मीना मामी की तड़प: गाँव की इज्जतदार औरत ने भतीजे से चुदवाया

मेरा नाम रोहित है। उम्र चौबीस साल।
गाँव छोड़कर शहर गए हुए लगभग छह साल हो गए थे। पढ़ाई, फिर नौकरी… इतनी भागदौड़ में गाँव लौटने का मौका ही नहीं मिला। इस बार नानी की तबियत खराब होने की वजह से आया था। सोचा था चार-पाँच दिन रुककर वापस चला जाऊँगा। लेकिन गाँव आकर जो देखा, उसने मुझे रोक लिया।
सबसे ज्यादा बदलाव मीना मामी में दिखा।
मीना मामी… उम्र करीब पैंतीस की होंगी। गाँव में उनका बड़ा मान था। शादीशुदा, सुशील, हमेशा मुस्कुराती हुई। पहले जब भी गाँव आता था तो वे मुझे लाड़ से “रोहित बेटा” कहकर बुलाती थीं। सिर पर हाथ फेरती थीं। लेकिन इस बार जब मैं उनके घर गया तो उन्होंने मुस्कान तो दी, लेकिन आँखों में वह पुरानी गर्माहट नहीं थी। जैसे कोई पर्दा आ गया हो उनके चेहरे पर।
गाँव वाले भी धीरे-धीरे फुसफुसाते थे। “मीना बहुत बदल गई है।” “पहले जैसी नहीं रही।” “कुछ तो बात है।”
लेकिन कोई साफ नहीं बताता था। बस अटकलें थीं।
पहले तीन दिनों में मैंने उन्हें कई बार देखा। कभी खेत के रास्ते पर, कभी मंदिर के पास, कभी अपने आँगन में कपड़े सुखाते हुए। हर बार हमारी नज़रें मिलतीं तो वे विनम्रता से मुस्कुरा देतीं, लेकिन बातें बहुत कम करतीं। पहले जैसी हँसी-मजाक वाली मीना मामी अब बहुत शांत लगती थीं। अंदर ही अंदर कुछ दबाए हुए।
एक शाम की बात है। सूरज डूबने वाला था। मैं नानी के घर की छत पर खड़ा था कि मैंने देखा मीना मामी घर से निकलीं। साड़ी पहने हुईं, पल्लू सिर पर डाले। लेकिन उनकी चाल में एक अजीब सी जल्दबाजी थी। वे गाँव के पुराने रास्ते की तरफ बढ़ीं… जहाँ पहले कभी आबादी हुआ करती थी, अब सिर्फ़ खंडहर और पुराने पेड़ बचे थे।
मुझे नहीं पता क्यों, लेकिन मैं उनके पीछे हो लिया। दूर-दूर से।
वे एक पुराने टूटे हुए मकान के पास रुकीं। वहाँ पहले से कोई खड़ा था। अंधेरे में चेहरा साफ नहीं दिख रहा था। दोनों धीमे स्वर में बात करने लगे। मैं जितना करीब जा सका, गया। कुछ शब्द सुनाई दिए…
“…अब और नहीं सह सकती…” “…तुम समझते नहीं…” “…रोहित आ गया है गाँव में…”
मेरा नाम सुनकर मैं सहम गया। तभी मीना मामी की नज़र मेरे ऊपर पड़ गई। वे चौंक गईं। दूसरे शख्स ने जल्दी से अपना मुँह ढक लिया और अंधेरे में गायब हो गया। मीना मामी तेजी से मेरी तरफ आईं।
“रोहित? तुम यहाँ क्या कर रहे हो?” उनकी आवाज में गुस्से से ज्यादा घबराहट थी।
“मैं… मैं बस घूम रहा था मामी।” “झूठ मत बोलो।” उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। उनका हाथ ठंडा था। “तुमने क्या सुना?”
मैंने सच कह दिया। “थोड़ा-बहुत। आप किसी से बात कर रही थीं। और… मेरा नाम लिया आपने।”
वे कुछ पल चुप रहीं। फिर गहरी साँस लेकर बोलीं, “चलो यहाँ से। बात करनी है तो कहीं और।”
हम दोनों चुपचाप गाँव के बाहर एक पुराने पीपल के पेड़ तक गए। वहाँ कोई नहीं आता था। चाँद निकल आया था। मीना मामी ने पल्लू ठीक किया और बोलीं,
“रोहित, तुम बड़े हो गए हो। अब छोटी-छोटी बातें छुपाई नहीं जातीं।”
“मामी, गाँव वाले क्या कहते हैं आपके बारे में? आप पहले जैसी क्यों नहीं रहीं?”
