीग चुकी थी और शरीर से चिपक गई थी। ब्लाउज गीला होने से अंदर की ब्रा की लकीरें साफ नजर आ रही थीं। उन्होंने मेरी तरफ देखा और मुस्कुरा दीं।

“मदद कर दूँ?” मैंने पूछा।

उन्होंने सिर हिलाया। मैंने उनके साथ मिलकर कपड़े उठाए। जब हमारे हाथ एक साथ रस्सी पर गए तो उंगलियाँ छू गईं। उन्होंने हाथ नहीं हटाया तुरंत। कुछ सेकंड तक दोनों के हाथ गीले कपड़े पर ही रुके रहे। फिर उन्होंने धीरे से कहा, “अंदर रख दो।”

उस रात मुझे नींद देर से आई। दिमाग में उनका भीगा शरीर घूमता रहा।

अगले दिन मैंने नोटिस किया कि वे पहले से थोड़ा ज्यादा संभालकर साड़ी पहनने लगी हैं। रंग भी थोड़े चटक हो गए थे। एक दोपहर मैं नहाकर निकला तो वे किचन में चाय बना रही थीं। उन्होंने मुझे देखकर आवाज दी, “चाय पी लो। अकेले-अकेले क्या बैठे हो।”

मैं उनके किचन में बैठ गया। उन्होंने चाय देते हुए पूछा, “पत्नी नहीं है क्या?”

“नहीं। अभी तक नहीं की शादी।”

वे हँसीं। हँसी में उनका पूरा शरीर हिलता था। स्तनों का कंपन ब्लाउज के ऊपर से भी महसूस हो रहा था। उन्होंने कहा, “अच्छे लड़के हो। किसी लड़की को खुश रखोगे।”

बातचीत लंबी चली। उन्होंने अपने पति के बारे में बताया—कैसे वे सालों से अलग-अलग शहरों में रह रहे हैं, कैसे शरीर की जरूरतें दब जाती हैं। उनकी आँखों में बोलते-बोलते एक थकान थी। मैं चुपचाप सुनता रहा। जब मैं उठने लगा तो उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया।

“रात को अगर नींद न आए तो नीचे आ जाना। टीवी देखती रहती हूँ अकेली।”

उस रात मैं गया। घड़ी में साढ़े ग्यारह बज रहे थे। वे सलवार-कमीज में थीं। कमीज के ऊपर से उनके स्तनों की गोलाई साफ थी। हम सोफे पर बैठे। टीवी चल रहा था लेकिन दोनों कुछ नहीं देख रहे थे। बातों-बातों में उनका हाथ मेरे हाथ के पास आ गया। फिर हमारे हाथ मिल गए। उन्होंने अपनी उंगलियाँ मेरी उंगलियों के बीच फँसा लीं।

“तुम्हारे हाथ गर्म हैं,” उन्होंने धीरे से कहा।

मैंने उनका हाथ उलटा और हथेली पर उंगली फेरी। वे सहम गईं लेकिन हाथ नहीं छुड़ाया। फिर मैंने धीरे से उनका चेहरा अपनी तरफ किया और चूम लिया। पहला चुंबन धीमा था। उनके होंठ मोटे और नरम थे। जब मेरी जीभ उनके होठों पर फिरी तो उन्होंने मुंह खोल दिया। दोनों की जीभ मिल गई। उनका शरीर मेरे करीब आता गया। मैंने उनकी कमर में हाथ डाला। सलवार के ऊपर से उनकी गांड की गोलाई मेरे हाथ में आ गई—नरम, भारी और गरम।

वे खुद मेरे ऊपर झुक गईं। मैं सोफे पर लेट गया और वे मुझ पर आ गईं। कमीज ऊपर की तरफ खिसक चुकी थी। मैंने उनके स्तनों को बाहर से ही मसलना शुरू किया। वे भारी थे। निप्पल सख्त हो चुके थे और हथेली में चुभ रहे थे। उन्होंने कराहते हुए कहा, “ऊपर से हटाओ…” ये antarvasana kirayedar sex story आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।

मैंने कमीज और ब्रा दोनों उतार दिए। उनके स्तन मेरे चेहरे के सामने थे—बड़े, थोड़े झुके हुए, गहरे रंग के निप्पल वाले। मैंने एक निप्पल मुंह में लिया और जोर से चूसा। उन्होंने मेरे बाल पकड़ लिए। दूसरी तरफ हाथ से मसलता रहा। वे मेरे लंड के ऊपर अपनी गांड घुमाने लगीं। सलवार के कपड़े के ऊपर से ही घर्षण हो रहा था।

थोड़ी देर बाद वे उठकर खड़ी हो गईं और सलवार तथा पैंटी एक साथ नीचे सरका दीं। उनकी चूत पर घने काले बाल थे। बीच में मांस की लकीर चमक रही थी। वे फिर मुझ पर बैठ गईं। इस बार बिना कपड़े के। उनकी गीली चूत मेरे पैंट के ऊपर ही रगड़ खा रही थी। मैंने जल्दी से अपनी पैंट और अंडरवियर नीचे किए। मेरा लंड बाहर आया—तना हुआ, नसों से भरा।