वे हँसीं। लेकिन हँसी में दर्द था। “क्योंकि अब मैं वह मीना नहीं रही जो सबकी प्यारी भाभी थी। अब मैं एक ऐसी औरत हूँ जिसके बारे में लोग बातें बनाते हैं।”
फिर उन्होंने जो बताया, उससे मैं हिल गया।
उनके पति… मेरे मामा… पिछले दो साल से उन्हें छूते तक नहीं थे। शादी के पंद्रह साल बाद अचानक से उन्होंने मीना मामी को पूरी तरह नकार दिया था। न बात, न संबंध, न कोई भावना। घर में रहकर भी मीना मामी अकेली थीं। और गाँव में अकेली रहती औरत पर लोग अपनी-अपनी कहानियाँ गढ़ने लगते हैं। किसी ने कहा किसी पर हाथ लगा लिया, किसी ने कहा चरित्र ठीक नहीं… जबकि सच्चाई यह थी कि वे सिर्फ़ तड़प रही थीं। शरीर और मन दोनों से।
“मैंने कोई गलत काम नहीं किया रोहित,” वे बोलीं। आँखें नम थीं। “लेकिन जरूरत जब बहुत दिनों तक दबती है… तो इंसान कमजोर पड़ जाता है। और कमजोरी में लोग गलत मतलब निकाल लेते हैं।”
मैं चुप था। उनके इतने करीब खड़ा था कि उनकी साँसें महसूस हो रही थीं। चाँदनी में उनका चेहरा और भी आकर्षक लग रहा था। पैंतीस साल की उम्र में भी उनका शरीर सुडौल था। साड़ी के नीचे उनकी छाती का उभार साफ दिख रहा था।
“मामी…” मैंने धीरे से कहा। “आप अकेली तड़प रही हैं इतने साल से?”
उन्होंने मेरी तरफ देखा। इस बार उनकी आँखों में कुछ और था। शर्म, भूख और थकान का मिश्रण। “तुम अभी बहुत छोटे हो रोहित। इन बातों में मत पड़ो।”
“अब छोटा नहीं हूँ।”
मैंने उनका हाथ पकड़ लिया। उन्होंने नहीं छुड़ाया। हवा में एक अजीब सा तनाव तैर रहा था। फिर धीरे से मैंने उन्हें अपनी तरफ खींचा। वे抵抗 नहीं कर पाईं। हमारे होंठ मिल गए। पहले हल्के से, फिर गहराई से। उनकी साँसें तेज हो गईं। मेरे हाथ उनकी कमर पर थे। साड़ी के ऊपर से उनकी गरमाहट महसूस हो रही थी।
चुंबन टूटा तो वे बोलीं, “यह गलत है… तुम मेरे भतीजे हो…” “खून के नहीं हैं मामी। और आप तड़प रही हैं। मैं भी…”
इस बार उन्होंने खुद मुझे चूम लिया। उनकी जीभ मेरे मुँह में घुस आई। मैंने उनकी साड़ी का पल्लू हटाया। ब्लाउज के ऊपर से उनके स्तनों को दबाया। वे कराह उठीं।
“रोहित… यहाँ नहीं… कोई देख लेगा…” “तो कहाँ?”
वे कुछ पल सोचती रहीं। फिर बोलीं, “मेरे घर के पीछे पुराना कोठा है। मामा शहर गए हुए हैं। रात भर नहीं आएंगे।”
आधे घंटे बाद हम उस कोठे में थे। एक दमकल कमरा, चारपाई, और एक लालटेन। मीना मामी ने दरवाजा बंद किया और मेरी तरफ देखा। इस बार उनकी आँखों में शर्म के साथ-साथ एक गहरी भूख थी।
“इतने साल बाद किसी मर्द ने मुझे छुआ है रोहित… धीरे करना।”
मैंने उन्हें चारपाई पर बिठाया। उनकी साड़ी खोली। ब्लाउज के हुक खोले। उनके भारी स्तन बाहर आ गए। मैंने दोनों को हाथों में लिया और मसला। निप्पल मुँह में लेकर चूसने लगा। वे मेरे बाल पकड़कर कराह रही थीं।
“आह्ह… हल्के से… बहुत दिन बाद…”
मैंने उनकी साड़ी और पेटीकोट पूरी तरह हटा दिए। वे नंगी चारपाई पर लेटी थीं। मैंने भी कपड़े उतारे। मेरा मोटा लंड तना हुआ था। उन्होंने उसे देखा और गला सूखाते हुए बोलीं, “इतना… बड़ा हो गया है तुम्हारा…पहले कभी नहीं देखा ऐसा…”

मैं उनके ऊपर चढ़ गया। पहले हाथ से उनकी चूत सहलाई। वे पहले से बहुत गीली थीं। दो उँगलियाँ अंदर डालकर तेजी से हिलाने लगा। वे कराहने लगीं। फिर मैंने अपना मोटा लंड उनकी चूत के मुँह पर रखा और धीरे-धीरे दबाव दिया।

“आह्ह्ह… रोहित… धीरे… बहुत दिन बाद अंदर जा रहा है…”

मैंने धीरे-धीरे पूरा लंड अंदर तक धकेल दिया। उनकी चूत बहुत टाइट और गरम थी। जैसे किसी ने सालों से इस्तेमाल न किया हो। मैं कुछ पल तक अंदर रखकर रुका रहा। फिर बहुत धीमे-धीमे हिलेगा शुरू किया। लंबे-लंबे धक्के। वे मेरे नीचे कराह रही थीं। उनके नाखून मेरी पीठ में गड़ रहे थे।

“जोर से… थोड़ा और जोर से करो… सालों से तड़प रही हूँ… मेरी चूत चोदो…”

मैंने रफ्तार बढ़ा दी। चारपाई जोर-जोर से चरमरा रही थी। उनके भारी स्तन मेरे हर धक्के के साथ उछल रहे थे। मैंने एक निप्पल फिर से मुँह में ले लिया और जोर से चूसते हुए चोदने लगा।

“आह्ह… रोहित… मेरी चूत फाड़ दो… सालों का भूखा शरीर है… गाली दो… कुछ भी करो…”

मैंने उनकी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रख लीं। इस पोजीशन में मेरा मोटा लंड और गहराई तक जा रहा था। हर धक्के पर उनकी गाँड हवा में उठ रही थी। वे चीख रही थीं।

“हाँ… ऐसे ही… बहुत गहरा… मेरी चूत पूरी भर गई है तुम्हारे मोटे लंड से…”

मैंने उन्हें पलटा और कुत्ते की पोजीशन में कर दिया। पीछे से एक झटके में फिर से मोटा लंड उनकी चूत में डाल दिया। एक हाथ से उनके बाल पकड़े और दूसरे से उनकी गाँड पर जोर-जोर से थप्पड़ मारने लगा।

“मामी… आपकी चूत कितनी टाइट है… सालों से किसी ने नहीं चोदा…” “चोदो… जोर से चोदो… मेरी चूत फाड़ दो… थप्पड़ मारो…”

मैं और तेज हो गया। कमरे में सिर्फ़ शरीर की आवाजें और उनकी कराहें गूँज रही थीं। थोड़ी देर बाद मैंने लंड निकाला और उनकी गाँड की सेंध पर रख दिया।

“यहाँ भी डालूँ मामी?” “डाल… दर्द होगा लेकिन डाल… आज पूरी रात निकाल दो मेरी तड़प…”

मैंने थूक लगाकर धीरे-धीरे अपना मोटा लंड उनकी गाँड में धकेलना शुरू किया। वे तकिया दबाकर चीख रही थीं। आधी लंड जाते ही वे बोलीं, “रुक… थोड़ा रुक… बहुत मोटा है…”

फिर खुद पीछे की तरफ धक्का दिया। धीरे-धीरे पूरा लंड उनकी गाँड में समा गया। मैंने धीमे लेकिन भारी धक्के लगाने शुरू किए।

“आह्ह… रोहित… गाँड फट रही है… लेकिन मत निकालना… चोदते रहो…”

मैं उनकी गाँड में जोर-जोर से चोदने लगा। एक हाथ से उनके बाल पकड़े हुए था, दूसरे से उनकी चूत में उँगलियाँ घुमा रहा था। दोनों होल एक साथ सता रहा था। वे पागल हो रही थीं।

“हाँ… ऐसे ही… गाँड और चूत दोनों चोदो… सालों बाद मर्द मिला है… पूरी तरह इस्तेमाल करो मुझे…”

मैंने बारी-बारी से उनकी चूत और गाँड में लंड मारना शुरू कर दिया। कभी चूत में दस-बारह धक्के, फिर निकालकर गाँड में। वे लगातार कराह रही थीं। गालियाँ भी निकालने लगीं।

“साले… कितना मोटा लंड है तेरा… मेरी दोनों होल फाड़ रहा है… और जोर से… फाड़ दे पूरी…”

मैंने उन्हें फिर से सीधा लिटाया। उनकी दोनों टाँगें फैलाकर बहुत गहराई तक चोदने लगा। उनके स्तनों को जोर-जोर से मसलते हुए।

“मामी… मैं अब ज्यादा देर नहीं रोक पाऊँगा…” “अंदर डाल… अपनी मोटा लंड की सारी गंदगी मेरी चूत में डाल दे… भर दे मुझे…”

मैंने जोर के कई धक्के मारे और उनकी चूत में ही झड़ गया। गर्म गाढ़ा पानी की तेज धार उनके अंदर फूट रही थी। वे भी उसी वक्त जोर से काँपते हुए झड़ गईं। उनकी चूत मेरे लंड को कसकर सिकुड़ रही थी।

मैं उनके ऊपर गिर पड़ा। दोनों पसीने से तरबतर थे। साँसें उखड़ी हुईं।

थोड़ी देर बाद वे मेरे बाल सहलाते हुए बोलीं, “अब तुम भी मेरे राज़ का हिस्सा बन गए हो रोहित। यह बात किसी को नहीं पता चलनी चाहिए।”

मैंने उनके होंठ चूमते हुए कहा, “नहीं बताऊँगा। लेकिन अब जब भी गाँव आऊँगा… यह कोठा हमारा रहेगा। और मैं तुम्हारी दोनों होल फिर से फाड़ूँगा।”

वे मुस्कुराईं। आँखों में अब वह पुरानी थकान नहीं थी। एक नई, संतुष्ट चमक थी।

गाँव वाले अब भी फुसफुसाते होंगे कि मीना मामी बदल गई हैं। लेकिन सच सिर्फ़ मैं जानता था… और अब यह राज़ हमारी जान में दफन हो चुका था।

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