उन्होंने उसे हाथ में लिया। “मोटा है…” उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा और फिर अपनी चूत के मुंह पर टिकाया। धीरे-धीरे बैठती गईं। अंदर जाते समय उनकी आँखें बंद हो गईं और मुंह से लंबी साँस निकली। जब पूरा लंड अंदर तक चला गया तो वे हिलना बंद कर बैठी रहीं। उनकी चूत मेरे लंड को कसकर जकड़े हुए थी—गर्म, गीली और धड़कती हुई।

फिर वे ऊपर-नीचे होने लगीं। पहले धीमे। स्तन मेरे चेहरे के सामने झूल रहे थे। मैंने दोनों हाथों से उनकी गांड पकड़ ली और अपनी तरफ से भी धक्के देने लगा। उनकी गांड की मांस मेरे हाथों में दब रही थी और फैल रही थी। आवाज आने लगी—गीली चूत की चपचप। वे तेज होती गईं। अब पूरे जोर से बैठ रही थीं। हर बार जब वे नीचे जातीं तो उनके अंदर से पानी की आवाज आती।

“जोर से… अंदर तक…” वे बोल रही थीं। आवाज बदल चुकी थी।

मैंने उन्हें नीचे कर दिया। वे चारों हाथ-पैरों पर आ गईं। मैंने पीछे से प्रवेश किया। इस कोण से उनका शरीर और ज्यादा खुला हुआ था। मैंने उनकी कमर पकड़ी और लंबी-लंबी गति से पेलने लगा। उनकी गांड हर धक्के के साथ काँपती थी। मैंने एक हाथ आगे ले जाकर उनकी चूत के ऊपर वाले हिस्से को सहलाना शुरू किया। वे और जोर से पीछे की तरफ धकेलने लगीं।

थोड़ी देर बाद मैंने उन्हें पलटा। उनकी दोनों टाँगें मेरे कंधों पर थीं। मैंने गहराई तक जाना शुरू किया। उनके मुंह से अब रुक-रुक कर आवाजें निकल रही थीं। उनकी चूत इतनी गीली हो चुकी थी कि मेरे लंड पर सफेद झाग लग रहा था। मैंने गति तेज कर दी। बिस्तर की आवाज घर में गूँज रही थी। उन्होंने अपने नाखून मेरी पीठ में गड़ा दिए।

अचानक उनका शरीर तन गया। चूत ने मेरे लंड को बार-बार जकड़ना शुरू कर दिया। उनके पेट की मांस काँप रही थी। आँखें पीछे की तरफ मुड़ गईं। एक लंबी काँपती हुई आवाज निकली और फिर वे शिथिल हो गईं। उनकी चूत अभी भी धड़क रही थी।

मैं बाहर निकला। उन्होंने खुद ही अपना मुंह खोल लिया। मैंने लंड उनके होठों के बीच रख दिया। वे उसे चूसने लगीं—गीला, अपनी ही चूत के रस से लथपथ। मैं उनके मुंह में ही आने वाला था तभी उन्होंने लंड निकाला और अपनी स्तनों पर रख लिया। गाढ़ा सफेद वीर्य उनकी छाती पर छूटने लगा। कुछ बूंदें उनके मुंह के कोने पर भी लग गईं जिन्हें उन्होंने जीभ से चाट लिया। ये antarvasana landlady sex story आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।

बहुत देर तक दोनों वैसे ही पड़े रहे। पसीने की बदबू और सेक्स की गंध कमरे में फैली हुई थी। आखिर में वे बोलीं, “यह हफ्ते में दो-तीन बार हो सकता है। उससे ज्यादा नहीं। पति जब आते हैं तब बिल्कुल नहीं।”

मैंने सिर हिलाया। उनके शरीर पर अभी भी मेरे नाखूनों और उंगलियों के निशान थे। चूत लाल और सूजी हुई थी। वे उठकर अपनी सलवार पहनने लगीं। जाते-जाते दरवाजे पर रुकीं और बोलीं, “अगली बार थोड़ा और देर तक करना। आज जल्दी निकल गया।”

मैं अकेला रह गया। बिस्तर पर उनके शरीर की गर्मी अभी भी बाकी थी। खिड़की से रात की हवा आ रही थी। मुझे लगा कि इस घर का किराया अब सिर्फ छह हजार नहीं रहा।

अगली सुबह जब मैं बाहर निकला तो वे आँगन में तुलसी को पानी दे रही थीं। साड़ी पहले जैसी कसकर बँधी थी। उन्होंने मुझे देखकर सामान्य तरीके से नमस्ते किया, जैसे कल रात कुछ हुआ ही न हो। लेकिन जब वे मुड़ीं तो उनकी साड़ी के नीचे गांड की हलकी हरकत ने मुझे बता दिया कि सब कुछ याद है उन्हें भी। ये antarvasana family chudai kahani आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।

और यही सिलसिला चल पड़ा। हफ्ते में दो-तीन रातें। कभी उनके कमरे में, कभी मेरे। कभी जल्दी, कभी देर रात तक। उनकी रसीली देह की भूख बढ़ती गई और मैं उसका किरायेदार बनता गया—शरीर का, पसीने का, और उन आवाजों का जो वे केवल मेरे सामने निकालती थीं।

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